poems

Saturday, 11 October 2025

Without lies Islam dies

 बस यही फर्क है इस्लाम में और सनातन धर्म में। इस्लाम आपको कहता है कि आंख बंद करके मान लो और सनातन धर्म कहता है कि नहीं प्रमाण मांगो, शंका उठाओ, बहस करो। कुरान कहती है कि ये है खुदा का आखिरी कलाम और उसके बाद ढक्कन बंद! किंतु गीता कहती है कि युद्ध भूमि में खड़े होकर भी आपको स्वयं भगवान से अपनी शंका का समाधान करने का हक है! प्रश्न पूछ रे अर्जुन! नास्तिक दर्शन- आस्तिक दर्शन, वाम मार्ग-दक्षिण मार्ग, नानक पंथी, दादू पंथी, कबीर पंथी, सतनामी, पौराणिक, आर्यसमाजी ... कितनी धाराएं! कितना ज्ञान! कितने प्रश्न! कितने समाधान! कोई किसी के खून का प्यासा नहीं! कोई किसी को काफिर कह के नहीं मार रहा। मुसलमान की पढ़ाई भी कुरान की तर्ज पर हो रही है। कोई सवाल नहीं कोई भी विवेचना नहीं, बस मान लो! किंतु कम से कम भारत में तो इसका कारण शिक्षा व्यवस्था ही है कि सच्चाई जानबूझकर दबा दी गई। नई रिसर्च तो जहां-तहां, इस्लामी समकालीन लेखकों द्वारा इस्लामी किताबों में लिखे गए हिंदुओं पर अत्याचारों को भी पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया। क्योंकि उस वक्त मुस्लिम नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में था वह स्वयं को तुर्की और अरबी ही मानते थे। उन्होंने हिंदुओं को गंगा जमुनी तहजीब के नाम से भरमाया और मुसलमान को यह भरोसा दिला दिया कि आप अरबी और तुर्की ही हो! असल में तो इस्लामियों के सबसे अधिक अत्याचार मुसलमान पर ही हुए हैं लेकिन सिर्फ एक सोच ने कि 'बस मान लो' उन को दिमागी कुंद कर दिया! अपने भाई का सिर काट कर अपने बाप को भेजने वाला औरंगजेब उनका आदर्श है और रामनामी चादर ओढ कर घूमने वाला, वेद उपनिषदों का अनुवाद फारसी में करवाने वाला दारा शिकोह काफ़िर! दिक्कत ये है कि मुसलमान सवाल नहीं पूछता बस मान लेता है। उसे सवाल पूछने वाली व्यवस्था तक रास नहीं आती इसीलिए किसी इस्लामी देश में लोकतंत्र कामयाब नहीं होता। जिस दिन मुसलमान सवाल पूछने लगेगा चीजें अपने आप ठीक होने लगेंगी। क्योंकि -

Without lies Islam dies!

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दलित कार्ड

 वाकई दलित कार्ड हर बार ताश के खेल का हुकुम का इक्का साबित होता है। ये सामने आया नहीं कि बाकी 51 पत्ते ज़मीन पर लंबलेट! चला तो यह गया बी. आर. गवई पर जूता फेंकने के मामले में भी था, लेकिन जिसको इन्होंने हुकुम का इक्का समझ कर पटका मारा था वो तो चिड़ी  का गुलाम निकला और हुकुम का इक्का राकेश आनंद के हाथ से मुस्कुराता हुआ बाहर आया। राकेश आनंद की एक ही बात ने कि गवई कहां का दलित वो तो बौद्ध है, असली वाला दलित या SC तो मैं हूं, जैसे वामपंथी-मिशनरी गठबंधन की धोती का धागा ही खींच दिया। इस डर से कि अब दलित> नव बौद्ध> ईसाई रूट का भांडा फूटेगा कि कैसे घाल मेल करके SC में नवबौद्धों को शामिल किया गया, चुप्पी छा गई। जैसे ताश के खेल में हुकुम के इक्के को ब्रह्मास्त्र कहते हैं वैसे ही दलित कार्ड भी अचूक है। किंतु अफसोस है कि हर बार ये विघटनकारियों के हाथ में ही मिलता है जो हर चाल के बाद समाज या राष्ट्र का कुछ हिस्सा जरूर तोड़ता है। इस बार इसका राकेश आनंद के हाथ में मिलना एक सुखद संयोग ही कहिए।

क्या आपको सूनपेड याद है? अजी वही पलवल के पास एक गांव में दो दलित बच्चों को सोए हुए ही जला दिया था। दलित कार्ड चला गया और मासूम बच्चों को जिंदा जलाने के  इल्ज़ाम में 11 'ऊंची जाति के दबंग ठाकुर सामंत' जेल चले गए। पुलिस की शुरुआती जांच में ही सामने आ गया था कि केरोसिन बाहर से नहीं फेंका गया बल्कि घर के अंदर से ही कुछ हुआ है। किंतु फिर से 51 पत्ते हुकुम के इक्के के सामने पस्त हो गए। निर्दोष मनुवादी पड़ोसी गिरफ्तार हुए, रोला हुआ और अंत में जांच सीबीआई के पास आ गई। जाँच में सीबीआई ने 11 के 11 आरोपियों को निर्दोष पाया विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें दोष मुक्त भी कर दिया। फौजदारी मुकदमे पूरे के पूरे परिवारों को बर्बाद कर देते हैं! इन आरोपियों के परिवारों पर क्या बीती होगी यह तो वही जाने, किंतु फिर उन दो मासूम बच्चों की मौत का जिम्मेवार कौन था? दलिल कार्ड के नीचे असल अपराधी छिप गया। हो सकता है कि वो परिवार का सदस्य या उन बच्चों का पिता ही हो। जो भी हो एक अपराधी उसी समाज के बीच खुला घूम रहा होगा जिसकी रक्षा के लिए दलित कार्ड बना था। ये दलित समाज के लिए अच्छा हुआ या बुरा? उस समय हरियाणा में बीजेपी सरकार बने कुछ ही समय हुआ था जो दलित कार्ड के सामने घुटनों पर आ गई थी।

पिछले सप्ताह हरियाणा के ही पुलिस अधिकारी वाई पूर्ण कुमार ने आत्महत्या कर ली उन्होंने अपने सुसाइड नोट में जातीय प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं। राज्य में इस बार भी भाजपा सरकार है। राज्य कोई भी हो पर भाजपा सरकार दलित कार्ड से कायरता की हद तक भयभीत रहती है। आनन फानन में आला अधिकारियों पर गाज गिरी, डीजीपी तक को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया। इससे पहले मृत आईपीएस अधिकारी के गनमैन को एक शराब कारोबारी से रिश्वत मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गनमैन का कहना है कि वह वाई पूर्ण कुमार के कहने पर ही यह राशि मांग रहा था। जजों, आईएएस तथा आईपीएस अधिकारियों का बे हिसाब संपत्ति अर्जित करना अब जग जाहिर है। कहते हैं राज्य के लगभग 70% आईपीएस अधिकारियों के पास 500 करोड़ से ऊपर की संपत्ति है। बड़े बड़े अधिकारी शराब के कारोबार में हिस्सा डालते हैं, इनके होटल रिसोर्ट और शराब के अहाते चलते हैं, सरकारी ठेकों में इनका हिस्सा रहता है और ईमानदार सरकार इनके सामने उकड़ू बैठी नजर आती है। यह भी हो सकता है कि इस सारे मामले में रिश्वत और मंथली का मामला भी कहीं ना कहीं शामिल हो। लेकिन अफसोस अब हुकुम के इक्के के नीचे सब दब जाएगा।

राकेश चौहान 

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Wednesday, 24 September 2025

कुछ याद उन्हें भी कर लो

 आज 23 सितंबर है। आज ही के दिन राव तुलाराम की 1863 में मृत्यु हुई थी। अतः आज के दिन नसीबपुर - नारनौल के युद्ध में 16 नवंबर 1857 को अंग्रेजों से लड़ते शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों की याद में राजकीय अवकाश रखा जाता है। अब इस बात का जवाब मैं नहीं दे पाऊंगा कि जब युद्ध 16 नवंबर को हुआ तो शहीदी दिवस 23 सितंबर को क्यों मनाया जाता है। आज सुबह से नसीबपुर के शहीद स्मारक में नेताओं का तांता लगा हुआ है। मेडिकल कॉलेज नाम विवाद में इस बार का शहीदी दिवस कुछ खास ही हो गया है। किंतु इस युद्ध के जिन नायकों को भुला दिया गया बस मेरा यह लेख उनको समर्पित है! जो लड़े, मरे और गुमनाम रह गए।

1857 में झज्जर ढाई सौ गांवों के साथ हरियाणा की सबसे बड़ी रियासत था। नवाब अब्दुर्रहमान खान इसका शासक था। झज्जर का नवाब अंग्रेजों और बहादुर शाह जफर दोनों को खुश रखना चाहता था और असल में दोनों को ही मूर्ख बना रहा था। इसका सेनापति समद खान और सेना अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ना चाहते थे। इन परिस्थितियों में समद खान ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। उधर भट्टू का शहजादा मोहम्मद अजीम भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर बैठा। इधर रेवाड़ी परगना के लगभग 87 गांवों की इस्मतरारी जागीर (ऐसी जागीर जिसमें जागीरदार के पास केवल रिवेन्यू इकट्ठा करने का अधिकार रहता था) के जागीरदार राव तुलाराम ने भी अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने झज्जर और हिसार पर हमला बोलकर वहां के किलों पर अपना अधिकार कर लिया, झज्जर के नवाब को गिरफ्तार करके दिल्ली भेज दिया गया जहां अगले साल जनवरी में उसे फांसी की सजा दे दी गई। समद खान झज्जर की सेना लेकर कर निकल गया। भट्टू का शहजादा भी अपनी सेना के साथ निकल गया। इधर रेवाड़ी में अंग्रेजों के आने से पहले ही तुलाराम ने रेवाड़ी छोड़ दी। कुछ समय उपरांत इन तीनों राज्यों की सेना राजस्थान के सिंघाना में इकट्ठी हुई। सवाल यह था कि अब क्या किया जाए। उधर मारवाड़ के आऊवा के ठिकानेदार ठाकुर कुशाल सिंह ने अंग्रेजों और मारवाड़ के विरुद्ध विद्रोह कर दिया तथा अंग्रेज कमांडर का सर काट के किले के द्वार पर टांग दिया। कुशाल सिंह के साथ 6 और ठिकानेदार थे। कुशाल सिंह चाहता था कि मेवाड़ के ठिकानेदारों को साथ ले कर ही दिल्ली पर हमला किया जाए किन्तु उसके साथियों का कहना था कि तुरंत दिल्ली जाया जाए। आसोप के ठिकानेदार ठाकुर श्योनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह, आलनियावास के ठाकुर अजीत सिंह, बांजवास के ठाकुर जोध सिंह, सीनाली के ठाकुर चांद सिंह, सलूंबर के प्रतिनिधि के रूप में सुंगडा के ठाकुर सुखत सिंह तथा आऊवा के प्रतिनिधि ठाकुर पुहार सिंह के नेतृत्व में इन ठिकानों की सेना दिल्ली की ओर कूच कर गई। अंग्रेज सेना की जोधपुर लीजियन, एरिनपुरा और डीसा के विद्रोही पुरबिया सैनिक भी इन से आ मिले। जब यह लोग सिंघाना पहुंचे तब तक दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा हो चुका था। हरियाणा के उपरोक्त राज्यों की सेना के साथ ये सेनाएं भी मिल गईं। अंग्रेजों से लड़ने का फैसला हुआ और इन संयुक्त सेनाओं ने रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया किंतु रेवाड़ी को उपयुक्त स्थान न मानकर यह लोग वापस नारनौल आ गए क्योंकि नारनौल अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह थी जिसमें पहाड़ी पर एक किला था। चूंकि झज्जर सबसे बड़ी रियासत था अतः उसकी सेना सबसे बड़ी थी और युद्ध का नेतृत्व झज्जर का सेनापति समद खान ही कर रहा था। इस युद्ध में ठाकुर दलेल सिंह के नेतृत्व में कांटी से भी एक रिसाला शामिल हुआ था। क्योंकि कांटी भी झज्जर का ही भाग था अतः संभवत यह रिसाला झज्जर की सेवा में ही रहा होगा। रेवाड़ी के दल का नेतृत्व राव रामलाल तथा किशन गोपाल के हाथ में था। दोपहर के समय पहले झड़प नसीबपुर में हुई तथा बाद की लड़ाई नारनौल में हुई। आज की पुरानी कचहरी की छतों पर मोर्चे लगा कर पुरबिये अपनी बंदूकों के साथ बड़ी बहादुरी से लड़े। शाम होते होते अंग्रेजों की विजय हुई तथा क्रांतिकारी सेना तितर बितर हो गई। अंग्रेजी सेना के घुड़सवारों ने तीन मील तक पुरबिया 'पंडी' सैनिकों को दौड़ा-दौड़ा कर काट डाला। क्रांतिकारी सेना के लगभग 500 तथा अंग्रेजों के 80 सैनिक काम आए जिनमें अंग्रेज सेनापति जेरार्ड भी था। पूरा नारनौल शहर खाली हो गया गलियां लाशों से पट गईं। इसके बाद विद्रोहियों को ढूंढ ढूंढ कर पकड़ा गया तथा 33 लोगों को फांसी दे दी गई। मरने वालों और फांसी पाने वालों में स्वाभाविक रूप से मुसलमान अधिक थे। झज्जर और भट्टू का क्षेत्र अंग्रेजों की मदद करने वाले जींद, पटियाला तथा नाभा के बीच तीन भागों में बांट दिया गया। ऊपर का इलाका जींद को, दादरी, कानोड़ और नारनौल के क्षेत्र पटियाला तथा कांटी तथा बावल के परगने नाभा को मिले।

इस युद्ध के जिन योद्धाओं और बलिदानियों का नाम भुला दिया गया शहीदी दिवस पर उन्हें भी श्रद्धांजलि।


संदर्भ - 

के सी यादव -the revolt of 1857 in Haryana 

NA Chick - Annals of the Indian rebellion

खड़गावत Rajasthan's role in the struggle of 1857 


राकेश चौहान 

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Friday, 19 September 2025

श्राद्ध

 कहते हैं कि औरंगजेब के व्यवहार से दुःखी होकर शाहजहां ने कहा कि 'तुझ से अच्छे तो काफ़िर ही हैं जो अपने मरों का भी हर साल श्राद्ध करते हैं।' कुछ मुसलमानों से सुनता हूं कि उन से पिछली पीढ़ी तक उनके घरों में श्राद्ध होता रहा है। दीवाली पूजन और पंडित से पूछ कर बच्चे का नामकरण तो मेवात के मेव हाल ही तक करते रहे हैं। बेशक औरंगजेब की समझ से तो काफ़िरों की हत्या और मंदिरों के विध्वंस द्वारा हिंदुस्तान से कुफ्र ख़त्म करना सर्वोत्तम मार्ग था किंतु उसके वामपंथी वारिसों को पता है कि विध्वंस किसका करना है। उन्होंने इस्लाम के जबरन धर्मांतरण, मारकाट और मंदिर तोड़ने से लेकर जजिया, कर माफी, इनाम, नौकरी और सूफीवाद के पूरे पैटर्न को बारीखी से समझा है। उन्होंने गोवा इंक्विजिशन से ले कर चावल के बदले मजहब के ईसाइयत के व्यापार को भी करीब से देखा है। वामपंथियों को भली भांति पता है कि इन मजहबों के हथकंडों को अपने बौद्धिक हथियारों से कैसे 'ब्लैंड' करना है। यह विडम्बना नहीं अपितु होशियारी है कि वामपंथ पश्चिम में जहां ईसाईयत और इस्लाम का विरोधी है वहीं भारत में यह दोनों उसके औजार हैं। ऐसा कोई भी मौका आने पर मैं वामपंथियों की प्रशंसा किए बिना नहीं रहता। प्रशंसा क्या मेरा तो मन करता है कि किसी वामपंथी का सर फोड़ कर उसका भेजा चूम लूं! श्राद्ध पर  सुनिए उनके बोल! 'जिंदे मां-बाप की कदर करते नहीं और मरने के बाद श्राद्ध करते हैं!' जैसे श्राद्ध न हुआ मां-बाप की बेकद्री का फ़रमान हो गया। 'बामन को खीर जिमाने से क्या मेरे पूर्वजों के पेट में चला जाएगा?' अरे बामन तो अकेला ही जीमेगा बाकी तो तेरा कुनबा ही डकारेगा।

      मेरे परदादा की मृत्यु मेरे दादाजी के बचपन में ही हो गई थी। उन्हें अपने पिता का साथ बहुत कम मिला होगा। दादाजी अपने पिता का श्राद्ध सामान्य से बढ़कर करते थे। दादी बहुत स्वादिष्ट खीर बनाती थीं। उन्हीं की देखरेख में एक - डेढ़ मन दूध की खीर दो - तीन बार में बनती और ब्राह्मणों तथा परिवार के साथ- साथ लगभग सारा कुनबा ही जीमने आता। यह दृश्य दादाजी के चेहरे पर अपार संतोष ले आया करता। आज दादी का श्राद्ध है। परसों मां का पहला श्राद्ध था। रसोई से बाहर आती भोजन सुगंध के बीच बरामदे में पिताजी को कुर्सी पर खामोश बैठे देख कर मैंने एक अप्रत्याशित सवाल पूछ लिया। 'जी अम्माजी की याद आ रही है?' (दादी को हम अम्माजी ही बोलते थे) जवाब में पिता जी का गला भर आया और हम दोनों ही भावुक हो गए! कुछ चीज़ें समय पर ही ठीक से समझ आती हैं!

राकेश चौहान
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Wednesday, 17 September 2025

रंगा सियार

 मैं दृढ़ता से यह बात कहता आया हूं कि नव बौद्धवाद, ईसाईयत का लांचिंग पैड है। हिंदू से बौद्ध और बौद्ध से ईसाई। इस रूट को ठीक से समझ लीजिए। मुझे इस में भी लेशमात्र संशय नहीं कि नवबौद्धवाद को ईसाई मिशनरियां ही संचालित कर रही हैं। मजेदार तो यह है कि मेरी यह धारणा दिन प्रतिदिन दृढ़ इसलिए होती जा रही है क्योंकि इसको साबित करने के लिए कोई ना कोई आ खड़ा होता है। 

रंगा सियार कहानी शायद बचपन में सब ने सुनी होगी। यह पंचतंत्र में एक ऐसे सियार की कहानी है जो भूख से व्याकुल होकर शहर में पहुँचता है और कुत्तों से बचने के लिए एक धोबी के घर में रखे नील वाले पानी से भरी नांद में कूद जाता है। नीला हो कर वह जंगल लौटता है और दावा करता है कि उसे वन देवी ने राजा बनाकर भेजा है। परंतु, एक दिन जब अन्य सियार 'हुआं-हुआं' करते हैं, तो वह भी अनजाने में वैसा ही कर बैठता है, पहचान उजागर होने पर जानवर उसे मार देते हैं। 

नवबौद्धों के भावी ईसाई होने में अगर आपको शक है तो दोनों की भाषा मिलाइए। ईसाई विश्व में जहां भी जाते हैं, सब से पहले वहां के स्थानीय धर्म को पाप और देवी देवताओं को दुष्ट बताते हैं। यही हाल नवबौद्धों का है। इन्हें अपनी सुंदरता नहीं दिखानी दूसरे में बदसूरती पहले तो गढ़नी है और फिर जोर-शोर से उजागर करनी है। आम हिंदू को ईसाई बनाना आसान नहीं है लेकिन उसे बौद्ध बनाना ज्यादा कठिन नहीं। वह बौद्ध हुआ तो समझ लीजिए ईसाईयत का आधा काम हो गया। इस्लाम का भी सब से बड़ा शिकार बौद्ध ही थे। अफगानिस्तान, आज का पाकिस्तान, सिंध और पूरी गंगा यमुना पट्टी बौद्ध थी! जी वही जो आज मुसलमान है! जो डिगा है वो गया है! फिर भी आपको ईसाई - नव बौद्ध गठबंधन में संदेह है तो नवबौद्धों की शपथ आपने सुनी-पढ़ी नहीं। यदि अब भी संदेह बाकी है तो देश के मुख्य न्यायाधीश की भाषा सुन लीजिए न, इस में और ईसाई मिशनरियों की भाषा में कोई फर्क नहीं। इस व्यक्ति की टिप्पणी सुनकर मुझे तनिक भी आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि नव बौद्धों की इस भाषा का मैं आदी हूं, बस फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार रंगे सियार ने विक्रमादित्य के न्याय सिंहासन पर बैठ कर 'हुआं-हुआं' की है! इन रंगे सियारों की पोल खुलने पर समाज को क्या करना चाहिए? मुझे नहीं पता! 

अजीब इत्तेफाक है ना कि नवबौद्धों का रंग भी नीला ही है!

जै भीम, नमो बुद्धाय!


राकेश चौहान 

#RSC 

Saturday, 23 August 2025

जाति जंजाल

जाति जंजाल

वैदिक काल में वर्णों का वर्णन है जो कि कर्म के आधार पर वर्गीकृत हैं तथा जन्मजात नहीं हैं। मनुस्मृति में भी वर्ण कर्म आधारित हैं, जो कर्म बदलने पर बदल भी सकते हैं। जाति की उत्पत्ति संभवतः संक्रमण काल में तब हुई होगी जब संस्कृति को बचाने की चुनौती आ पड़ी। समाजशास्त्रियों तथा इतिहासकारों के एक वर्ग के अनुसार जाति शब्द ज्ञाति से बना है, यानि जिसे जिस विषय का ज्ञान अर्थात ज्याति (ज्ञाति) थी उसी की जिम्मेदारी उस ज्ञान को संजोने की दी गई यही बाद में रूढ़ हो कर जाति हो गया। यह बात एक ही गौत्र का अलग - अलग जातियों में पाए जाने का एक मजबूत तर्क हो सकती है। यदि ऐसा है तो इस घटना और आबू पर्वत पर हुए उस यज्ञ में बहुत अधिक समय का अंतर नहीं रहा होगा जिस से चार वीर पुरुषों की उत्पत्ति हुई तथा क्षत्रिय की जगह राजपूत शब्द अधिक प्रयोग होने लगा। जैसे- जैसे विदेशी आक्रमण और संक्रमण का उत्पात बढ़ने लगा, संस्कृति बचाने के नियम भी दृढ़ होते चले गए परिणाम स्वरूप जाति व्यवस्था भी कठोर होने लगी। पहले से चले आ रहे अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के नियम भी बदले। सब से बड़ी चुनौती तो इस्लामी संक्रमण की थी जो कि सनातनी व्यवस्था में घुलने को कतई तैयार नहीं था तथा पूरी काफिर दुनिया को मोमिन बनाने के उद्देश्य से जिहाद को प्रथम कर्तव्य माने बैठा था। लगता है जब तक वर्ण व्यवस्था थी तब तक तो ठीक था किंतु जैसे ही वर्ण व्यवस्था जन्मानुसार हुई और फिर जाति व्यवस्था स्थापित हुई तब अनेक समस्याएं आई होंगी। जिनमें से एक थी अलग जाति की कन्या और पुरुष का विवाह। अब सबसे बड़ा प्रश्न था कि अंतरजातीय प्रेम विवाहों से कैसे निपटा जाए। रोजाना होने वाले विदेशी आक्रमणों से रक्षा का भार क्योंकि क्षत्रियों पर था जिनके लिए क्षत्रिय के अलावा राजपूत शब्द लगभग छठी शताब्दी में रूढ हो चुका था। हालांकि यह शब्द राजपुत्र के रूप में सदा प्रयोग होता रहा था। बहरहाल लगातार विदेशी आक्रमणों ने राजपूतों का महत्व बढ़ा दिया तथा उनकी लड़ने की जिजीविषा को जीवित रखना समाज के सामने और बड़ी चुनौती हो गई। अस्तित्व बचाए रखने के लिए जिस प्रकार कठोर जाति व्यवस्था स्थापित हुई उसी तरह कठोर राजपूत धर्म भी स्थापित कर दिया गया। अब समाज के रक्त के साथ राजपूती रक्त को शुद्ध रखना और अधिक आवश्यक था। अंतर्जातीय प्रेम विवाह इस शुद्धता में सब से बड़ा रोड़ा थे जबकि सम्मान, शक्ति तथा अधिकारों से लैस राजपूतों के लिए ये विवाह सहज सुलभ ही थे। वो भी तब जब अनुलोमा तथा प्रतिलोमा विवाह की खिड़की मौजूद थी। अतः यह विवाह संबंध इस नियम के साथ स्वीकार किए गए लगते हैं कि यदि कोई राजपूत पुरूष किसी अन्य जाति की कन्या से विवाह कर लेता है तो उसकी संतान को राजपूती से हाथ धोना पड़ेगा तथा उसकी संतान को कन्या की जाति में स्थान दिया जाने लगा। हां इतना अवश्य था कि संपत्ति अथवा राज्य में उसको उसका भाग अवश्य दिया गया। अतः माता की जाति के अन्य गोत्रों से उसका सम्मान स्वतः ही अधिक हो गया। आज भी इस प्रकार के गोत्रों का अपनी-अपनी जातियों में एक सम्मानजनक स्थान है तथा इनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति तथा रहन सहन अपने सजातीय बंधुओं से इक्कीस है। अर्थात यह कोई अपमानजनक बात नहीं थी बल्कि एक सामाजिक समाधान था। यह निःसंदेह एक अभिनव प्रयोग था जिस ने एक ओर तो समर्थ के स्वेच्छाचार पर लगाम लगाई, महिलाओं को शोषण के विरुद्ध सुरक्षा दी तथा दूसरी ओर ऐसे दंपतियों के वंशजों का समाज में सम्माननीय स्थान निर्धारित कर के सामाजिक संकट का सुंदर समाधान कर दिया। उस दंपति के ऐसे वंशजों को गौत्र पिता के नाम (जैसे मांधाता से 'मान' जाट, केवल राव से केवल नाई), किसी स्थान (खोल से 'खोला' अहीर) या घटना (पुरुष पूर्वज द्वारा शेर का सर काटने पर 'मूंडड़ा' गूजर) या परम्परा (दो बार मुंडन करवाने से 'दोलट' जाट) आदि से दिया जाता! कभी कभी पिता के मूल वंश का नाम गौत्र के रूप में भी प्रयुक्त होता। जैसे 'भाटी'- गूजर, कुम्हार, मनियार! जैसे 'चौहान' - जाट, गूजर, खटीक, चमार, धोबी, माली। जबकि राजपूतों के गोत्र आज भी प्राचीन गोत्र ही हैं जैसे चौहानों और उनकी चौबीस शाखाओं का गौत्र वत्स, राठौड़ व शाखाएं - कश्यप, भाटी व शाखाएं- अत्री, सोलंकी व शाखाएं - भारद्वाज, आदि। ऐसा सिर्फ राजपूतों के साथ ही नहीं था बल्कि अनुलोमा विवाह से उत्पन्न संतान का कन्या की जाति में जाने का नियम अन्य जातियों में भी कहीं कहीं दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि उसे पूर्वज पिता ने अपनी जाति में शामिल करने का प्रयास नहीं किया। किंतु ऐसा प्रयास समाज के कठोर नियमों ने कहीं सफल नहीं होने दिया। ऐसे मौके भी आए जब राजा को देश छोड़कर भागना तक पड़ा।

ऐसे भी उदाहरण हैं कि किसी राजपूत ने युद्ध से इनकार कर दिया तथा अन्य जाति के कार्य अपना लिए और उस जाति में शामिल हो गया।

देखिए कैसे जातियों की स्थापना ने राष्ट्र की आत्मा को बचा कर रखा और क्यों वामपंथियों के लिए सबसे आवश्यक जाति खत्म करना है। एक समय था जब सारे पूर्वज महापुरुष सबके थे। गोगा जी, तेजाजी, रामदेव, देवनारायण, आदि सब! फिर वामियों ने जातिवाद घुसेड़ा और अब ये जातियों के हैं। यहां तक कि राम और कृष्ण की भी जाति है। लोग सोशल मीडिया पर लड़ रहे हैं, एक दूसरे को गालियां निकाल रहे हैं महापुरुषों को कलंकित कर रहे हैं। इस से भी बुरा समय तो अभी बाकी है। फिर भी कहूंगा, जब भी संशय हो जड़ों की ओर जाओ, समाधान मिलेगा!

(गोत्रों के उद्भव से संबंधित उपरोक्त सभी उदाहरण प्रमाणिक पुस्तकों से लिए गए हैं। सोर्स जानने के लिए कमेंट कर सकते हैं)


सादर 

राकेश चौहान

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Thursday, 19 June 2025

भाईचारा

 कोरिया वास में नवनिर्मित मेडिकल कॉलेज का नाम बदलने की कवायद में लगे वोट बैंक की मुहिम के बीच खबर है कि च्यवन ऋषि की जाति मिल गई है। पर च्यवन ऋषि का नाम तो वेदों की ऋचाओं में भी है! फिर तो यह राम जन्म से भी पहले की बात है। अर्थात जिस काल में उन्होंने ढोसी पर्वत तथा उसके आसपास के वनों में विचरण करते चवनप्राश का आविष्कार किया होगा तब जातियां अस्तित्व में भी नहीं आईं थीं। फिर भी इस आविष्कार के आविष्कारकों के लिए बधाई बनती है। च्यवन ऋषि महर्षि भृगु के पुत्र थे, तो इस हिसाब से वह भृगु या भार्गव हुए। किंतु भृगु और भार्गव गोत्र तो बहुत सारी जातियां में पाया जाता है। वैसे ही जैसे कश्यप, भारद्वाज, गौतम, गर्ग इत्यादि, स्वयं मेरा अर्थात चौहानों का गोत्र भी वत्स है। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों को जानकारी है कि विवाह के लिए 'मिल जाने' वाले गौत असल में गौत्र नहीं हैं। चलिए इस घालमेल का ठीकरा भी ब्राह्मणों के सर पर ही फोड़ कर पुनः च्यवनप्राश के आविष्कारक की जाति के आविष्कारकों को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं। 
मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर राव तुलाराम के नाम पर रखने के समर्थकों में नारनौल के तीसरी बार के विधायक नए-नए शामिल हुए हैं। इससे पहले स्थानीय सांसद और नांगल चौधरी की विधायक भी महाविद्यालय का नाम बदलकर राव तुलाराम के नाम पर रखने की वकालत कर चुके हैं। मेरा दावा है कि ये लोग नसीबपुर में लड़े गए युद्ध में शामिल सभी पक्षों का नाम तक नहीं बता सकते। वैसे राव तुलाराम के नाम पर किसी को आपत्ति क्यों होगी भला! च्यवन ऋषि की तरह राव तुलाराम भी तो सबके हैं! दिक्कत राव तुलाराम से नहीं वोट बैंक राजनीति की गुंडागर्दी से है। चिकित्सा क्षेत्र में योगदान देने वाले च्यवन ऋषि के आश्रम क्षेत्र में बनने वाले चिकित्सा संस्थान का नाम उनके नाम पर रखना बिल्कुल सार्थक तथा सम्यक है। दूसरी बात जब गजट नोटिफिकेशन द्वारा यह नाम रखना तय हो चुका था तब इस विषय में विवाद करना ही तर्कसंगत नहीं था। भविष्य में किसी और संस्था का नाम हम उन पर रख सकते हैं! इन सब बातों से सहमत कुछ लोग भाईचारा बचाने की दुहाई दे कर कन्नी काट गए। वैसे बचाना दुनिया के सब से दुष्कर कार्यों में से एक है। बचपन में आखिर में खाने के लिए अच्छे- अच्छे बेर बचाते थे तो कोई टपक पड़ता और उन्हें चट कर जाता। आज पैसा बचाने के लिए लाख जतन करते हैं पर बात बनती ही नहीं। भाईचारा बचाने के लिए तो केरल के एक राजा ने भारत की सबसे पहली मस्जिद बनाई थी और उसी केरल में आज अस्तित्व बचाने के लाले पड़ रहे हैं। वैसे भाईचारा बचाने का एक बम पिलाट आईडिया है मेरे पास! मेडिकल कॉलेज का नाम राव तुलाराम के नाम पर रख दिया जाए और नसीबपुर के शहीद स्मारक का नाम बदल कर 'शहीद' च्यवन ऋषि स्मारक रख दिया जाए।

अंत में हफ़ीज़ जालंधरी की चार पंक्तियां - 
जो भी है सूरत-ए-हालात कहो चुप न रहो।
रात अगर है तो उसे रात कहो चुप न रहो।।
घेर लाया है अँधेरों में हमें कौन 'हफ़ीज़'।
आओ कहने की है जो बात कहो चुप न रहो।।

जय हिंद 
राकेश चौहान
#RSC