फाल्गुन माह की नर्म-गुलाबी सुबह है! पीले, नीले, सफेद, लाल और केसरिया ध्वज लिए पदयात्री रेलवे लाइन के साथ वाली पगडंडी पर नारनौल से गुज़र रहे हैं। यह दृश्य हर साल का है लेकिन इस बार यह न जाने क्यों कुंभ मेले का विस्तार लग रहा है। शायद इसलिए कि मस्तिष्क में कुंभ के दृश्य अब भी ज्यों के त्यों सुरक्षित हैं। फागुन शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन खाटू श्याम का शीश प्रकट हुआ और खाटू के तत्कालीन राजा ने वहां एक मंदिर का निर्माण करवाया था। तब से लेकर आज तक इस दिन वहां श्याम जी के शीश के दर्शन करने भक्त इकट्ठा होते हैं। पूरे शुक्ल पक्ष पद-यात्रियों की टोलियां इन क्षेत्रों से गुजर रही होती हैं। धर्म की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण को बर्बरीक का शीश चाहिए था, घटोत्कच के पुत्र और भीम के इस पौत्र के पास ईश्वरत्व प्राप्त करने का एक मौका आया और उसने उसे हाथ से नहीं जाने दिया। इसी धर्म की रक्षा के लिए कालांतर में अनेकों महापुरुष अपने शीश दे कर ईश्वरत्व प्राप्त करते आए हैं। गांव-गांव और ढाणी-ढाणी जुझारों (युद्ध में बलिदान हुए वीर) की पुजती मढ़ियां इस की साक्षी हैं। निश्चय ही धर्म में उपासना का उद्देश्य ईश्वरत्व प्राप्त करना ही है तभी तो 'चिदानन्दरूपं शिवोहम् शिवोहम्' तथा 'अहं ब्रह्माऽस्मि' जैसे वाक्यों और महावाक्यों का आविष्कार हुआ। कदाचित ईश्वरत्व को प्राप्त करने का उद्देश्य ही सनातन धर्म में अवतारवाद के सिद्धांत का मूल है। बर्बरीक में ईश्वरत्व के गुण देख कर ही तो स्वयं भगवान ने उसे उन्हीं के अवतार की तरह पूजे जाने का वरदान दिया होगा! तभी तो हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ने का संकल्प लेने वाला बर्बरीक आज भी कृष्ण रूप में 'हारे का सहारा' बना हुआ है! सनातन धर्म में महलों में पलने वाले राजकुमार से ले कर वनवासी बालक तक के लिए ईश्वर बनने के अवसर हैं! सामान्य मानव को प्रतिदिन ईश्वरत्व प्राप्त करने के अवसर मिलते हैं किंतु वह इन अवसरों की तरफ पीठ किए रहता है। वो तो कंधे पर त्याग का प्रतीक केसरिया लादे 'हारा' बन 'सहारा' लेने खाटू के कच्चे पक्के मार्गों पर दौड़ा चला जा रहा है। रेल गाड़ियों की सीटों पर फैल कर बैठे 'हारे' बगल में खड़े सहयात्रियों से स्थान के लिए झगड़ रहे हैं। सहारा लेने की भावना प्रबल, धर्म निबाहने का कर्तव्य गौण! धर्म के पतन में नैतिकता के ह्रास का योगदान सर्वाधिक है। महापुरुषों को पूज कर उन जैसा बनने का उद्देश उनकी चापलूसी-चिरौरी पर आ कर सिमट चुका। प्रयागराज में एक डुबकी लगा कर मुक्ति! जन्म जन्मांतर में भी न मिलने वाला मोक्ष कितना सहज बना लिया! निःसंदेह ईश्वर में डूब ईश्वर जैसा बनने का प्रयास ही मोक्ष का रास्ता हो सकता है। ऐसे ही जैसे बर्बरीक से श्याम जी बनने में असल संदेश हार कर सहारा खोजने का नहीं 'हारे का सहारा' बनने का है। चलो अब से सहारा लेने नहीं सहारा बनने की शक्ति लेने खाटू चलें।
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