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'घोड़ी पर बेटी का बनवारा निकाला, लड़का -लड़की समान होने का संदेश दिया।'
हर दो-चार दिन बाद ऐसी एक खबर वाट्सअप ग्रुपों में आ ही जाती है। किंतु आश्चर्य है कि यह सामानता प्रदर्शित करने के लिए बेटे को सलवार पहना कर बनवारा निकालने की एक भी खबर आज तक नहीं आई! खेल हो या राजनीति, पढ़ाई हो या नौकरी लगी हो, बेटी ने अच्छा किया तो सम्मान समारोह में पगड़ी पहना दो! किंतु आज तक किसी भी बेटे का सम्मान चुनरी पहना कर हुआ हो, मैं ने नहीं सुना। समानता या तो लड़की को घोड़ी पर बिठा कर आती है, या फिर सर पर पगड़ी रख कर! नारी के इन अभिनंदनों में नारी कहां है? महिला का अभिवादन उसे पुरुष बना कर करना उसका सम्मान है या अपमान!
तथाकथित 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' कुछ ही दिन पहले गया, कुछ महिलाओं ने मुझ से शुभकामनाएं 'छीनने' का असफल प्रयास किया। किन्तु पितृ सत्तात्मक, मनुवादी, पुरुष वर्चस्व वादी समाज में रहने वाले व्यक्ति से इस विषय में अपेक्षा ही क्या की जा सकती है! निश्चय ही हर जानने वाली महिला को महिला दिवस 'विश' करना 'कूल' होता होगा परन्तु अधिकतर 'एंपावर्ड' महिलाओं और 'कूल डूड्स' को नहीं पता कि पुरुषों के बराबर मज़दूरी और काम के घंटे कम करने की मांग करती अनेकों महिलाओं ने यूरोप के देशों में जानें गंवा कर 1915 के बाद ही महिला दिवस कमाया था। वैसे भी यूरोप ने महिलाओं को मतदान का अधिकार भी पहली बार लगभग उसी समय देना आरम्भ किया था और इस्लामी इलाके का तो कहना ही क्या! जबकि भारत में लोकतंत्र और इसमें महिलाओं की भागीदारी के प्रमाण ईसा से भी बहुत पहले के हैं। अब्राहमियों के अनुसार महिलाएं 'शैतान की बेटियां' और 'पुरुष की खेती' ही रही हैं जो उनकी धार्मिक किताबों में आज भी दर्ज़ है। रोमन साम्राज्य में गणित, खगोलीय ज्ञान और विज्ञान से चर्च के सिद्धांतों को चुनौती देने वाली महिला विद्वान हिपेशिया को यातनाएं दे कर मार दिया गया था जबकि भारत में उस से हजारों साल पहले अपाला, लोपामुद्रा, गार्गी, अरुंधती, घोषा जैसी विदुषी नारियां वेदों की ऋचाएं तक लिख रही थीं। आदि शंकराचार्य तथा मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ की न्यायधीश मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी भारती ने 42 दिन चले शास्त्रार्थ के बाद तटस्थ न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए आदि शंकराचार्य को विजेता घोषित किया था किंतु उन के मंडन मिश्र की अर्धांगिनी यानि स्वयं को भी हराने के बाद ही। अर्थात पत्नी की हार के बिना पति की हार भी अधूरी ही थी। यह घटना किसी नारी के विद्वती होने का प्रमाण ही नहीं अपितु भारत के सामाजिक मूल्यों और महिला की श्रेष्ठ स्थिति तथा उसकी न्याय प्रियता की झलक भी है। दाम्पत्य, विद्वता, संस्कार, न्याय और नारी शक्ति का ऐसा एक भी उदाहरण वहां नहीं मिलता जहां महिला दिवस गढ़ा गया।
वामपंथी का मूल हथियार है कि वह समाज के अंदर दो वर्ग पैदा करता है फिर उनमें दरार बनता है एक वर्ग को शोषक और दूसरे को शोषित प्रदर्शित करता है तथा उस दरार को बढ़ाता है। यह कहीं उद्योगपति तथा मजदूर, कहीं उच्च जाति निम्न जाति, कहीं अफसर कर्मचारी, कहीं महिला पुरुष, कहीं पति-पत्नी और यहां तक कि कहीं अभिभावक तथा संतान के रूप में कुछ भी हो सकता है।
महिला से भेदभाव और उसको समाप्त करने के महिला दिवस जैसे चोंचले दोनों ही भारत को मिली पाश्चात्य भेंट हैं और महिलाओं को पुरुष बना कर बराबरी का ढोंग करने वाले वामपंथ के मासूम औजार!
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