poems

Tuesday, 15 April 2014

बम्बा तेरी गली में

कुछ सालों पहले एक पत्रिका में एक हास्य व्यंग पढ़ा था आज के मोदी मय वातावरण को देख कर ताज़ा हो उठा। एक कवि सम्मलेन में कवि ने एक नौजवान पर एक कविता लिखी जो कि रोजाना एक हैंडपंप (बम्बा) से घर का पानी भर के लाता था। हैंडपंप जहाँ लगा था वहीं एक खूबसूरत बाला का घर था और वो उस नौजवान को वहां रोजाना आता देख उस की मजबूरी को उस की आशिकी समझ बैठी। नाजनीन के नाज नखरों से नौजवान को उस की गलतफहमी का आभास हुआ और नौजवान के स्पष्टीकरण को कवि ने कुछ यों प्रस्तुत किया-
हमें नहीं तेरी दरकार, हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि, बम्बा तेरी गली में।
तू हसीं होगी, नाजनीन होगी, लाखों मरते होंगे तेरी अदा पर, हमें क्या?
हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि, बम्बा तेरी गली में।
न घूर हमें इन आँखों से, न दिखा वो टूटी चप्पल,
हम नहीं आते तेरे लिए, हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि, बम्बा तेरी गली ।
न बुला अपने खूंसट बाप को, न पुकार तू लंगड़े भाई को,
हम नहीं डरते उनसे, हम आते हैं यहाँ,
क्योंकि बम्बा तेरी गली।
‘बम्बा तेरी गली में’ श्रोताओं को इतना पसंद आया कि उन्होंने उसे अपना तकिया कलाम बना लिया।
एक कवि ने कुछ ऊलजलूल कविता पढनी शुरू की
“आसमान का बिछौना बना लूं और धरती की चादर .......” श्रोता उस बेतुके से इतने नाराज हुए कि ‘बम्बा तेरी गली में बम्बा, तेरी गली में’ से पूरा पंडाल गूँज उठा और उस कवि को बैठना ही पड़ा।

‘मोदी सरकार’ का नारा भी आज ‘बम्बा तेरी गली में’ बन गया है। हर चीज में मोदी सरकार! एक दिलजले ने तो कुछ यूँ लिखा “सनी लिओनी को कपडे पहनाने वालो, जनता माफ़ नहीं करेगी.. अब की बार मोदी सरकार।” कुछ मोदी विरोधी कडवाहट भरे फिकरे भी बना रहे हैं। मेरी मोदी समर्थकों और विरोधियों से प्रार्थना है कि कडवाहट भूल जाएँ और मिल कर बोलें .... बम्बा तेरी गली में। 

Sunday, 23 March 2014

स्वाभिमानी गुजरात

गुजरात से मुझे गहरा लगाव है। 1998 में पहली बार वहां जाने के बाद से गुजरात से मेरा रिश्ता कभी नहीं टूटा। साल में दो बार अपने काम के सिलसिले में मैं गुजरात के लगभग हर छोटे बड़े कस्बे की यात्रा करता हूँ। केजरीवाल गुजरात का विकास ढूँढने शायद आँखों पर पट्टी बाँध कर गए थे। अगर उन के पास समय हो तो इस बार मैं उन्हें सड़क मार्ग से दिल्ली से गुजरात की यात्रा करवाउंगा उस के बाद उन्हें लगेगा कि विकास ढूँढने गुजरात जाने की बजाय वैशाली स्थित उन के घर से कुछ किलोमीटर के दायरे में ही ऐसी अनेकों चीजें मिल जाएँगी जिन्हें गुजरात के स्तर पर लाने की उन की तीव्र इच्छा जाग उठेगी। केजरीवाल की ईमानदारी पर शक किये बिना मैं उन से गुजारिश करता हूँ कि सिर्फ विरोध करने के लिए किसी का विरोध उचित नहीं। आपका विरोध रचनात्मक होना चाहिए। केजरीवाल के घर से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र है, छोटे-बड़े अनेक उद्योग हैं। वहां जाने पर उन्हें पता लगेगा कि प्रदूषण विभाग, बिजली विभाग, श्रम विभाग, जिला प्रशासन, आयकर विभाग किस तरह खून चूसने में लगे हैं। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल महोदय को इस बात की जानकारी नहीं है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि वो मूल रूप से राजनेता नहीं सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं (मेरी तरह) और सामाजिक कार्यकर्त्ता का प्रिय खेल है ऊँगली-ऊँगली और ये ऐसा सामाजिक खेल है जिस में कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई जाती बल्कि जहाँ भी पता लगे कि काम ढंग से हो रहा है वहां पहुँच जाओ और ऊँगली करो और ये दिखाओ कि ढंग से काम होने की बात अफवाह है। जिस मैदान में काम ठीक से ना हो रहा हो वो मैदान इस खेल के लिए मुफीद नहीं। इस नियम को अपना धर्म मानते हुए केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने गुजरात का रुख किया। यहाँ मेरा ये मतलब कतई नहीं है कि गुजरात में भ्रष्टाचार नहीं है। पूरे भारत की तरह गुजरात के सरकारी दफ्तरों में भी रिश्वत चलती है आखिर हथेली गरमाना तो हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है। परन्तु गुजरात के जिक्र की पृष्ठभूमि में विरोध भ्रष्टाचार का नहीं मोदी का किया जाना है। बेशक गुजरात की स्थिति बाकी देश से काफी अच्छी है। सड़क, बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों के मामले में अच्छे-अच्छे राज्य गुजरात के सामने पानी भरते हैं। पालनपुर से चलने वाली पानी की ट्रेन अब नहीं मिलती बल्कि कच्छ और सौराष्ट्र के हर गाँव तक पीने का मीठा पानी पहुँच गया है। मैं इस का श्रेय मोदी को भी नहीं दे रहा बल्कि वहां की जनता को दूंगा। 1998 के समुदी तूफ़ान और उस के बाद 2001 के भूकंप के समय मैं भुज में था। मैंने देखा कि किस प्रकार गुजरातियों ने प्रकृति के कहर से उबरते हुए बहुत जल्दी खुद को संभाल लिया। मुझे याद है देश के बाकी हिस्सों से भेजे गए पुराने वस्त्रों को स्वाभिमानी गुजरातियों ने पहनने से इंकार कर दिया था। तीन दिनों से भूखे और जनवरी की ठण्ड में ठिठुरते लोगों ने कहीं भी भोजन-वस्त्र के वितरण में लूटपाट नहीं की। एक मंदिर के प्रांगण से मेरी देख रेख में चल रहे वितरण कार्य में पीड़ितों ने धैर्य और अनुशासन का अद्भुत उदाहरण दिया। जबकि पूर्वी भारत और देश के पूर्वी तट पर आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के समय ऐसा देखने को नहीं मिलता। गुजरातियों के जज्बे को सलाम के साथ ही AAP और  केजरीवाल से मेरी ये गुजारिश है कि मोदी के विरोध में गुजरातियों के स्वाभिमान पर चोट न करने का ध्यान रखें। व्यक्ति का निर्माण समाज ही करता है और कोई आश्चर्य नहीं कि देश के स्वाभिमान की बात करने वाले गाँधी और पटेल (और अब मोदी) गुजरात में ही पैदा हुए।  

Saturday, 22 March 2014

बिजनेस पार्टनर

कुछ समय पहले एक वरिष्ठ और आर्थिक रूप से संम्पन्न साथी ने मेरे सामने बिजनेस पार्टनर बनने का आकर्षक प्रस्ताव रखा उस के पीछे जो कारण उन्होंने बताया वो बड़ा रोचक था। उन्होंने कहा सदा ही हर आदमी उन से बेईमानी करता है और उन्हें धोखा देता है तथा मुझ में उन्हें ईमानदार शख्स नजर आया। मैंने कहा कि जिसे यह लगता है कि सब लोग उसे धोखा ही देते हैं ऐसे व्यक्ति के साथ सांझेदारी खतरनाक है। मेरी ईमानदारी का आधार जो मुझे उन्होंने बताया वो भी कम मज़ेदार नहीं था। वो था मेरे पिता की ईमानदारी, मेरी जाति और मेरी सेना की पृष्ठभूमि। मैंने उन्हें कुछ ईमानदार पिताओं की बेईमान संतानों, मेरी जाति के कुछ भ्रष्टाचारियों तथा कुछ ईमान बेचने वाले फौजियों के नाम गिनाये। अंत मैंने बड़े सम्मान से उन का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और उन से निवेदन किया कि ईमानदार सहयोगी ढूँढने की बजाय कृपया वो कमी दूर करें जिस की वजह से लोग उन्हें धोखा देते हैं। आज वो सज्जन आम आदमी पार्टी में हैं और मुझे यकीन है कि ईमानदार पार्टनर की उन की खोज बंद नहीं हुई है।

Sunday, 16 March 2014

लाल- गुलाबी


बचपन में दूरदर्शन पर आने वाला एक विज्ञापन याद आ रहा है। “ ये क्या भाई साहब आप लाल ही में अटके हैं? ये लीजिये गुलाबी और बड़ा ।“ पहले से स्थापित लाइफबॉय से प्रतिस्पर्धा में ये ओके साबुन का विज्ञापन था।
आम आदमी पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव की हाल ही की जनसभा के बाद एक पत्रकार मित्र ने पूछ लिया कि क्या मैं आआपा में शामिल हो गया। उनका सवाल जायज भी था क्यों कि मैंने इस कार्यक्रम का मंच संचालन किया था। आम आदमी पार्टी के प्रति अपने झुकाव को मैं कभी नहीं छुपाता और अक्सर इस के कार्यक्रमों में भी शामिल होता रहता हूँ। इसी वजह से कुछ साथियों के निशाने पर अक्सर रहता हूँ। कारण कि जिन मुद्दों को ले कर हम साथियों ने जनलोकपाल आन्दोलन में भाग लिया, धरने, प्रदर्शन, यात्राएँ की, आआपा की विचार धारा में उस की झलक दिखती है । परन्तु किसी राजनैतिक दल में शामिल होने का फैसला छोटा नहीं होता। योगेन्द्र यादव की जनसभा भी इस फैसले को रोके रखने का एक मजबूत कारण ही साबित हुई। अपनी मृदु भाषा में उन्होंने प्रभावित करने वाले विचार रखे और उस के बाद मैंने कई व्यक्तिओं को भावुक होते पाया। उन्होंने अपना एजेंडा भी बताया। किसान, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा आदि विषयों पर भी सावधानी पूर्वक प्रकाश डाला। पर ये कहानियां तो हम लोग कब से सुनते आ रहे हैं। उन्होंने ग्राम स्वराज की बात की। उन्होंने कहा कि गाँव मृत हो चुके हैं। लगा कि आआपा की सरकार आएगी तो ग्राम स्वराज आ जायेगा गाँव फलेंगे फूलेंगे। अच्छा लगता है सुनने में! पर हकीकत ये है कि गाँव मरे  नहीं हैं बल्कि उन की हत्या कर दी गई है और उन के हत्यारे हैं मंचों पर खड़े हो कर सपने दिखाने वाले राजनेता। हर किसान की आत्महत्या की खबर पर किसी फ़िल्मी  डायलॉग की तरह कानों में आवाज गूंजती है “ये आत्महत्या नहीं हत्या है।“ ऐसा लगता है कि योगेन्द्र यादव जैसे लोगों को व्यवस्था परिवर्तन की जल्दबाजी है और इसी लिए सदस्यता अभियान, पार्टी, झाड़ू जैसे सत्ता प्राप्ति के पुराने परन्तु कारगर हथकंडे अपनाते दिखाई देते हैं। ऐसे में क्या आश्चर्य कि चार पैसे खर्च करके कुछ लोग खम्बों पर लटके मिलते हैं। राजनीति में कैरियर तलाशते राजनैतिक दलों के द्वारा लतियाये और धकियाये छुटभैयों, मेलों में होती कुश्तियों में भारी दान दे कर मुख्यातिथि बनते चेहरा चमकाऊओं  और खम्बों पर लटक दिसंबर-जनवरी की ठण्ड में ठिठुरते महानुभावों के आआपा की कश्ती में सवार होने की कार्यकर्ताओं की चिंता पर योगेन्द्र जी ने बड़ा सरल और देसी उदाहरण दिया कि गाडी में सवार  होने वाले लोग पहले बाहर से चिल्लाते हैं कि खोलो आने दो और फिर अन्दर घुस कर दूसरे घुसने वाले यात्रियों पर चिल्लाते हैं कि जगह नहीं है। महोदय आप के उदाहरण में थोड़ी कमी रह गयी। हो ये रहा है कि कुछ लोगों ने गाड़ी तैयार की और उन में से एक ड्राईवर की सीट पर बैठ बाकी सब को गच्चा दे कर किन्हीं दूसरों को ही बैठा कर गाड़ी भगा ले गया।
ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे के सीधे, सरल और निर्दोष विचारों को ले कर चलने वाले केजरीवालों और मनीष सिसोदियाओं सरीखे सामाजिक कार्यकर्ताओं को योगेन्द्र यादव जैसे ‘प्रचलित दूषित’ राजनीति की गोद में पले धुरंधरों की सोच का ग्रहण लग गया है और आआपा की राजनीति उन्ही विचारों के इर्दगिर्द घूमती नजर आती हैं। सत्ता प्राप्ति से परिवर्तन के विचार में कुछ भी बुरा नहीं है परन्तु वह विचार अपनी सोच में लाना होगा। सब से बड़ी चिंता है कि क्या सत्ता हथिया कर गावों में स्वराज आएगा? बल्कि क्या ऐसे एक और भ्रष्ट जमात खड़े होने का खतरा नहीं है जैसा कि जेपी के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन के बाद हुआ। जिस गाड़ी का जिक्र योगेन्द्र यादव ने किया सचमुच वैसी ही गाड़ी फिर से तैयार हो रही है। चुनाव, पार्टी और प्रचार के हथकंडों ने व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को कहीं पीछे धकेल दिया है। एक गंभीर प्रयास को ले कर बनी पार्टी राजनीति में कैरियर तलाशते लोगों का लॉन्चिंग पैड बनती जा रही है। बदलाव रातों-रात तो नहीं आते उन के लिए समय देना होता है बलिदान करना होता है। भाजपा जैसी पार्टी को खड़े करने में आरएसएस के लाखों स्वयंसेवकों ने अपना जीवन संगठन को समर्पित कर दिया। संपन्न घरों के नवयुवक भिक्षा के भोजन से गुजारा कर के संगठन के लिए अपना जीवन दे रहे हैं तब आरएसएस का वजूद है। आरएसएस को साम्प्रदायिक कह कर पल्ला झाड़ने वालों को इस की कार्यशैली से जरूर सीखना चाहिए। आआपा को सीखना होगा उन कामरेडों से जो कंधे पर झोला लटका कर चने खा कर पैदल घूमते घूमते बूढ़े हो गए। कांग्रेस बनने के 65 साल बाद आजादी मिली और कम से कम आम आदमी पार्टी को तो यह सीखना ही चाहिए कि कुछ लोग जो गुमनाम रह कर बलिदान देने को तैयार नहीं होंगे तब तक ना तो व्यवस्था बदलेगी ना ही पार्टी ही खडी होगी। गांवों की स्थिति तब सुधरेगी जब वहां जा कर गाँव के सामाजिक ढांचे को मजबूत किया जायेगा। सरपंच समर्थक, विरोधी और तटस्थ, तीन खेमों में बंटे लोगों को जब तक एक चबूतरे पर ला कर सामाजिक ढांचा ठीक नहीं किया जायेगा गाँव आबाद नहीं होंगे। अगर व्यवस्था बदलनी है तो त्याग करना होगा, बलिदान देने होंगे। ब्रांड वही चलेगा जो बेहतर भी होगा सिर्फ गुलाबी और बड़ा होने से काम नहीं चलने वाला। 

Sunday, 13 October 2013

आआपा का स्यापा

आम आदमी पार्टी की चर्चा करने के लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन से अच्छा मौका क्या हो सकता है। जेपी जी ने सम्पूर्ण क्रांति के लिए पूरे देश को उस समय जगाया जब इलेक्ट्रोनिक और सोशल मीडिया तो दूर की बात, समाचार पत्रों पर भी पाबन्दी लगा दी गयी थी। सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा ले कर जनता पार्टी सत्ता में आई। परन्तु साल भर में देश को बदलने का दावा करने वाली पार्टी का साल भर में ये हाल हो गया कि देश के साथ-साथ जेपी को भी जनता पार्टी ही सब से बड़ी समस्या नजर आने लगी और फिर इस आन्दोलन से निकले मुलायमों, पासवानों और लालुओं ने आने वाले समय में भ्रष्टाचार का ऐसा कहर बरपाया कि इन्सान तो इन्सान पशुओं तक को नहीं बक्शा।

अन्ना आन्दोलन के रूप में देश के सामने फिर मौका आया। हालात ऐसे बने कि आम आदमी पार्टी के नाम से एक और राजनैतिक दल बन गया और सहमति के बावजूद अंतिम समय में अन्ना जी का विवेक जागा तथा उन्होंने खुद को पार्टी से अलग कर के अपने आप को जेपी बनने से बचा लिया। मेरा सदा ये मानना रहा है कि प्रचलित व्यवस्था चाहे कितनी भी ख़राब हो उसे तब तक चुनौती नहीं देनी चाहिए जब तक उस का स्थान लेने के लिए आप के पास उस से बेहतर व्यवस्था न हो। परन्तु लगता है कि आआपा के जनकों ने इस और ध्यान नहीं दिया और एक इंस्टेंट पार्टी बना कर खडी  कर दी।  भोजन और विवाह तक में इंस्टेंट के आदि हो चुके समाज को इंस्टेंट विकल्प सुझाया गया। परन्तु ये जनक ‘इंस्टेंट’ संस्कृति के साईड इफेक्ट्स को भूल गए। अपने अधिकतर साथियों को गँवा चुकी आआपा से किसी चमत्कार की उम्मीद मुश्किल ही है। हाँ अवश्य ही एक राजनैतिक विकल्प की जरूरत है परन्तु ऐसा लगता है कि इस विकल्प को आकार देने में बहुत जल्दबाजी की गयी है। ऐसी ही एक जल्दबाजी देश की आजादी के समय की गयी थी उस की कीमत देश के टुकड़ों के रूप में चुकानी पड़ी, जिस का दर्द अब भी नहीं गया। जैसे आजादी के समय देश के नेताओं को डर था कि कहीं अंग्रेज देश छोड़ने से इंकार न कर दे, ऐसा लगता है कि उसी तरह आआपा बनाने वाले साथियों को लग रह था  कि कहीं उन के सहयोग के बिना ही भ्रष्टाचार ख़त्म न हो जाये। कहीं ऐसा न हो कि आआपा भी भ्रष्ट राजनेताओं की एक पूरी जमात खड़ी कर दे और उस से निपटने को फिर किसी अन्ना को रामलीला मैदान में अनशन करना पड़े। जिस तरह के समाचार आ रहे हैं ऐसे में बहुत मुमकिन है कि आआपा के जहाज में मौकापरस्त सवार हो कर इसे डूबा दें और ऐसा होना तय है क्योंकि मौकापरस्त हवा का रुख भांप अपने फायदे के लिए मिल कर काम करने में सक्षम होते हैं और ईमानदार अड़ियल और घमंडी बने रह कर समाज का बहुत बड़ा नुकसान कर देते हैं। एक तरफ जनलोकपाल आन्दोलन में इकठ्ठा हुए देशभक्त और ईमानदार लोग आआपा से दूरी बना चुके हैं और वहीँ दूसरी और RTI ब्लेकमेलरों तथा भ्रष्ट लोगों के पार्टी से जुड़ने की ख़बरें आ रही हैं। हालांकि दिल्ली जा कर आआपा में शामिल हुए बिना ही किसी अच्छे उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने पर मैं गंभीरता से विचार कर रहा हूँ परन्तु इस जल्दबाजी ने मेरे जैसे अनेक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं को अब तक आआपा से बाहर रोके रखा है। 

Saturday, 12 October 2013

बर्बाद गुलिस्ताँ


नारनौल शहर को बर्बाद करने में किस का हाथ है? नगर परिषद् का, शहरियों का, या फिर प्रशासन का? घंटे भर की बारिश में ही आखिर क्यों शहर जलमग्न हो जाता है? कारण है प्राकृतिक जलाशयों की समाप्ति. नगर परिषद्  की नाक के नीचे पानी भरा रहता है. इस क्षेत्र का वर्षा का पानी टेलिफोन एक्सचेन्ज के पीछे स्थित तेलिया जोहड़ में जाता था. तेलिया जोहड़ के सभी जलमार्गों को अवरुद्ध कर के इस जोहड़ का गला दबा दिया गया. आधे जोहड़ को तो मिट्टी से भर दिया गया और बाकी आधा दूषित पानी से भरा है और वहां जलकुम्भी का वास है. स्वच्छ जल से भरा रहने वाला यह जोहड़ अनेकों विशाल वृक्षों और प्राणियों का निवास स्थान था. परन्तु इस खूब सूरत और विशाल तालाब की हत्या कर के इसे एक राजनैतिक पार्टी द्वारा संचालित ट्रष्ट को सौंप दिया गया. नतीजा है जमाल पुर और नगर परिषद् के आसपास पानी इकठ्ठा होना. सेन चौक जलभराव का अगला गवाह है. यहाँ भी एक छोटा सा जोहड़ था और नयी तथा पुरानी सराय का पानी यहाँ आ कर इकठ्ठा होता था. इस जोहड़ को रोक कर मकान बना दिया गया.  नलापुर और मोहल्ला रावका में पानी खड़ा होने का कारण है छिप्पी जोहड़ को बंद कर के वहां शॉपिंग काम्प्लेक्स खड़ा करना. रेवाड़ी रोड पर बरसाती जल के प्राकृतिक मार्गों को अवरुद्ध कर के बस स्टैंड के पीछे स्थित जोहड़ के स्थान पर कालोनी बन जाना है. लालची भूमाफिया, भ्रष्ट नगर परिषद्, बधिर प्रशासन और आँखों पर पट्टी बांधें मूक नगर निवासी इन जलायाशों के हत्यारे हैं.
असम में एक शहर है तेजपुर. हमारे नारनौल की तरह ही गौरव शाली अतीत लिए. ब्रहमपुत्र नदी के किनारे बसे तेजपुर की भोगोलिक स्थिति भी हमारे जैसी ही है. तेजपुर में भी बहुत सारे जलाशय थे पर उन्हें लालच की भेंट नहीं चढ़ने दिया गया बल्कि वहां के जागरूक शहरियों के प्रयास ने उन का सौन्दर्यीकरण कर के उन्हें शहर का गौरव बनाया. किनारों पर पार्क, लाईटें, सफाई की व्यवस्था की गयी. और हम लोगों ने इस का उलट किया. शहर के बीचों बीच बह रही छलक नदी को मार कर उसे गंदे नाले में बदल दिया और प्राकृतिक जलाशय लालच की भेंट चढ़ गए. हमें अपनी एतिहासिक और प्राकृतिक विरासत सँभालना सीखने के लिए विदेश जाने की जरूरत नहीं है बल्कि तेजपुर जैसे अनेकों उदाहरण हमारे देश में ही हैं. आईये थोडा सा समय अपने शहर के बारे में सोचने को भी दें.  अपने शहर को बचाने के लिए लाइक करें  https://www.facebook.com/groups/150259955163830/      

Wednesday, 9 October 2013

पुनर्मूषको भव:

 
बचपन में सुनाई जाने वाली हजारों साल पुरानी कहानियां जब तब सार्थक हो उठती हैं। कल ही की बात है। आवारा सांडों से चिंतित एक साथी गोपाल गौशाला गए। वहां से उन्हें जवाब मिला कि सांड पकड़ना नगर परिषद् का काम है। ये भाई साहब नगर परिषद् प्रधान पति के पास गए।(चलिए ये भी अच्छा हुआ कि राष्ट्रपति के बाद किसी दूसरे मर्द पद जा सृजन हुआ है।) प्रधान पति का कहना था कि गौशाला प्रधान सब कुछ लूट कर खा रहा है उस से कहो वो पकडवाएगा। येल्लो जी हम तो अब तक प्रधानपति को ही सब से बड़ा कलाकार समझते रहे पर इन से भी ताकतवर कोई है। कहीं फिर उन से भी बड़ा कलाकार ढूंढना पड़े और अंत में यही हो कि चुनाव की छड़ी घूम जाये और जनता कहे पुनर्मूषको भवः।