poems

Saturday, 27 September 2014

पंचायत का निर्णय

मित्रों नारनौल में चुनाव का अखाड़ा सज गया है। पहलवान अपने-अपने लंगोट कस रहे हैं। ‘...का बटन दबाईये और ....को विजयी बनाईये’ का शोर एक ही डबिंग आर्टिस्ट की आवाज में दिन भर सुनाई पड़ रहा है। एक नामचीन उम्मीदवार जिन्होंने पिछले पांच साल सिर्फ पैसा बटोरने में ही निकाल दिए अनमने ढंग से फिर सामने हैं तो दूसरे ईश्वर की कृपा और ईश्वरीय स्वरुप व्यक्ति से अमरत्व का वरदान ले कर मौजूद हैं। तो एक पारिवारिक पार्टी ने परिवारवाद में आस्था जताते हुए घर-गृहस्ती में लगी महिला का चौका चूल्हा छुड़ा कर चुनावी आग में झोंक दिया है। एक उम्मीदवार जिन की सारी उम्र सार्वजनिक जगहों पर कब्ज़ा करने में गुजर गयी वो भ्रष्टाचार से मुक्ति की बात कर रहे हैं। एक श्रीमान योग्यता की कसौटी पर सब को कसने पर जोर दे रहे हैं तो एक धनी ‘समाज सेवी’ ने समाजसेवी का चोला उतार कर नेताजी का खोल ओढ़ लिया है और पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। वहीँ एक बंधु अपनी महिला कर्मचारी के शोषण के आरोप में जेलयात्रा का इंतजार करते पार्टी प्रमुख के धन से हलवा-पूरी और अन्य ‘आवश्यक सामग्री’ उपलब्ध करवाते हुए हरियाणा की ‘तकदीर’ बदलने का सपना दिखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में बेवडों को मग्गड़ मारे, नशे में टुल्ल ‘साले ये चुनाव तो हर छह महीने में होने चाहिए’ कहते हुए हर मोड़ पर सुना जा सकता है। हमेशा की तरह मूल मुद्दे फिर हवा हो गए हैं और हर उम्मीदवार को अपनी जाति के वोटरों को रिझाते देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर भी चापलूसों की फ़ौज अपने आकाओं के महिमामंडन में लगी है। इस बीच एक मित्र ने एक लघु कथा भेजी है।
         एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये! हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं! यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा ! भटकते-भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे ! रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठा था। वह जोर जोर से चिल्लाने लगा। हंसिनी ने हंस से कहा, अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते। ये उल्लू चिल्ला रहा है। हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही। पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुन रहा था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो। हंस ने कहा, कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!  यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो। हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है! उल्लू ने कहा, खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग इक्कठा हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंच लोग भी आ गये ! बोले, भाई किस बात का विवाद है ? लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है ! लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना है ! फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की  जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है ! यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया ! उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली ! रोते- चीखते जब वहआगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई -ऐ मित्र हंस, रुको ! हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ? उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी ! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है ! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है !यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं !
साथियों बिना विजन, बिना आस्था, बिना त्याग, बिना चरित्र, बिना शिक्षा, बिना ज्ञान, सिर्फ जाति, धन, पार्टी के बल पर अनेकों उल्लू आपके सामने हैं अब आप सोचिये कि आप किस उल्लू के हक़ में फैसला देने वाले हैं!


Wednesday, 10 September 2014

जूतों में दाल


लीजिए साहब आखिर नारनौल विधान सभा की भाजपा की टिकट घोषित हो ही गई। दिमाग में दो कहानियाँ आ रही हैं। पहली तो बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर के फायदा उठाने वाली और दूसरी उस माँ वाली जो राजा के इस न्याय पर कि बच्चे के दो टुकड़े कर के दोनों औरतों को दे दो, रोती है और टुकड़े करने से मना करती है व इस की बजाय राजा से बच्चा दूसरी औरत को देने की प्रार्थना करती है। समझ नहीं आ रहा यहाँ कौन सी कहानी लागू होगी पर इतना तय है कि बीजेपी के टिकटार्थियों में उस माँ जैसा संवेदनशील हृदय किसी का नहीं जो बच्चे की जान बचाने के लिए उसे दूसरी औरत को देना मंजूर कर लेती है।

सुबह ही सुबह एक मित्र ने सूचना दी कि बीजेपी की टिकट की घोषणा हो गई। 'किसे मिली?' स्वाभाविक सा सवाल था। उन्होंने नाम बताया। 'ये कौन है?' अगला स्वाभाविक सवाल। पता लगा यादव सभा के प्रधान, तो एक धुंधली सी आकृति उभरी। फिर बारी-बारी से बीजेपी नारनौल के क्षत्रपों के चेहरे आँखों के सामने घूम गए। पर आश्चर्य अगली जो तस्वीरें सामने आई वो इंसानों की नहीं चप्पलों की थी, घिसी, टूटी, पुरानी चप्पलें। काफी दिमाग लगाया तो समझ आया कि ये कार्यकर्ताओं की चप्पलें हैं। बेचारा कार्यकर्त्ता फिर ठगा गया। जिंदगी गुजर गयी दरियाँ उठाते-बिछाते पर रहा वहीं। झंडा उठाएगा, 'की जय' 'की जय' बोलेगा और फिर चुनाव के समय कोई पैराशूट से प्रकट होगा और मज़बूरी में उस के पीछे हो लेगा। ऐसे हो गया जैसे पार्टियाँ मालिक हैं और कार्यकर्त्ता नौकर। कुछ दिन पहले इनेलो की टिकटों में भी यही हुआ जब कार्यकर्ताओं को धता बता कर नाकारा नेताओं की पुत्र वधुएँ और पूंजीपति पसंद किए गए। पर इनेलो तो प्राइवेट लिमिटेड पार्टी है। ऊपर से चाबुक चली और सारे शेर हो लिए सीधे! लगे मंजीरे 'जय चौटाला' 'जय कमलेश'! पर बीजेपी का क्या होगा। यहाँ तो वही एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते जो साल भर सक्रिय रहते हैं! रामबिलास शर्मा की चाबुक से तो कुत्ता भी स्टूल पर नहीं बैठता, शेर तो कहाँ बैठेंगे लगता है यहाँ अमित शाह को चाबुक चलाने खुद आना पड़ेगा। सजातीय उम्मीदवार के सात खून माफ़ करने की मानसिकता रखने वाले इलाके में दो सशक्त सैनी उम्मीदवारों के बीच अहीर उम्मीदवार को टिकट देना अच्छा फैसला हो सकता है पर बीजेपी हाई कमान को इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए था कि चुनाव यादव सभा के नहीं विधान सभा के हो रहे हैं। बहरहाल मैं उम्मीद करता हूँ कि बीजेपी के झंडे उठाते बूढ़े हो चले कार्यकर्ताओं को चप्पलों की नयी जोड़ी तो नसीब होगी क्यों कि उन्हें भी पता है की ये दाल तो जूतों में ही बंटेगी।

Saturday, 6 September 2014

मिट्टी के शेर

शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा बच्चों से संवाद पर बहुत से तथाकथित बुद्धिजीवियों ने काफी हो हल्ला मचाया। एक भारतीय होने के नाते मैं मानता हूँ कि फ़िलहाल हमें राष्ट्रीय चरित्र की जरूरत है और प्रधान मंत्री द्वारा बच्चों से संवाद स्थापित करने जैसे कार्य इस में बहुत मदद करेंगे। मेरे विचार से ये एक उत्तम कदम था और दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर इस का स्वागत किया जाना चाहिए था। ये अफ़सोस की बात है कि कुछ राज्यों की सरकारों ने सिर्फ इर्ष्यावश अपने राज्यों के स्कूलों में येनकेन प्रकारेण इस संवाद को बच्चों तक नहीं पहुँचने दिया। जाहिर है कि राजनैतिक प्रतिद्वंदिता इस का कारण है और जब बात राजनैतिक छिछोरेपन की आती है तो देश जाए भाड़ में! चलिए राष्ट्र और राज्यों से नीचे हमारे अपने नारनौल में आते हैं। पर पहले एक छोटी सी कहानी! एक मेंढकी ने टापों की आवाज सुन कर पानी से बाहर सर निकाला और सरपट दौड़ते घोड़े को कौतुहल से निहारा। उस ने जोश में आ कर तालाब से बाहर चार-छह छलांगें लगायी और फिर गर्व से गर्दन ऊँची कर पीछे मुड़  कर फासले को निगाहों से नापा-तोला! ‘बहुत अच्छे! अब होगा घोड़े से मुकाबला!’ उसी समय घोडा फिर वहां से गुजरा। ‘अरे ये टप-टप कैसे होती है?’ तभी मेंढकी की नजर घोड़े की नालों पर पड़ी। ‘ओह ये है राज इस रफ़्तार का!’ और मेंढकी अपने पैरों में नाल ठुकवाने चल दी लुहार की तरफ!

आदर्श सनातन धर्म विद्यालय नारनौल का पुराना और प्रतिष्ठित विद्यालय है! मुझ जैसे न जाने कितने हजार लोगों पर इस विद्यालय का कर्ज है! न जाने कितने ही लोग यहीं पढ़ कर देश विदेश में नाम कमा रहे हैं! पर ट्रष्ट की अंदरूनी राजनीति के चलते यहाँ न कुछ आदर्श बचा है, न सनातन, न धर्म और न ही विद्यालय! इस राजनीति ने स्कूल की प्रतिष्ठा को बहुत नुकसान पहुँचाया है। बहरहाल इस खींचतान के बीच श्री गोपाल शरण गर्ग और श्री गोविन्द भारद्वाज क्रमशः प्रधान और उप प्रधान के पद पर सुशोभित हैं। इन में से एक तो प्रसिद्द मौसम वैज्ञानिक हैं! इन्हें मौसम विज्ञान में इतनी महारत हासिल है कि ये हवा को सूंघ कर पता लगा लेते हैं की किस पार्टी की सरकार आने वाली है! बस जी ये उस पार्टी की सभाओं में मंच पर मुख्यातिथि के बगल की सीट का जुगाड़ किये मिलते हैं! कट्टर स्वयंसेवक का दम भरने वाले इन महाशय ने उल्लेखनीय छलांग तब लगायी जब ये इनेलो की सरकार आने पर वहां नजर आए और इन्होने संघ से ऐसी बेरुखी से किनारा किया कि बेचारों को शाखा लगाने की जगह तक देने से इंकार कर दिया। फिर चौटाला से लोगों ने किनारा कर लिया और हुड्डा को सत्ता सौंप दी पर ये मौसम वैज्ञानिक वहां पहले से ही नजर आए और मित्रों इन के पाला बदल से लग रहा है कि इस बार बीजेपी के आसार हैं पर घबराईये मत बीजेपी नहीं भी आती है तो भी ये सत्ता में आई पार्टी में ही मिलेंगे! वैसे लोग इन के बारे में तरह-तरह की बातें करते हैं परन्तु सच होने पर भी उन का उल्लेख उचित नहीं है! दूसरे सज्जन बीजेपी के पुराने नेता हैं! इन सब बातों का उल्लेख यहाँ इस लिए जरूरी हो गया कि ये कहा जा सके कि आदर्श सनातन धर्म विद्यालय एक प्रकार से भाजपामय है और जैसा कि मैंने ऊपर लिखा कि प्रधानमंत्री का कार्यक्रम देश के लिए था! दलगत राजनीति से ऊपर! फिर क्या कारण रहा कि एक प्रतिष्ठित विद्यालय, जिस के ट्रष्ट के प्रधान और उपप्रधान दोनों ही भाजपा से जुड़े हैं, ने अपने विद्यार्थियों को प्रधानमंत्री का संबोधन दिखाना जरूरी नहीं समझा? अगर ये भूल है तो बहुत बड़ी भूल है और ये ट्रष्ट के पदों के लिए जूतम पैजार करने वाले महानुभावों की विद्यालय में रूचि प्रदर्शित करता है। हाँ एक पहलू और भी हो सकता है कि ये दोनों सज्जन भी नरेंद्र मोदी के लम्बे हो चले कद से असहज महसूस कर रहे हों, कुछ राज्यों के मुख्यमन्त्रियों की तरह! यदि ऐसा है तो ए मेरे नारनौल की एतिहासिक भूमि, तुझे शतशत प्रणाम कि तूने ऐसी मेंढकी पैदा की जिन में पैरों में नाल ठुकवाने की कुव्वत है! तू ही ऐसे सूरमा पैदा कर सकती है। 

Tuesday, 15 April 2014

बम्बा तेरी गली में

कुछ सालों पहले एक पत्रिका में एक हास्य व्यंग पढ़ा था आज के मोदी मय वातावरण को देख कर ताज़ा हो उठा। एक कवि सम्मलेन में कवि ने एक नौजवान पर एक कविता लिखी जो कि रोजाना एक हैंडपंप (बम्बा) से घर का पानी भर के लाता था। हैंडपंप जहाँ लगा था वहीं एक खूबसूरत बाला का घर था और वो उस नौजवान को वहां रोजाना आता देख उस की मजबूरी को उस की आशिकी समझ बैठी। नाजनीन के नाज नखरों से नौजवान को उस की गलतफहमी का आभास हुआ और नौजवान के स्पष्टीकरण को कवि ने कुछ यों प्रस्तुत किया-
हमें नहीं तेरी दरकार, हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि, बम्बा तेरी गली में।
तू हसीं होगी, नाजनीन होगी, लाखों मरते होंगे तेरी अदा पर, हमें क्या?
हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि, बम्बा तेरी गली में।
न घूर हमें इन आँखों से, न दिखा वो टूटी चप्पल,
हम नहीं आते तेरे लिए, हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि, बम्बा तेरी गली ।
न बुला अपने खूंसट बाप को, न पुकार तू लंगड़े भाई को,
हम नहीं डरते उनसे, हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि बम्बा तेरी गली।
‘बम्बा तेरी गली में’ श्रोताओं को इतना पसंद आया कि उन्होंने उसे अपना तकिया कलाम बना लिया।
एक कवि ने कुछ ऊलजलूल कविता पढनी शुरू की
“आसमान का बिछौना बना लूं और धरती की चादर .......” श्रोता उस बेतुके से इतने नाराज हुए कि ‘बम्बा तेरी गली में बम्बा, तेरी गली में’ से पूरा पंडाल गूँज उठा और उस कवि को बैठना ही पड़ा।

‘मोदी सरकार’ का नारा भी आज ‘बम्बा तेरी गली में’ बन गया है। हर चीज में मोदी सरकार! एक दिलजले ने तो कुछ यूँ लिखा “सनी लिओनी को कपडे पहनाने वालो, जनता माफ़ नहीं करेगी.. अब की बार मोदी सरकार।” कुछ मोदी विरोधी कडवाहट भरे फिकरे भी बना रहे हैं। मेरी मोदी समर्थकों और विरोधियों से प्रार्थना है कि कडवाहट भूल जाएँ और मिल कर बोलें .... बम्बा तेरी गली में। 

Sunday, 23 March 2014

स्वाभिमानी गुजरात

गुजरात से मुझे गहरा लगाव है। 1998 में पहली बार वहां जाने के बाद से गुजरात से मेरा रिश्ता कभी नहीं टूटा। साल में दो बार अपने काम के सिलसिले में मैं गुजरात के लगभग हर छोटे बड़े कस्बे की यात्रा करता हूँ। केजरीवाल गुजरात का विकास ढूँढने शायद आँखों पर पट्टी बाँध कर गए थे। अगर उन के पास समय हो तो इस बार मैं उन्हें सड़क मार्ग से दिल्ली से गुजरात की यात्रा करवाउंगा उस के बाद उन्हें लगेगा कि विकास ढूँढने गुजरात जाने की बजाय वैशाली स्थित उन के घर से कुछ किलोमीटर के दायरे में ही ऐसी अनेकों चीजें मिल जाएँगी जिन्हें गुजरात के स्तर पर लाने की उन की तीव्र इच्छा जाग उठेगी। केजरीवाल की ईमानदारी पर शक किये बिना मैं उन से गुजारिश करता हूँ कि सिर्फ विरोध करने के लिए किसी का विरोध उचित नहीं। आपका विरोध रचनात्मक होना चाहिए। केजरीवाल के घर से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र है, छोटे-बड़े अनेक उद्योग हैं। वहां जाने पर उन्हें पता लगेगा कि प्रदूषण विभाग, बिजली विभाग, श्रम विभाग, जिला प्रशासन, आयकर विभाग किस तरह खून चूसने में लगे हैं। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल महोदय को इस बात की जानकारी नहीं है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि वो मूल रूप से राजनेता नहीं सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं (मेरी तरह) और सामाजिक कार्यकर्त्ता का प्रिय खेल है ऊँगली-ऊँगली और ये ऐसा सामाजिक खेल है जिस में कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई जाती बल्कि जहाँ भी पता लगे कि काम ढंग से हो रहा है वहां पहुँच जाओ और ऊँगली करो और ये दिखाओ कि ढंग से काम होने की बात अफवाह है। जिस मैदान में काम ठीक से ना हो रहा हो वो मैदान इस खेल के लिए मुफीद नहीं। इस नियम को अपना धर्म मानते हुए केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने गुजरात का रुख किया। यहाँ मेरा ये मतलब कतई नहीं है कि गुजरात में भ्रष्टाचार नहीं है। पूरे भारत की तरह गुजरात के सरकारी दफ्तरों में भी रिश्वत चलती है आखिर हथेली गरमाना तो हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है। परन्तु गुजरात के जिक्र की पृष्ठभूमि में विरोध भ्रष्टाचार का नहीं मोदी का किया जाना है। बेशक गुजरात की स्थिति बाकी देश से काफी अच्छी है। सड़क, बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों के मामले में अच्छे-अच्छे राज्य गुजरात के सामने पानी भरते हैं। पालनपुर से चलने वाली पानी की ट्रेन अब नहीं मिलती बल्कि कच्छ और सौराष्ट्र के हर गाँव तक पीने का मीठा पानी पहुँच गया है। मैं इस का श्रेय मोदी को भी नहीं दे रहा बल्कि वहां की जनता को दूंगा। 1998 के समुदी तूफ़ान और उस के बाद 2001 के भूकंप के समय मैं भुज में था। मैंने देखा कि किस प्रकार गुजरातियों ने प्रकृति के कहर से उबरते हुए बहुत जल्दी खुद को संभाल लिया। मुझे याद है देश के बाकी हिस्सों से भेजे गए पुराने वस्त्रों को स्वाभिमानी गुजरातियों ने पहनने से इंकार कर दिया था। तीन दिनों से भूखे और जनवरी की ठण्ड में ठिठुरते लोगों ने कहीं भी भोजन-वस्त्र के वितरण में लूटपाट नहीं की। एक मंदिर के प्रांगण से मेरी देख रेख में चल रहे वितरण कार्य में पीड़ितों ने धैर्य और अनुशासन का अद्भुत उदाहरण दिया। जबकि पूर्वी भारत और देश के पूर्वी तट पर आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के समय ऐसा देखने को नहीं मिलता। गुजरातियों के जज्बे को सलाम के साथ ही AAP और  केजरीवाल से मेरी ये गुजारिश है कि मोदी के विरोध में गुजरातियों के स्वाभिमान पर चोट न करने का ध्यान रखें। व्यक्ति का निर्माण समाज ही करता है और कोई आश्चर्य नहीं कि देश के स्वाभिमान की बात करने वाले गाँधी और पटेल (और अब मोदी) गुजरात में ही पैदा हुए।  

Saturday, 22 March 2014

बिजनेस पार्टनर

कुछ समय पहले एक वरिष्ठ और आर्थिक रूप से संम्पन्न साथी ने मेरे सामने बिजनेस पार्टनर बनने का आकर्षक प्रस्ताव रखा उस के पीछे जो कारण उन्होंने बताया वो बड़ा रोचक था। उन्होंने कहा सदा ही हर आदमी उन से बेईमानी करता है और उन्हें धोखा देता है तथा मुझ में उन्हें ईमानदार शख्स नजर आया। मैंने कहा कि जिसे यह लगता है कि सब लोग उसे धोखा ही देते हैं ऐसे व्यक्ति के साथ सांझेदारी खतरनाक है। मेरी ईमानदारी का आधार जो मुझे उन्होंने बताया वो भी कम मज़ेदार नहीं था। वो था मेरे पिता की ईमानदारी, मेरी जाति और मेरी सेना की पृष्ठभूमि। मैंने उन्हें कुछ ईमानदार पिताओं की बेईमान संतानों, मेरी जाति के कुछ भ्रष्टाचारियों तथा कुछ ईमान बेचने वाले फौजियों के नाम गिनाये। अंत मैंने बड़े सम्मान से उन का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और उन से निवेदन किया कि ईमानदार सहयोगी ढूँढने की बजाय कृपया वो कमी दूर करें जिस की वजह से लोग उन्हें धोखा देते हैं। आज वो सज्जन आम आदमी पार्टी में हैं और मुझे यकीन है कि ईमानदार पार्टनर की उन की खोज बंद नहीं हुई है।

Sunday, 16 March 2014

लाल- गुलाबी


बचपन में दूरदर्शन पर आने वाला एक विज्ञापन याद आ रहा है। “ ये क्या भाई साहब आप लाल ही में अटके हैं? ये लीजिये गुलाबी और बड़ा ।“ पहले से स्थापित लाइफबॉय से प्रतिस्पर्धा में ये ओके साबुन का विज्ञापन था।
आम आदमी पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव की हाल ही की जनसभा के बाद एक पत्रकार मित्र ने पूछ लिया कि क्या मैं आआपा में शामिल हो गया। उनका सवाल जायज भी था क्यों कि मैंने इस कार्यक्रम का मंच संचालन किया था। आम आदमी पार्टी के प्रति अपने झुकाव को मैं कभी नहीं छुपाता और अक्सर इस के कार्यक्रमों में भी शामिल होता रहता हूँ। इसी वजह से कुछ साथियों के निशाने पर अक्सर रहता हूँ। कारण कि जिन मुद्दों को ले कर हम साथियों ने जनलोकपाल आन्दोलन में भाग लिया, धरने, प्रदर्शन, यात्राएँ की, आआपा की विचार धारा में उस की झलक दिखती है । परन्तु किसी राजनैतिक दल में शामिल होने का फैसला छोटा नहीं होता। योगेन्द्र यादव की जनसभा भी इस फैसले को रोके रखने का एक मजबूत कारण ही साबित हुई। अपनी मृदु भाषा में उन्होंने प्रभावित करने वाले विचार रखे और उस के बाद मैंने कई व्यक्तिओं को भावुक होते पाया। उन्होंने अपना एजेंडा भी बताया। किसान, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा आदि विषयों पर भी सावधानी पूर्वक प्रकाश डाला। पर ये कहानियां तो हम लोग कब से सुनते आ रहे हैं। उन्होंने ग्राम स्वराज की बात की। उन्होंने कहा कि गाँव मृत हो चुके हैं। लगा कि आआपा की सरकार आएगी तो ग्राम स्वराज आ जायेगा गाँव फलेंगे फूलेंगे। अच्छा लगता है सुनने में! पर हकीकत ये है कि गाँव मरे  नहीं हैं बल्कि उन की हत्या कर दी गई है और उन के हत्यारे हैं मंचों पर खड़े हो कर सपने दिखाने वाले राजनेता। हर किसान की आत्महत्या की खबर पर किसी फ़िल्मी  डायलॉग की तरह कानों में आवाज गूंजती है “ये आत्महत्या नहीं हत्या है।“ ऐसा लगता है कि योगेन्द्र यादव जैसे लोगों को व्यवस्था परिवर्तन की जल्दबाजी है और इसी लिए सदस्यता अभियान, पार्टी, झाड़ू जैसे सत्ता प्राप्ति के पुराने परन्तु कारगर हथकंडे अपनाते दिखाई देते हैं। ऐसे में क्या आश्चर्य कि चार पैसे खर्च करके कुछ लोग खम्बों पर लटके मिलते हैं। राजनीति में कैरियर तलाशते राजनैतिक दलों के द्वारा लतियाये और धकियाये छुटभैयों, मेलों में होती कुश्तियों में भारी दान दे कर मुख्यातिथि बनते चेहरा चमकाऊओं  और खम्बों पर लटक दिसंबर-जनवरी की ठण्ड में ठिठुरते महानुभावों के आआपा की कश्ती में सवार होने की कार्यकर्ताओं की चिंता पर योगेन्द्र जी ने बड़ा सरल और देसी उदाहरण दिया कि गाडी में सवार  होने वाले लोग पहले बाहर से चिल्लाते हैं कि खोलो आने दो और फिर अन्दर घुस कर दूसरे घुसने वाले यात्रियों पर चिल्लाते हैं कि जगह नहीं है। महोदय आप के उदाहरण में थोड़ी कमी रह गयी। हो ये रहा है कि कुछ लोगों ने गाड़ी तैयार की और उन में से एक ड्राईवर की सीट पर बैठ बाकी सब को गच्चा दे कर किन्हीं दूसरों को ही बैठा कर गाड़ी भगा ले गया।
ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे के सीधे, सरल और निर्दोष विचारों को ले कर चलने वाले केजरीवालों और मनीष सिसोदियाओं सरीखे सामाजिक कार्यकर्ताओं को योगेन्द्र यादव जैसे ‘प्रचलित दूषित’ राजनीति की गोद में पले धुरंधरों की सोच का ग्रहण लग गया है और आआपा की राजनीति उन्ही विचारों के इर्दगिर्द घूमती नजर आती हैं। सत्ता प्राप्ति से परिवर्तन के विचार में कुछ भी बुरा नहीं है परन्तु वह विचार अपनी सोच में लाना होगा। सब से बड़ी चिंता है कि क्या सत्ता हथिया कर गावों में स्वराज आएगा? बल्कि क्या ऐसे एक और भ्रष्ट जमात खड़े होने का खतरा नहीं है जैसा कि जेपी के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन के बाद हुआ। जिस गाड़ी का जिक्र योगेन्द्र यादव ने किया सचमुच वैसी ही गाड़ी फिर से तैयार हो रही है। चुनाव, पार्टी और प्रचार के हथकंडों ने व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को कहीं पीछे धकेल दिया है। एक गंभीर प्रयास को ले कर बनी पार्टी राजनीति में कैरियर तलाशते लोगों का लॉन्चिंग पैड बनती जा रही है। बदलाव रातों-रात तो नहीं आते उन के लिए समय देना होता है बलिदान करना होता है। भाजपा जैसी पार्टी को खड़े करने में आरएसएस के लाखों स्वयंसेवकों ने अपना जीवन संगठन को समर्पित कर दिया। संपन्न घरों के नवयुवक भिक्षा के भोजन से गुजारा कर के संगठन के लिए अपना जीवन दे रहे हैं तब आरएसएस का वजूद है। आरएसएस को साम्प्रदायिक कह कर पल्ला झाड़ने वालों को इस की कार्यशैली से जरूर सीखना चाहिए। आआपा को सीखना होगा उन कामरेडों से जो कंधे पर झोला लटका कर चने खा कर पैदल घूमते घूमते बूढ़े हो गए। कांग्रेस बनने के 65 साल बाद आजादी मिली और कम से कम आम आदमी पार्टी को तो यह सीखना ही चाहिए कि कुछ लोग जो गुमनाम रह कर बलिदान देने को तैयार नहीं होंगे तब तक ना तो व्यवस्था बदलेगी ना ही पार्टी ही खडी होगी। गांवों की स्थिति तब सुधरेगी जब वहां जा कर गाँव के सामाजिक ढांचे को मजबूत किया जायेगा। सरपंच समर्थक, विरोधी और तटस्थ, तीन खेमों में बंटे लोगों को जब तक एक चबूतरे पर ला कर सामाजिक ढांचा ठीक नहीं किया जायेगा गाँव आबाद नहीं होंगे। अगर व्यवस्था बदलनी है तो त्याग करना होगा, बलिदान देने होंगे। ब्रांड वही चलेगा जो बेहतर भी होगा सिर्फ गुलाबी और बड़ा होने से काम नहीं चलने वाला।