सब से बड़ी ग़लती तो यही हुई कि संविधान का
मूल मनुस्मृति को नहीं बनाया गया। जिस वक्त संविधान बना हमारे पास समय था कि हम
मनुस्मृति समेत अन्य स्मृतियों, वेदों, शास्त्रों, पुराणों आदि
का अध्ययन करते, उनके लिखे जाने से अब तक हुए मानव जाति के विकास की तुलना करते और
फिर संविधान का निर्माण करते। न जाने क्यों लोग ये मानने से डरते हैं की भारत में
संवैधानिक प्रक्रिया का निर्माण मनुस्मृति काल से ही हुआ है न कि 1950 से। किन्तु संविधान निर्माण के समय बाबा
साहेब समेत देश का पूरा शिक्षित वर्ग मैकाले पद्धति की शराब के नशे में दुत्त था
हम अपनी परम्पराओं को नष्ट कर के पश्चिम की और देख रहे थे। ऐसे समय में,
पूर्वाग्रहों की पृष्ठभूमि में, मनुस्मृति में आई मिलावटों को परे हटा कर उसे
संविधान का मूल बनाने की भारी भूल कर दी गई। सनातन में प्रचलित मान्यताओं और
परम्पराओं की विवेचना करके कालांतर में हुए प्रदूषण से उन्हें मुक्त कर अंगीकार
करने की बजाय उन्हें riddles (पहेलियाँ)
करार दिया गया। इस बात को बिलकुल नजरंदाज कर दिया गया कि एक कान से दूसरे कान तक
पहुंची बात में ही मानव नामक जीव मिलावट कर देता है तो हजारों साल पुरानी
मनुस्मृति के साथ क्या हुआ होगा! किन्तु संविधान बनाते समय 5 हजार साल से ज्यादा
पुरानी सभ्यता को लगभग नजरंदाज कर के नए-नए ‘इन्सान’ बने देशों की तरफ देखा गया।
अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता के लिए अमेरिका जाने की क्या जरुरत थी जब उसके ढेरों
उदाहरण भारतीय उपमहाद्वीप पर ही मौजूद थे! कल्पनाशील लेखकों ने अपनी यौन कुंठाओं
की तुष्टि हेतु जब ऋषियों और देवताओं के मिथ्या किस्से गढ़ दिए और उनका सर कलम करने
की बजाय साहित्य में स्थान मिला इस से बड़ी अभिव्यक्ति की स्वतत्रंता क्या हो सकती
है? समाज के बाहर से आए और सामाजिक ढर्रे से उतरे सदस्यों को समाहित करने की व्यवस्था
के प्रावधानों समेत अनेकों उदाहरण होते हुए भी संशोधन के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा! राज्य के नीति निर्धारक सिद्धांतों हेतु
आयरलैंड क्यों गए जब इसके लिए चाणक्य नीति और अशोक के शिलालेख भरपूर मदद कर रहे
थे? क्या उपनिषदों को नकारना चाहिए था? क्या सर्वे भवन्तु
सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः और वसुधैव कुटुम्बकम को सिर्फ भगवाँधारी
साधुओं के प्रयोग हेतु ही न छोड़ कर संविधान में इसे उचित स्थान नहीं दिया जाना
चाहिए था? क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बौद्धकाल में भी अस्तित्व में रहे
लोकतन्त्रों के पास कुछ नही मिला? क्षमा चाहूँगा किन्तु असल में संविधान के
निर्माताओं ने भारत के संविधान को बनाते समय, पाश्चात्य मूल्यों की रौशनी में,
हजारों साल पुरानी भारतीय सामाजिक व्यवस्था और परम्पराओं की घोर उपेक्षा करते हुए
संविधान का निर्माण किया है। प्राचीन साहित्य को सिर्फ riddles करार देना एक
विकसित सभ्यता के साथ क्रूर अन्याय के सिवा कुछ नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि अन्य
सभ्यताओं के विकास से शिक्षा नहीं ली जानी चाहिए थी किन्तु इसमें कोई शक नहीं कि संविधान
निर्माण के समय भारतीय सभ्यता की घोर उपेक्षा की गयी। निश्चय ही संस्कार कानून से
अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। संस्कार प्रेरित होते हैं और कानून बाध्यकारी। एक
संस्कारी मनुष्य कभी कानून विपरीत कार्य नहीं करता। संस्कारों और सामाजिक
मान्यताओं को समाप्त करके हम ने समाज को कानून के हवाले कर दिया। नतीजा, न हम कानून
के रहे न संस्कार के! देश जातिवाद की आग में जल रहा है। जाति समाप्त करने के नाम
पर किये गए प्रयास ही जातिगत वैमनस्य का कारण बन रहे हैं और हम मनु समर्थक और मनु
विरोधी जैसे खेमों में बंटे है। जबकि हकीकत में मनुस्मृति न ये खेमा पढता है न वो!
व्यवस्था में जब भी विकार आए हमें आयातित पैबंद लगाने की बजाय जड़ों की तरफ जाना
चाहिए! जरूरत है सभी को साथ बैठ कर मनुस्मृति पर विचार करने की, स्वार्थी तत्वों
द्वारा उस में किये गए घालमेल को पहचान कर अलग करने की तथा प्रारंभ से ले कर आज तक
की सामाजिक घटनाओं और दुर्घटनाओं की विवेचना करने की। यह सब करने के बाद हम बची
हुई शुद्ध परम्पराओं की तुलना समकालीन व्यवस्थाओं से करते हुए वर्तमान में आएँ बिना
‘ख़त्म करो’ और ‘बचाओ’ के नारे लगाये एक संगठित समाज और देश के रूप में हम एक फैसले
पर आ जायेंगे और वहीँ से सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः
एवं वसुधैव कुटुम्बकम की शुरुआत संवैधानिक रूप से होगी।
Change is the rule of nature... if not done in positive direction... it takes its own course
Wednesday, 24 February 2016
Wednesday, 9 September 2015
स्थानीय निकाय चुनाव
मित्रों,
पंचायतों और परिषद्/पालिकाओं के चुनाव आखिर आ ही पहुंचे। काफी लम्बा इंतजार करवा
दिया, बहुत से भावी उम्मीदवार तो दारू पिला-पिला के दिवालिया हो गए। जैसा हमेशा
होता आया है चुनावी मौसम में समाजसेवक जैसे जमीन की दरारों में से निकाल कर आ जाते
हैं। हालत इस बार भी यही हैं। समाज सेवकों द्वारा जागरण करवाए जा रहे हैं, चिकित्सा कैम्प लगाये जा रहे हैं, दान
दिए जा रहे हैं! इस बार तो छह-छह महीने पर चुनाव हुए हैं। अगर यही गति बनी रहे तो
देश में न कोई बीमार रहेगा न कोई गरीब और न कोई ‘प्यासा’! अब सोचने वाली बात यह है
कि इन समाजसेवियों और पोस्टरबाजों के बीच आप कहाँ हैं? क्या आप भी सरपंच/पार्षद
समर्थक, विरोधी और गुट निरपेक्ष तीन खेमों में से किसी एक में शामिल हैं? अगर ऐसा
है तो तैयार हो जाइए भ्रष्टाचार में लिप्त पालिकाओं और पंचायतों के लिए! आप शायद
नहीं भूले होंगे कि हमारी परिषद् के पार्षद 10 से 20 लाख प्रति पार्षद बिके थे!
क्या इस बार हम फिर से ऐसे जनप्रतिनिधि चुनने वाले हैं? जो उम्मीदवार ‘डोले’ बना
रहे हैं उन से तो ऐसा ही लगता है। अभी समय है क्यों न हम ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने
के लिए प्रेरित करें जो ईमानदार हों, जिन के पास विजन हो, कुछ करने की इच्छा रखते
हों, जो बिके नहीं। जाहिर बात है ऐसे लोग स्वयं आगे नहीं आएंगे बल्कि हमें प्रयास
करना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि अच्छे लोग चुनाव लड़ें। इस बात का ध्यान रखें
कि चुनाव का खर्च 5 हजार से ऊपर न जाए, फालतू पोस्टरबाजी न हो, शराब न चले, हलवा
पूरी न हो। यह बिलकुल संभव है और किया जाना चाहिए। मुझे तथा अन्य साथियों को इस
पोस्ट पर आपकी राय का और आपके सुझावों का
इंतज़ार रहेगा।
हम आए
मैदान में तो हम बताएँगे, न सर कटायेंगे अपना, न झुकायेंगे।
खुली
फ़जाओं में, हम तुम को आजमाएंगे।।
पंचायत/नगर परिषद् चुनाव
मित्रों,
पंचायतों और परिषद्/पालिकाओं के चुनाव आखिर आ ही पहुंचे। काफी लम्बा इंतजार करवा
दिया, बहुत से भावी उम्मीदवार तो दारू पिला-पिला के दिवालिया हो गए। जैसा हमेशा
होता आया है चुनावी मौसम में समाजसेवक जैसे जमीन की दरारों में से निकाल कर आ जाते
हैं। हालत इस बार भी यही हैं। समाज सेवकों द्वारा जागरण करवाए जा रहे हैं, चिकित्सा कैम्प लगाये जा रहे हैं, दान
दिए जा रहे हैं! इस बार तो छह-छह महीने पर चुनाव हुए हैं। अगर यही गति बनी रहे तो
देश में न कोई बीमार रहेगा न कोई गरीब और न कोई ‘प्यासा’! अब सोचने वाली बात यह है
कि इन समाजसेवियों और पोस्टरबाजों के बीच आप कहाँ हैं? क्या आप भी सरपंच/पार्षद
समर्थक, विरोधी और गुट निरपेक्ष तीन खेमों में से किसी एक में शामिल हैं? अगर ऐसा
है तो तैयार हो जाइए भ्रष्टाचार में लिप्त पालिकाओं और पंचायतों के लिए! आप शायद
नहीं भूले होंगे कि हमारी परिषद् के पार्षद 10 से 20 लाख प्रति पार्षद बिके थे!
क्या इस बार हम फिर से ऐसे जनप्रतिनिधि चुनने वाले हैं? जो उम्मीदवार ‘डोले’ बना
रहे हैं उन से तो ऐसा ही लगता है। अभी समय है क्यों न हम ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने
के लिए प्रेरित करें जो ईमानदार हों, जिन के पास विजन हो, कुछ करने की इच्छा रखते
हों, जो बिके नहीं। जाहिर बात है ऐसे लोग स्वयं आगे नहीं आएंगे बल्कि हमें प्रयास
करना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि अच्छे लोग चुनाव लड़ें। इस बात का ध्यान रखें
कि चुनाव का खर्च 5 हजार से ऊपर न जाए, फालतू पोस्टरबाजी न हो, शराब न चले, हलवा
पूरी न हो। यह बिलकुल संभव है और किया जाना चाहिए। मुझे तथा अन्य साथियों को इस
पोस्ट पर आपकी राय का और आपके सुझावों का
इंतज़ार रहेगा।
हम आए
मैदान में तो हम बताएँगे, न सर कटायेंगे अपना, न झुकायेंगे।
खुली
फ़जाओं में, हम तुम को आजमाएंगे।।
Tuesday, 1 September 2015
जातिगत आरक्षण
व्यवस्था अवस्था से बनती है। एक ही गांव
में एक ही दादा की औलाद अलग-अलग सम्मानजनक और अपमानजनक उपनामों से जानी जाती है।
और सम्मान या अपमान भी अवस्था ही निर्धारित करती है। इतिहास में अलग-अलग वर्गों को
कम और अधिक महत्ता के कारण अलग-अलग अवस्थाओं में पाया जाता है। बहरहाल एक बात तो होनी ही चाहिए
कि जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में किस जाति को कितना लाभ मिला इस का हिसाब किताब
जरूर मिलना चाहिए। स्पष्ट है कि कुछ जातियों ने इस व्यवस्था का भरपूर लाभ उठाया
है। आज भी धाणक, खटीक, कुचबंदा, मुसहर, कालबेलिया, कंजर, बावरिया, गाड़िया लुहार, बंजारा, भोपा, कीर, धोबी, नाई, डाकोत आदि जातियों की अवस्था जस की तस है।
मजे की बात तो यह है कि जब भी इस तरह की गणना की बात होती है तो सब से ज्यादा शोर
उन्हीं वर्गों के लोग मचाते हैं जो जातिगत आरक्षण की व्यवस्था से सब से ज्यादा
लाभान्वित होते हैं। सावधान मित्रों जाति व्यवस्था का एक नया वर्ग तैयार हो रहा है
और कुछ समय बाद उपरोक्त किस्सों को तोड़ मरोड़ कर बदले हुए नायक और खलनायकों के साथ
कुछ और मित्र हमारे सामने उपस्थित होंगे। कितने आरक्षित वर्गों के मित्रों ने इस
बात पर गंभीरता से विचार किया है? आरक्षण का लाभ आज भी असल जरूरतमंद दलित तक नहीं
पहुँचा। अगर ब्राह्मण को सर्वाधिक संम्पन्न और विकसित होने का पैमाना माना जाता है
तो चमार जाति को SC और मीणा को ST का ब्राह्मण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
कुचबंदों की बस्ती में कितनों ने जाकर
देखा कि आरक्षण से उन्हें क्या मिला? जुलाहों का हाल जानना चाहा? या कीरों की हालत
देखी कि वो सिंघाड़े और टोकरियों से ऊपर उठे या नहीं? घुमंतू कबीलों में ले चलता हूँ! क्या कंजर
कछुओं और खरगोश से बाहर निकल पाए? क्या गाड़िया लुहार आईएस अफसर बने? क्या भोपों की
नौजवान कन्याओं ने चलती रेलगाड़ियों में, बदन चीरती प्यासी नजरों के बीच, उँगलियों
में पत्थर दबा कर 'परदेसी परदेसी जाना नहीं' गाना बंद कर दिया? क्या बावरियों पर भरोसे से सम्बंधित
कहावतें ख़त्म हो गयी? क्या काटली नदी में बसे कालबेलियों को उनके पुश्तैनी धंधे से दूर करने
के बाद वेश्यावृति के कगार पर खडी उनकी पुत्रियों को सुरक्षा की गारंटी मिली?
ये तो मैंने वही
जातियां लिखी जिनकी अवस्था मैं व्यक्तिगत जानता हूँ वरना मुसहर जैसी नारकीय
जीवन बिताने वाली जातियों का तो जिक्र तक नहीं किया! बड़ा सवाल ये नहीं है कि मैं
किस जाति का हूँ बल्कि यह कि आखिर जातिगत आरक्षण का लाभ समान रूप से उस तबके को
मिला कि नहीं जिसकी उसे जरुरत है? यदि नहीं मिला तो यह आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था
की असफलता है! मेरी आपसे प्रार्थना है कि अपने सीने पर हाथ रखिये और टटोलिये कि
क्या वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का लाभ कुछ गिनी चुनी जातियां ही नहीं उठा रही
हैं? यहाँ आप
जागरूकता की बात मत कीजिए आरक्षण था ही उन लोगों के लिए जो जागरूक नहीं हैं! आजादी
के कुछ साल बाद कुछ दबे हुए वर्गों को ऊपर उठाने के लिए आरक्षण की शुरुआत की गयी
परन्तु आज जरुरत है कि ये पता लगाया जाए कि आरक्षण का लाभ किन वर्गोों को मिला?
इसके लिए आप हक़ से
वंचित उन वर्गों को बहुत समय तक वंचित नहीं कर पाएंगे! जातीय आरक्षण रहे या जाए इस
से भी बड़ा मुद्दा ये है कि क्या SC और ST में ही एक सवर्ण वर्ग तैयार नहीं हो गया है जो कि
सब का हक़ खा रहा है? अगर आप आरक्षित वर्ग से हैं और आप को ये चिंता नहीं है तो बंधुवर मुझे पूरा विश्वास है कि आप भी उस सवर्ण वर्ग
से ताल्लुक रखते हैं!
Sunday, 14 June 2015
मियां-मार अभियान
सब से
पहले एक मित्र द्वारा भेजा चुटकुला पढ़िए-
एक ट्रेन
में चार मौलवी बड़ी हड़बड़ी के साथ चढ़े और अपना सामान ले कर टॉयलेट में छिप गए टीटी
की नजर उन पर पडी और उन्हें बाहर खींच कर बोला टिकट दिखाओ, उनके पास टिकट भी थी। टीटी हैरान, बोला छुप क्यों रहे हो? वो चारों रोते
हुए हाथ जोड़ कर बोले हम सब कुछ छोड़-छाड़ कर भाग रहे हैं क्यों कि मोदी जी मियां-मार
अभियान चला रहे हैं जिस में उन्होंने फ़ौज को भी शामिल कर रखा है, हमें जाने दो
हुजुर। टीटी अपना सर पीटते हुए बोला अरे मूर्खों वो मियां-मार नहीं ‘म्यांमार’
अभियान है।
अब जरा
मनोरंजन को भूल कर इस चुटकुले में छिपी विडंबना पर गौर कीजिए। इस देश में जो भी हो
रहा है उसे ऐसा रंग दिया जा रहा है जैसे कि वो मुस्लिमों के खिलाफ हो। ये प्रचार
होता है कि इस्लाम खतरे में है। अभी सूर्यनमस्कार पर इस तरह बवाल मचाया गया कि
किसी भोले भाले मुसलमान को तो सूर्य देखने से ही नफरत हो जाए। बड़ा अजीब लगता है यह
देख कर कि शरीर और मष्तिष्क को स्वस्थ रखने की हज़ारों वर्षों के अन्तराल में
विकसित हुई वैज्ञानिक विधाओं को कैसे एक धर्म का ढक्कन लगा कर मानव जाति की एक बड़ी
आबादी से परे कर दिया जा रहा है। आज पैगम्बर मोहम्मद की रूह को सब से ज्यादा दुख उनके
द्वारा दी गयी नसीहतों के दुरूपयोग पर हो रहा होगा। इस्लाम वाकई खतरे में है और वो
खतरा हैं खुद को मुस्लिम कहने वाले इस्लाम के ठेकेदार। दुनिया में जिस पुस्तक का सब से ज्यादा दुरूपयोग हुआ वह है कुरान और
जिन वचनों को तोड़ मरोड़ कर भोले भाले लोगों के सामने पेश किया गया वे हैं कुरान के
उपदेश। नसीहतों, उपदेशों, और निर्देशों (guidelines) पर आधारित मतों में मुझे सब से ज्यादा खतरा
उन के गलत स्पष्टीकरण (misinterpretation) का नजर आता है।
जिस को जैसा भाया उसने वैसा पाया। आम इन्सान को जैसा बता दिया वैसा उसने मान लिया।
कम से कम भारत में तो ऐसा हो ही रहा है। और भारत में ही क्या पूरे विश्व में ही
ऐसा हो रहा है। जरा नजर दौड़ाइए! और सब से बड़ी विडंबना तो ये है कि इस्लाम को और
मुस्लिमों को सब से बड़ा ख़तरा इस्लामिक देशों में ही है। आज की तारीख में अगर
मुस्लिम सुरक्षित हैं तो गैर मुस्लिम देशों में। आखिर मुस्लिम देशों में क्या
दिक्कत है? वहां तो सब मुसलमान ही हैं! असल में तो वहां अन्य सम्प्रदायों के लोगों
को अपने रीतिरिवाज और पूजा पद्धति का पालन करने पर विविध प्रकार के प्रतिबन्ध हैं।
पर दिक्कत वही है, कुरान में लिखे उपदेशों का मनमाने तरीके से प्रयोग। कुरान का
अनेक भाषाओँ में अनुवाद किया गया। हिंदी में भी। मैंने भी पढ़ा। अजीब लगा कि सब
शब्दों का हिंदी अनुवाद हो गया पर अल्लाह का नहीं किया गया अर्थात इस्लाम का ठेकेदार
अल्लाह को भगवान लिखने में डर गया कि कहीं इस्लाम को खतरा न पैदा हो जाए। मुझे
पूरा यकीन है कि अन्य भाषाओँ के अनुवाद में भी ऐसा ही हुआ होगा। इस्लाम को एक
एयरटाइट जार में बंद कर के रख दिया गया है कि बाहर की हवा उसे ख़राब कर देगी। अरे
इस्लाम के ठेकेदारों इसे सांस लेने दो, अन्य विचारों से साक्षात्कार करने दो अगर
इस में दम होगा तो इस्लाम का परचम खुद ही दुनिया भर में लहराने लगेगा।
आस्तिक-नास्तिक होना
व्यक्तिगत निर्णय है एक ईश्वर को मानता है दूसरा नहीं। मत मानो भाई इस से भगवान की सेहत पर
क्या असर पड़ता है। परन्तु धर्म एक दूसरी चीज है। मूर्ति पूजा करना या काबे की तरफ
मुंह कर के उपासना करना धर्म नहीं है। धर्म यानि धारण करने योग्य। और धारण करने
योग्य वह होता है, जो सही होता है, सम्यक होता है। धर्म तो सनातन है संस्कारों में
आता है। जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बात आती है, जिस दर्शन में पूरी पृथ्वी को
परिवार मानने की बात हो वहां क्या बचता है। जहाँ ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु
निरामया:’ मूल में हो उस को झटकने की बात बड़ी अजीब लगती है। जहाँ चींटियों,
पशुओं-पक्षियों तक को भोजन देना संस्कारों में शामिल हो उस सभ्यता पर प्रश्न चिन्ह
लगाना बड़ा अजीब लगता है। मुझे पूरा विश्वास है कि दुनिया के हर संप्रदाय में अपने
माता-पिता, बुजुर्गों का सम्मान किया जाता होगा। अपनी व गाँव की बहन बेटियों के
प्रति इज्जत तथा वात्सल्य का भाव रखा जाता होगा। जीवों के प्रति दया का भाव भी
होगा। देश के लिए चिंता भी होगी। अगर यह सनातन है तो भी यह इस्लाम के लिए कैसे
घातक है। ठीक है कि कुरान के अनुसार अल्लाह के सिवाय किसी के सामने सर झुकाने की
आज्ञा नहीं है पर ठेकदारों ने सर झुकाने का मतलब शाब्दिक रूप से ‘सर झुकाना’ ही
बना दिया न कि ईश्वर और उसकी सत्ता को सर्व शक्तिमान मानना। मैंने कुछ मुस्लिम मित्रों
को अन्य धर्मग्रन्थ पढ़ने की बात पर असहज पाया कि कहीं कुफ्र न हो जाए! अरे एक
विचार को आपने कैसा बना दिया! जिसे अन्य विचारों से साक्षात्कार की इजाज़त ही नहीं
है! मक्का और मदीना से चल कर इस्लाम पूरे विश्व में फैला (यहाँ मैं इसे फैलाने के तरीकों
पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ) वहां की संस्कृति में घुस कर वहां के लोगों को अपना
अनुयायी बना लिया पर वहां का हुआ नहीं। कहीं इस्लाम खतरे में न पड़ जाए इस डर से इसे
बाहरी हवा लगने से बचा कर रखा गया। इस्लाम के ठेकेदारों को तो यहाँ तक डर है कि
यदि ‘अल्लाह’ शब्द का अनुवाद स्थानीय भाषा में कर दिया गया तो पूरा का पूरा इस्लाम
ही डह पड़ेगा इसलिए यह बात ठोंक ठोंक कर दिमाग में घुसाई जाती है कि छठी शताब्दी में
‘अल्लाह’ ने अपना सम्पूर्ण ज्ञान एक व्यक्ति को दे दिया और उसके बाद उसने अपने दूत
भेजने बंद कर दिए बस अब अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लो अब कुछ नहीं बचा। यानि
मानव सभ्यता ने अब तरक्की करनी बंद कर दी! जब इन्सान के विवेक पर ताला लगा दिया
जाए तो ऐसे में क्या आश्चर्य कि चार लोग म्यांमार अभियान को मियां-मार अभियान
समझकर कर भाग खड़े हों।
Tuesday, 11 November 2014
किस ऑफ़ लव
कुछ शाश्वत नियम (cardinal principles) होते हैं, उन में से दो की बात कर रहा हूँ। पहला ‘जो चर्चा में रहना चाहता है उसकी
चर्चा मत करो अपनी मौत मर जाएगा’ और दूसरा ‘जिस चीज से हम बचते फिरते हैं उस का
अंततः सामना करना ही पड़ता है।’ ‘किस ऑफ़ लव’ का शोर मचा है इस बीच यह भी खबर आई कि
कुछ दिलजले, जिनकी शक्ल देख कर भैंस भी मुंह घुमा लेती है, अपने होठों पर पॉलिश
करवा कर ‘कुछ’ मिलने की आस में दिल्ली जा कर ‘सूखे’ ही वापस लौट आए हैं। मजाक की
बात नहीं है पर इस वाहियात और बेशर्म अभियान पर कुछ न लिख कर मैंने पहले नियम के
अनुसार इसके अपनी मौत मरने की कामना की थी। परन्तु एक फेसबुकिया मित्र ने इसे अपना
समर्थन देने की घोषणा कर दी। वो बात अलग है कि ये घोषणा ऐसे ही थी जैसे किसी एक
पार्टी की दो तिहाई बहुमत की सरकार को किसी निर्दलीय का समर्थन। अब साहब समर्थन के
इस महत्वपूर्ण दस्तावेज की खबर अजीब-अजीब शक्लों में ढले चौराहों पर चुम्बन को
अपना अधिकार समझते ‘लौंडे-लौंडियों’ को तो नहीं लगी होगी पर मुझे जरुर अजीब लगा कि 'किस ऑफ़
लव' सार्वजनिक रूप से करने के ये सज्जन समर्थक हैं। फिर तो ऐसे लोग नंगा घूमने के भी हामी होंगे, चौराहे पर सम्भोग करने के भी! ये भी आजादी ही है
न! यही आजादी पश्चिम भी खोज रहा था इस आजादी के चक्कर में उन्होंने वो सब कुछ
चौराहों पर किया जो बंद बेडरूम में गहरे पर्दों के पीछे होना चाहिए। वो लोग भूल गए कि उन की इस आजादी को
नन्हे बच्चे भी देख रहे हैं। आज परेशान है 12-13 साल की
स्कूली बच्चियों के गर्भवती होने की समस्या पर! अब इस बीमारी से निजात पाने को
पश्चिम, भारतीय संस्कृति की तरफ देख रहा है! ये चौक चौराहों पर 'किस' कर के
अपनी आजादी का रोना रोने वाले जरा ये सोचें कि बच्चों के मस्तिष्क पर इसका क्या
प्रभाव पड़ेगा! सब कुछ आजादी ही है सामाजिक जिम्मेदारी कुछ नहीं!??? पर ये तो हम हिन्दुस्तानियों की आदत ही है कि हम योग
करना भी तब शुरू करते हैं जब वो पश्चिम जाकर ‘योगा’ बन कर लौटता है! धन्य हैं लव
किसर्स और धन्य हैं आप के समर्थक। इनका जो भी हो पर देखिए न कैसे एक नियम पर चलते हए मैं दूसरे नियम
का शिकार हो गया।
Friday, 7 November 2014
शिलान्यास
लीजिए
साहब पेश है हमारे नए नवेले विधायक द्वारा नया नवेला पत्थर! नारनौल शहर में कहीं
भी निकल जाओ या गाँव की गलियों में चले जाओ हर गली में पत्थर लगे हैं। वो अलग बात
है कि उन पर पूर्व विधायक का नाम लिखा है।
अगर शहर की गलियों में दिन भर घूमा जाए तो
ऐसा लगता है जैसे कि पूर्व विधायक सड़क बनाने का ही काम करते हों। अगर इन शिला
स्तंभों से ईंटें निकाल कर सड़क बनायीं जाए तो एक वार्ड की और यदि शिलालेख उखाड़ कर बनाई
जाए तो एक पूरे महल्ले की सड़कें बन जाएँ। बहरहाल मैं यहाँ पर पूर्व विधायक का बखान
नहीं करना चाहता मेरी चिंता इन शिलालेखों पर होते फिजूलखर्च को ले कर है। सड़क,
बिजली, पानी ये तो मूलभूत जरूरते हैं इन्हें तो पूरा करते हुए शर्म आनी चाहिए कि
आजादी के इतना बरसों बाद भी हम इन पर पर नहीं पा सके शिलान्यास तो इस शर्मिंदगी में कोढ़ में खाज की
तरह है। एक सड़क पक्की करवा कर ऐसा क्या विकास का तीर मार लिया जाता है ये समझ से
परे है। भ्रष्ट परिषद् को तो किसी न किसी को ‘टमूरना’ है ताकि खीर पकती रहे और
चक्की चलती रहे। लाजमी है कि नए नवेले विधायक से शिलान्यास करवाने का ये कदम नयी
ब्याहता के हाथ की खीर में अपना हिस्सा पक्का करवाने के प्रयास जैसा है क्योंकि 15
दिन पुराने विधायक का निश्चित तौर पर ही सड़क निर्माण में कोई योगदान नहीं हो सकता,
आखिर एक सड़क को बनने में ही 15 दिन से ज्यादा का समय लग जाता है घोंघे की गति से
चलने वाली सरकारी फाईलों का तो कहा ही क्या जाए। यह भी सब जानते हैं कि इस नयी बनी
सड़क को यही परिषद् किसी न किसी बहाने तोड़ देगी ताकि न तो इसमें इस्तेमाल हुई
सामग्री पर कोई आवाज उठे और न ही निर्माण प्रक्रिया पर अगर बचा रह जाएगा तो यह
शिलालेख। जो भी हो इन पंक्तियों का कारण न तो विधायक महोदय को प्रचार कर वाही-वाही
लूटने से रोकने का है और न ही उन्हें बदनाम करने का, अपितु प्रदेश की जनता बीजेपी
सरकार के रूप में एक उम्मीद देख रही है और वही पुराने गलियाँ-नालियां पक्की करवा
शिलान्यासों की तस्वीरें खिंचवाने के काम होते रहे तो फिर ढ़ाक के तीन पात ही रहने
वाले हैं। एक बार को भूल जाईए शिलान्यास में प्रयुक सामग्री के खर्चे को जरा
सोचिये विधायक, उपायुक्त और अन्य अधिकारियों के कीमती समय के बारे में! शिलान्यास
एक परंपरा है, जरूर कायम रहनी चाहिए परन्तु एक निश्चित बजट से कम की परियोजनाओं के
लिए शिलान्यास पर रोक लगनी चाहिए। उम्मीद है कि नयी सरकार का ध्यान इस बेकार की
शोशेबाजी की तरफ जाएगा और यह तमाशा बंद किया जाएगा और उस से पहले हमारे विधायक
अपने स्तर पर इसे बंद करेंगे।
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