poems

Wednesday, 17 September 2025

रंगा सियार

 मैं दृढ़ता से यह बात कहता आया हूं कि नव बौद्धवाद, ईसाईयत का लांचिंग पैड है। हिंदू से बौद्ध और बौद्ध से ईसाई। इस रूट को ठीक से समझ लीजिए। मुझे इस में भी लेशमात्र संशय नहीं कि नवबौद्धवाद को ईसाई मिशनरियां ही संचालित कर रही हैं। मजेदार तो यह है कि मेरी यह धारणा दिन प्रतिदिन दृढ़ इसलिए होती जा रही है क्योंकि इसको साबित करने के लिए कोई ना कोई आ खड़ा होता है। 

रंगा सियार कहानी शायद बचपन में सब ने सुनी होगी। यह पंचतंत्र में एक ऐसे सियार की कहानी है जो भूख से व्याकुल होकर शहर में पहुँचता है और कुत्तों से बचने के लिए एक धोबी के घर में रखे नील वाले पानी से भरी नांद में कूद जाता है। नीला हो कर वह जंगल लौटता है और दावा करता है कि उसे वन देवी ने राजा बनाकर भेजा है। परंतु, एक दिन जब अन्य सियार 'हुआं-हुआं' करते हैं, तो वह भी अनजाने में वैसा ही कर बैठता है, पहचान उजागर होने पर जानवर उसे मार देते हैं। 

नवबौद्धों के भावी ईसाई होने में अगर आपको शक है तो दोनों की भाषा मिलाइए। ईसाई विश्व में जहां भी जाते हैं, सब से पहले वहां के स्थानीय धर्म को पाप और देवी देवताओं को दुष्ट बताते हैं। यही हाल नवबौद्धों का है। इन्हें अपनी सुंदरता नहीं दिखानी दूसरे में बदसूरती पहले तो गढ़नी है और फिर जोर-शोर से उजागर करनी है। आम हिंदू को ईसाई बनाना आसान नहीं है लेकिन उसे बौद्ध बनाना ज्यादा कठिन नहीं। वह बौद्ध हुआ तो समझ लीजिए ईसाईयत का आधा काम हो गया। इस्लाम का भी सब से बड़ा शिकार बौद्ध ही थे। अफगानिस्तान, आज का पाकिस्तान, सिंध और पूरी गंगा यमुना पट्टी बौद्ध थी! जी वही जो आज मुसलमान है! जो डिगा है वो गया है! फिर भी आपको ईसाई - नव बौद्ध गठबंधन में संदेह है तो नवबौद्धों की शपथ आपने सुनी-पढ़ी नहीं। यदि अब भी संदेह बाकी है तो देश के मुख्य न्यायाधीश की भाषा सुन लीजिए न, इस में और ईसाई मिशनरियों की भाषा में कोई फर्क नहीं। इस व्यक्ति की टिप्पणी सुनकर मुझे तनिक भी आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि नव बौद्धों की इस भाषा का मैं आदी हूं, बस फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार रंगे सियार ने विक्रमादित्य के न्याय सिंहासन पर बैठ कर 'हुआं-हुआं' की है! इन रंगे सियारों की पोल खुलने पर समाज को क्या करना चाहिए? मुझे नहीं पता! 

अजीब इत्तेफाक है ना कि नवबौद्धों का रंग भी नीला ही है!

जै भीम, नमो बुद्धाय!


राकेश चौहान 

#RSC 

Saturday, 23 August 2025

जाति जंजाल

जाति जंजाल

वैदिक काल में वर्णों का वर्णन है जो कि कर्म के आधार पर वर्गीकृत हैं तथा जन्मजात नहीं हैं। मनुस्मृति में भी वर्ण कर्म आधारित हैं, जो कर्म बदलने पर बदल भी सकते हैं। जाति की उत्पत्ति संभवतः संक्रमण काल में तब हुई होगी जब संस्कृति को बचाने की चुनौती आ पड़ी। समाजशास्त्रियों तथा इतिहासकारों के एक वर्ग के अनुसार जाति शब्द ज्ञाति से बना है, यानि जिसे जिस विषय का ज्ञान अर्थात ज्याति (ज्ञाति) थी उसी की जिम्मेदारी उस ज्ञान को संजोने की दी गई यही बाद में रूढ़ हो कर जाति हो गया। यह बात एक ही गौत्र का अलग - अलग जातियों में पाए जाने का एक मजबूत तर्क हो सकती है। यदि ऐसा है तो इस घटना और आबू पर्वत पर हुए उस यज्ञ में बहुत अधिक समय का अंतर नहीं रहा होगा जिस से चार वीर पुरुषों की उत्पत्ति हुई तथा क्षत्रिय की जगह राजपूत शब्द अधिक प्रयोग होने लगा। जैसे- जैसे विदेशी आक्रमण और संक्रमण का उत्पात बढ़ने लगा, संस्कृति बचाने के नियम भी दृढ़ होते चले गए परिणाम स्वरूप जाति व्यवस्था भी कठोर होने लगी। पहले से चले आ रहे अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के नियम भी बदले। सब से बड़ी चुनौती तो इस्लामी संक्रमण की थी जो कि सनातनी व्यवस्था में घुलने को कतई तैयार नहीं था तथा पूरी काफिर दुनिया को मोमिन बनाने के उद्देश्य से जिहाद को प्रथम कर्तव्य माने बैठा था। लगता है जब तक वर्ण व्यवस्था थी तब तक तो ठीक था किंतु जैसे ही वर्ण व्यवस्था जन्मानुसार हुई और फिर जाति व्यवस्था स्थापित हुई तब अनेक समस्याएं आई होंगी। जिनमें से एक थी अलग जाति की कन्या और पुरुष का विवाह। अब सबसे बड़ा प्रश्न था कि अंतरजातीय प्रेम विवाहों से कैसे निपटा जाए। रोजाना होने वाले विदेशी आक्रमणों से रक्षा का भार क्योंकि क्षत्रियों पर था जिनके लिए क्षत्रिय के अलावा राजपूत शब्द लगभग छठी शताब्दी में रूढ हो चुका था। हालांकि यह शब्द राजपुत्र के रूप में सदा प्रयोग होता रहा था। बहरहाल लगातार विदेशी आक्रमणों ने राजपूतों का महत्व बढ़ा दिया तथा उनकी लड़ने की जिजीविषा को जीवित रखना समाज के सामने और बड़ी चुनौती हो गई। अस्तित्व बचाए रखने के लिए जिस प्रकार कठोर जाति व्यवस्था स्थापित हुई उसी तरह कठोर राजपूत धर्म भी स्थापित कर दिया गया। अब समाज के रक्त के साथ राजपूती रक्त को शुद्ध रखना और अधिक आवश्यक था। अंतर्जातीय प्रेम विवाह इस शुद्धता में सब से बड़ा रोड़ा थे जबकि सम्मान, शक्ति तथा अधिकारों से लैस राजपूतों के लिए ये विवाह सहज सुलभ ही थे। वो भी तब जब अनुलोमा तथा प्रतिलोमा विवाह की खिड़की मौजूद थी। अतः यह विवाह संबंध इस नियम के साथ स्वीकार किए गए लगते हैं कि यदि कोई राजपूत पुरूष किसी अन्य जाति की कन्या से विवाह कर लेता है तो उसकी संतान को राजपूती से हाथ धोना पड़ेगा तथा उसकी संतान को कन्या की जाति में स्थान दिया जाने लगा। हां इतना अवश्य था कि संपत्ति अथवा राज्य में उसको उसका भाग अवश्य दिया गया। अतः माता की जाति के अन्य गोत्रों से उसका सम्मान स्वतः ही अधिक हो गया। आज भी इस प्रकार के गोत्रों का अपनी-अपनी जातियों में एक सम्मानजनक स्थान है तथा इनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति तथा रहन सहन अपने सजातीय बंधुओं से इक्कीस है। अर्थात यह कोई अपमानजनक बात नहीं थी बल्कि एक सामाजिक समाधान था। यह निःसंदेह एक अभिनव प्रयोग था जिस ने एक ओर तो समर्थ के स्वेच्छाचार पर लगाम लगाई, महिलाओं को शोषण के विरुद्ध सुरक्षा दी तथा दूसरी ओर ऐसे दंपतियों के वंशजों का समाज में सम्माननीय स्थान निर्धारित कर के सामाजिक संकट का सुंदर समाधान कर दिया। उस दंपति के ऐसे वंशजों को गौत्र पिता के नाम (जैसे मांधाता से 'मान' जाट, केवल राव से केवल नाई), किसी स्थान (खोल से 'खोला' अहीर) या घटना (पुरुष पूर्वज द्वारा शेर का सर काटने पर 'मूंडड़ा' गूजर) या परम्परा (दो बार मुंडन करवाने से 'दोलट' जाट) आदि से दिया जाता! कभी कभी पिता के मूल वंश का नाम गौत्र के रूप में भी प्रयुक्त होता। जैसे 'भाटी'- गूजर, कुम्हार, मनियार! जैसे 'चौहान' - जाट, गूजर, खटीक, चमार, धोबी, माली। जबकि राजपूतों के गोत्र आज भी प्राचीन गोत्र ही हैं जैसे चौहानों और उनकी चौबीस शाखाओं का गौत्र वत्स, राठौड़ व शाखाएं - कश्यप, भाटी व शाखाएं- अत्री, सोलंकी व शाखाएं - भारद्वाज, आदि। ऐसा सिर्फ राजपूतों के साथ ही नहीं था बल्कि अनुलोमा विवाह से उत्पन्न संतान का कन्या की जाति में जाने का नियम अन्य जातियों में भी कहीं कहीं दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि उसे पूर्वज पिता ने अपनी जाति में शामिल करने का प्रयास नहीं किया। किंतु ऐसा प्रयास समाज के कठोर नियमों ने कहीं सफल नहीं होने दिया। ऐसे मौके भी आए जब राजा को देश छोड़कर भागना तक पड़ा।

ऐसे भी उदाहरण हैं कि किसी राजपूत ने युद्ध से इनकार कर दिया तथा अन्य जाति के कार्य अपना लिए और उस जाति में शामिल हो गया।

देखिए कैसे जातियों की स्थापना ने राष्ट्र की आत्मा को बचा कर रखा और क्यों वामपंथियों के लिए सबसे आवश्यक जाति खत्म करना है। एक समय था जब सारे पूर्वज महापुरुष सबके थे। गोगा जी, तेजाजी, रामदेव, देवनारायण, आदि सब! फिर वामियों ने जातिवाद घुसेड़ा और अब ये जातियों के हैं। यहां तक कि राम और कृष्ण की भी जाति है। लोग सोशल मीडिया पर लड़ रहे हैं, एक दूसरे को गालियां निकाल रहे हैं महापुरुषों को कलंकित कर रहे हैं। इस से भी बुरा समय तो अभी बाकी है। फिर भी कहूंगा, जब भी संशय हो जड़ों की ओर जाओ, समाधान मिलेगा!

(गोत्रों के उद्भव से संबंधित उपरोक्त सभी उदाहरण प्रमाणिक पुस्तकों से लिए गए हैं। सोर्स जानने के लिए कमेंट कर सकते हैं)


सादर 

राकेश चौहान

#RSC

Thursday, 19 June 2025

भाईचारा

 कोरिया वास में नवनिर्मित मेडिकल कॉलेज का नाम बदलने की कवायद में लगे वोट बैंक की मुहिम के बीच खबर है कि च्यवन ऋषि की जाति मिल गई है। पर च्यवन ऋषि का नाम तो वेदों की ऋचाओं में भी है! फिर तो यह राम जन्म से भी पहले की बात है। अर्थात जिस काल में उन्होंने ढोसी पर्वत तथा उसके आसपास के वनों में विचरण करते चवनप्राश का आविष्कार किया होगा तब जातियां अस्तित्व में भी नहीं आईं थीं। फिर भी इस आविष्कार के आविष्कारकों के लिए बधाई बनती है। च्यवन ऋषि महर्षि भृगु के पुत्र थे, तो इस हिसाब से वह भृगु या भार्गव हुए। किंतु भृगु और भार्गव गोत्र तो बहुत सारी जातियां में पाया जाता है। वैसे ही जैसे कश्यप, भारद्वाज, गौतम, गर्ग इत्यादि, स्वयं मेरा अर्थात चौहानों का गोत्र भी वत्स है। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों को जानकारी है कि विवाह के लिए 'मिल जाने' वाले गौत असल में गौत्र नहीं हैं। चलिए इस घालमेल का ठीकरा भी ब्राह्मणों के सर पर ही फोड़ कर पुनः च्यवनप्राश के आविष्कारक की जाति के आविष्कारकों को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं। 
मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर राव तुलाराम के नाम पर रखने के समर्थकों में नारनौल के तीसरी बार के विधायक नए-नए शामिल हुए हैं। इससे पहले स्थानीय सांसद और नांगल चौधरी की विधायक भी महाविद्यालय का नाम बदलकर राव तुलाराम के नाम पर रखने की वकालत कर चुके हैं। मेरा दावा है कि ये लोग नसीबपुर में लड़े गए युद्ध में शामिल सभी पक्षों का नाम तक नहीं बता सकते। वैसे राव तुलाराम के नाम पर किसी को आपत्ति क्यों होगी भला! च्यवन ऋषि की तरह राव तुलाराम भी तो सबके हैं! दिक्कत राव तुलाराम से नहीं वोट बैंक राजनीति की गुंडागर्दी से है। चिकित्सा क्षेत्र में योगदान देने वाले च्यवन ऋषि के आश्रम क्षेत्र में बनने वाले चिकित्सा संस्थान का नाम उनके नाम पर रखना बिल्कुल सार्थक तथा सम्यक है। दूसरी बात जब गजट नोटिफिकेशन द्वारा यह नाम रखना तय हो चुका था तब इस विषय में विवाद करना ही तर्कसंगत नहीं था। भविष्य में किसी और संस्था का नाम हम उन पर रख सकते हैं! इन सब बातों से सहमत कुछ लोग भाईचारा बचाने की दुहाई दे कर कन्नी काट गए। वैसे बचाना दुनिया के सब से दुष्कर कार्यों में से एक है। बचपन में आखिर में खाने के लिए अच्छे- अच्छे बेर बचाते थे तो कोई टपक पड़ता और उन्हें चट कर जाता। आज पैसा बचाने के लिए लाख जतन करते हैं पर बात बनती ही नहीं। भाईचारा बचाने के लिए तो केरल के एक राजा ने भारत की सबसे पहली मस्जिद बनाई थी और उसी केरल में आज अस्तित्व बचाने के लाले पड़ रहे हैं। वैसे भाईचारा बचाने का एक बम पिलाट आईडिया है मेरे पास! मेडिकल कॉलेज का नाम राव तुलाराम के नाम पर रख दिया जाए और नसीबपुर के शहीद स्मारक का नाम बदल कर 'शहीद' च्यवन ऋषि स्मारक रख दिया जाए।

अंत में हफ़ीज़ जालंधरी की चार पंक्तियां - 
जो भी है सूरत-ए-हालात कहो चुप न रहो।
रात अगर है तो उसे रात कहो चुप न रहो।।
घेर लाया है अँधेरों में हमें कौन 'हफ़ीज़'।
आओ कहने की है जो बात कहो चुप न रहो।।

जय हिंद 
राकेश चौहान
#RSC 

Wednesday, 28 May 2025

ये बाप मुझे देदे ठाकुर

 राजपूतों, 

आपका सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आपके पास एक गौरवशाली अतीत है तथा उस से भी बड़ा यह है कि आपके कंधे उस अतीत का बोझ नहीं उठा पा रहे। पूरे देश में जहां-जहां भी आप लोग हैं एक न एक नवधनाढ्य जाति आप के विरुद्ध है, उस जाति का नाम अलग हो सकता है लेकिन उसके तरीके हैं एक जैसे ही। उस के पास जमीन है, धन है, शिक्षा है, नौकरियां हैं, व्यापार है, संख्या है, मक्कारी है, आरक्षण है, सरकारी योजनाएं हैं, राजनीति में दखल है और राज में हिस्सेदारी है। है नहीं तो आपके जैसा अतीत और अब इस जाति की नजर आपके अतीत पर है। जहां वे घपला कर सकते हैं वे कर रहे हैं, जहां नहीं कर सकते वहां आप के बुजुर्गों को लांछित कर रहे। आपके महापुरुषों पर अधिकार करने की उनकी तैयारी देखी है आपने! उन्होंने इतिहास गढ़ कर बाकायदा एक श्रृंखला तैयार की और मिहिर भोज से शुरू होकर, पृथ्वीराज चौहान, अनंगपाल तोमर, सुहेलदेव बैंस, महाराणा प्रताप और दुर्गादास राठौड़ तक पहुंच गए! अब आप अपना हाल देखिए! वे मूर्ति लगवाते हैं और नाम लिखते हैं "गूजर" सम्राट मिहिर भोज! और आप "क्षत्रिय" सम्राट मिहिर भोज पर फैसला कर लेते हैं! वे कहते हैं कि अगर पृथ्वीराज चौहान को राजपूत दिखाया तो वह फिल्म नहीं चलने देंगे और बेचारा डायरेक्टर डर के मारे पूरी फिल्म में "राजपूत योद्धा" की जगह "हिंदू" शब्द प्रयोग कर के फिल्म फ्लॉप करवा लेता है! जो लोग लड़ाई में युद्ध घोष का महत्व समझते हैं वे इस डायलूशन से हुई हानि आसानी से समझ जाएंगे।

आप के हिस्से के हर प्रकार के विरोध का जिम्मा शायद करणी सेना ने उठा लिया है! किन्तु उनकी युवा शक्ति इतिहास के सामान्य ज्ञानाभाव में नाली में बह जाती है। जैसा कि हाल ही में राणा सांगा के विरुद्ध टिप्पणी में हुआ! आप लोग समाज की बौद्धिक भूख शांत नहीं कर पाए कि आप का पक्ष क्या है और करणी सेना का सारा विरोध लंगूरों की उछल कूद बनकर रह गया। याद रखिए किसी भी विवाद में दो पक्ष तो होते ही हैं किंतु विवाद के बाहर एक तीसरा पक्ष भी होता है जो यह निर्णय करता है कि क्या सही है तथा क्या गलत! उस तीसरे पक्ष का नाम समाज है और उसे संतुष्ट करना सबसे अधिक आवश्यक होता है। देख रहे हैं ना कि सरकार किस तरह विदेशों में युद्ध से संबंधित पक्ष रखने के लिए प्रतिनिधिमंडल भेज रही है।

जरा गौर करिए कि कैसे एक घाघ खिलाड़ी की तरह हनुमान बेनीवाल ने अपनी राजनीति की डगमगाती नैया 15 शब्दों में किनारे लगा ली। उसे पता है कि उसे कहां बांस गाढ़ना है कि कुछ कलाबाजियां खाते लंगूर उसमें अपना पृष्ठभाग फंसा कर जाटों को उसके पीछे लामबंद कर देंगे। अब वह नर्म पड़ गया किंतु ये भी उसकी स्ट्रैटजी का हिस्सा है। इस विवाद से उपजी फ़सल वह काट कर अपने स्थान पर वापस आ चुका। समझिए कि ये राजनीति की बार बालाएं हैं जिनका उद्देश्य सिर्फ उत्तेजना पैदा करना है। इनका शिकार मत बनिए। इससे पहले राष्ट्रीय कुश्ती संघ पर कब्जे के लिए कुछ लोगों ने बृजभूषण पर इल्जाम लगाकर मामले को सफलता पूर्वक जाट बनाम राजपूत कर दिया था। जबकि संपूर्ण कुश्ती जगत पहले दिन से ही यह बात जानता था कि यह इल्जाम झूठे हैं, जो कि सिद्ध भी हो रहा है। बृजभूषण बरी भी हो जाएंगे पर आपने जो खोया उसका क्या? आप क्यों नहीं स्वयं को इस मामले से पहले दिन ही अलग कर पाए? हजारों साल हुए पर राजनीति की कुटिल चालों के चक्रव्यूह में आप आज भी अभिमन्यु ही हैं। 

करणी सेना के प्रवक्ताओं पर गौर करिए, वे टीवी की डिबेट में भी तर्क व साक्ष्य प्रस्तुत करने की बजाय मरने - मारने की बात करते हैं। इतिहास पर उनकी कोई उल्लेखनीय पकड़ नहीं होती। हिस्टोरिओग्राफ़ी पर उनका ज्ञान शून्य है। उनके प्रतिद्वंद्वी राजपूतों के मुगलों से वैवाहिक रिश्ते बनाने की बात उछालते हैं तो वे लंगड़े लूले तर्क देते हैं। करणी सेना का एक भी प्रवक्ता यह कहते नहीं सुनाई देता कि जिस काल में राजा की बेटी भी सुरक्षित नहीं थी उस काल में आम बेटियों का क्या हाल रहा होगा। हनुमान बेनीवाल जैसों के सवालों के जवाब में कोई भी राजपूत, जाट कन्याओं के मुगलों/मुस्लिमों से विवाह का हवाला नहीं देता जबकि ऐतिहासिक दस्तावेजों में ऐसी घटनाएं भरी पड़ीं हैं। किन्तु समस्या यह है कि कोई अध्ययन नहीं करता। करणी सेना के नेता स्वयं तो चमकना चाहते हैं किन्तु बौद्धिक क्षत्रित्व का उनके पास न तो सामान है और न ही योजना। आज जरूरत तो बौद्धिक क्षत्रियों की है।

एक बात समझ लीजिए कि आप आसमान से नहीं टपके हैं। एक समय पर तो जाति अस्तित्व में ही नहीं थीं और वर्ण भी कर्मानुसार थे। जाति व्यवस्था के आने और उसके दृढ़ होने का जो भी कारण रहा हो, लेकिन अनेकों जातियों की एक पूर्वज से उत्पत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। इतना अवश्य है कि राजपूत काल से हाल ही तक राजपूत पुरुष से अन्य जाति की कन्या का विवाह होने पर उस दंपत्ति की संतान को राजपूत जाति में प्रवेश नहीं था तथा वह कन्या की जाति में ही जाती थी। उसके कम से कम दो विशिष्ट कारण थे, कि एक तो इस्लामिक हमलों से बचने के लिए रक्त शुद्धता के जो मापदंड समाज ने बनाए थे उन पर खरा रहना। दूसरा सत्ता और अधिकार में अंधा होकर कोई भी समर्थ व्यक्ति, आम महिलाओं पर अतिचार न करे। अतः जिस स्त्री से उसे प्रेम था उससे उसे विवाह करने की अनुमति तो थी किंतु इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न संतान को पिता की राजपूती ग्रहण करने का अधिकार नहीं था तथा उसे पिता के गौत्र या किसी नए गौत्र के साथ कन्या की जाति में प्रवेश दिया जाता था। एक ओर तो यह एक सामान्य महिला की शोषण के विरुद्ध सुरक्षा थी दूसरी ओर यह सामाजिक संकट से बचने का सम्मानजनक उपचार था। ऐसी संतान का ओहदा राजपूत पिता की जाति से थोड़ा कम किंतु माता की जाति से ऊंचा रहता था। अनेक जातियों के सैंकड़ों ऐसे वंशों के साहित्यिक रिकॉर्ड के साथ - साथ, वंशावलियों, जनश्रुतियों, लोकगीतों में प्रमाण मौजूद हैं। तथा आज भी इन संतानों का ओहदा अपनी जाति में सामान्य से ऊंचा ही है। इन गौत्रों का सदा ही पितृ राजपूत वंश से भाईचारा रहा है। उस भाई चारे को कायम रखिए, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए लांछित मत करिए।

जब एक राजनीतिक दल ने हिंदुओं को अपने पीछे लाम बंद कर दिया है तो दूसरे निश्चय ही हिंदुओं को जातियों में बांट कर अपने साथ लाने का प्रयास करेंगे। आने वाले समय में यह प्रयास और भी शिद्दत से होंगे। अच्छे से समझ लीजिए इस तरह के हमले और अधिक होंगे तथा कड़वाहट और बढ़ेगी। आप लोगों को अपना होमवर्क सही से करना है। जो- जो लांछन ये आपके ऊपर लगाते हैं वे स्वतः ही उनके ऊपर लग जाते हैं क्योंकि भारतीय समाज ने एक जैसे ही कष्ट समरूप सहन किए हैं। बौद्धिक क्षत्रिय बनिए अपना ज्ञान बढ़ाइए। लगभग सभी प्रमाणिक ऐतिहासिक पुस्तकें इंटरनेट पर मौजूद हैं। अध्ययन करिए समझ लीजिए जो जितना बुरा आपके लिए कह रहा है उससे कई गुना बुरा उसके लिए लिखा है। यह ज्ञान किसी को अपमानित करने के लिए नहीं अर्जित करना बल्कि यह ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर परोसे गए झूठ को सच से अलग करेगा। आपके पुरखों ने जो भी अर्जित किया वह अपने शौर्य से अर्जित किया था। उसके लिए उन्होंने आरक्षण नहीं मांगा चुनाव नहीं लड़े। और शौर्य आत्म बल से पैदा होता है, आत्म बल मजबूत करिए। करणी सेना जैसे संगठन व्यर्थ के सर्कस बंद कर के गांव - गांव में शारीरिक और आत्म बल बढ़ाने के केंद्र स्थापित करें। पुस्तकाल खुलवाएं, बालकों को शिक्षा, खेल, राजनीति और रोजगार में भागीदारी के लिए तैयार करें। शारीरिक, आत्मिक तथा बौद्धिक क्षत्रिय बनाएं वरना आपका सब कुछ हड़पने के बाद गिद्धों की नज़र आप के बाप पर है!

जय माता जी की

राकेश चौहान

#RSC 

यह पोस्ट किसी भी प्रकार से प्रसारित करने को पाठक स्वतंत्र हैं।

Friday, 23 May 2025

इतिहास से व्यभिचार

रामजीलाल सुमन और हनुमान बेनीवाल! 

कैसी विडम्बना है कि एक के नाम में राम है और दूसरे के में हनुमान! 

ऐसे में काका हाथरसी की एक कविता याद आ उठती है। 

"नाम रूप के भेद पर कभी किया है ग़ौर।

नाम मिला कुछ और तो शक्ल - अक्ल कुछ और।।"

चलिए रामजीलाल को राम के हवाले कर के आज हनुमान बेनीवाल की बात करते हैं। 

कहते हैं कि भारमल ने अपनी असली पुत्री का विवाह अकबर से नहीं किया। जिस हरका बाई का विवाह उस ने अकबर के साथ किया वह उसकी अपनी पुत्री थी या नहीं, इस बहस में नहीं जायेंगे। अगर उसने कोई चाल चलकर दासी पुत्री का भी विवाह अकबर के साथ कर दिया होगा तो भी इस विवाह के कारण ही अनेक छोटे राज्यों और उनकी प्रजा का अस्तित्व संकट में आ गया। मुगल जिसके मर्जी आए उस के यहां डोला भेज देते थे। या तो बेटी दो या फिर युद्ध करो! इतनी ताकतवर सेना के सामने युद्ध मतलब हार, हजारों सैनिकों का बलिदान, सामान्य प्रजा में मारकाट, घरों में आगजनी और प्रजा की हजारों महिलाओं का शील हरण। बेचारा राजा प्रजा की हजारों बेटियों का शील बचाने के लिए एक बेटी का बलिदान कर देता था।

मुसलमानों से वैवाहिक संबंध किसी भी काल में अच्छी नजर से नहीं देखे गए। अगर ऐसा ना होता तो जिंदा महिलाएं जौहर की आग में ना प्रवेश करतीं! वीरांगनाएं अपने सिर थाली में सजा कर भेंट में न देतीं! युद्ध से मुंह मोड़ कर आए पतियों के लिए घर के दरवाजे बंद न होते! जौहर न होते, साके न होते! जौहर तो भारत के इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय है! जीवित जलना संभवतः सब से कष्टदाई मृत्यु है! सबसे पहले त्वचा जलती है, कोशिकाएं फूलती हैं, नसें फटती हैं और मृत्यु आने में तो 7- 8 मिनट लगते हैं, सिर कटने में तो एक पल ही लगता है। कितनी कठिन मृत्यु! सिर्फ इसलिए कि जौहर की उन चिताओं की राख का चंदन समाज के माथे पे सज कर धर्म रक्षा की राह दिखाता रहे कि धर्म रक्षकों हमारे बलिदान की लाज रखना! ऐसे बचा है सनातन धर्म! वरना ईराक, ईरान, सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगाल, कश्मीर... सब कुछ तो निगल गए दुष्ट! पूर्वजों ने न जाने कैसे - कैसे धर्म को बचाया है ! 

निश्चित ही मुगलों को बेटी ब्याहना कभी गौरव का प्रश्न नहीं था। इस बात को "किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमति - राणा राज सिंह" तथा "कल्ला राय मलोत" के किस्सों से समझा जा सकता है। यदि गर्व की बात होती तो फर्रूखसियर को अपदस्थ कर के अजीत सिंह अपनी पुत्री को साथ ले जा कर उसकी शुद्धि करके सनातन धर्म में वापसी न करवाता। यदि यह गौरव का विषय होता तो वे पूर्वज मुगल और मुस्लिम कन्याओं से विवाह भी करते। जो कि नहीं हुआ! यदि कभी हुआ भी तो उस कन्या से उत्पन्न संतान न तो राजपूतों में अपनाई गई और न ही हिंदू धर्म में, बल्कि उन्हें मुस्लिम ही बनना पड़ा! 

हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर कुछ अपवाद भी हुए होंगे, जो स्वाभाविक हैं। कुछ लोगों ने लालच में आ कर धर्म परिवर्तन भी किया है और कन्याओं के विवाह भी विधर्मियों के साथ किए हैं। ऐसे व्यक्तिगत उदाहरण राजपूत या किसी एक जाति में न हो कर पूरे हिंदू समाज में हैं। यहां बात हनुमान बेनीवाल की हो रही है तो  

कई जाटों ने अपनी बेटियों को नज़राने के तौर पर देकर मुगलों से ज़मींदारी भी हासिल की। इस तरह के जाटों को अकबरी, जहाँगीरी, शाहजहाँनी और औरंगज़ेबी जाटों के नाम से जाना जाता है, जो उसी मुगल बादशाह के नाम से संबंधित हैं, जिनके शासनकाल में इन परिवारों ने इस तरह के रिश्ते किए थे। यह तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब राजपूतों के पास तो मुस्लिम आक्रमण के पहले से ही राज था किंतु मुगलों के सबसे बड़े लाभार्थी जाट थे जिन को मुगलों ने सबसे ज्यादा चौधराहटें बांटी थीं। असल में चौधरी पद ही मुगलों का बनाया हुआ है। निश्चय ही जाटों के लिए तो यह रिश्ते सीधे - सीधे लाभ प्राप्ति के थे। यह इसलिए अधिक प्रकाश में नहीं है क्योंकि एक तो आमतौर पर यह रिश्ते मुगल घराने में न होकर मुगलों के छोटे सरदारों के साथ हुआ करते, दूसरे, यह नैरेटिव वामपंथी व्यभिचार को रास नहीं आता। लेकिन निश्चित मानिए कि पहले ब्राह्मण और अब राजपूतों को हाशिए पर पहुंचाने के बाद अगला निशाना जाट ही हैं। बारी सब की आएगी क्योंकि आप हजारों सालों से अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं और वामपंथ को यह गवारा नहीं!

इतिहास के कुछ पन्ने सुनहरे हैं तो कुछ स्याह हैं! इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ा जाना आवश्यक है। चाहे कोई भी जाति हो उस समय की परिस्थिति के अनुसार एक समाज के रूप मे उन्होंने अपना सर्वोत्तम किया! तभी तो आज भी हम 100 करोड़ हैं! कहीं- कहीं किसी के निजी स्वार्थ हो सकते हैं किन्तु एक समाज के रूप मे क्या हुआ ये देखना आवश्यक है ! 

जातिवाद के जिस घोड़े पर सवार हो कर हनुमान बेनीवाल को राजनीतिक लाभ मिला था अब उसका बुलबुला फूट चुका। इतिहास के साथ व्यभिचार कर के वह फिर जातिवाद की राजनीति गर्माना चाह रहा है। इस में सब से आवश्यक है कि तथ्यों से अवगत रहें। 

क्रमशः

राकेश चौहान 

#RSC 

Tuesday, 20 May 2025

मित्र भेद

 हफ्ते भर पहले पूर्व सैनिकों की एक सभा में सेना तथा सेना से बाहर के माहौल के बारे में किसी ने एक बड़ी मजेदार बात कही कि वहां आदमी जो कहेगा वह करेगा, जो नहीं कहेगा वह नहीं करेगा किंतु यहां आने के बाद का अनुभव है कि लोग जो कहेंगे वह करेंगे नहीं, जो करेंगे वह कहेंगे नहीं! लेकिन राजनीति इससे भी कई कदम आगे है। यहां दिखता कुछ, करते कुछ, कहते कुछ और होता कुछ!

कोरिया वास में नवनिर्मित महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज का नाम राव तुलाराम के नाम पर रखने के लिए कुछ लोग मुहिम चलाए हुए हैं। तुलाराम से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए और होगी भी नहीं, किंतु यह मेडिकल  कॉलेज उसी ढोसी पर्वत की तलहटी में बना है जिस पर च्यवन ऋषि ने तपस्या की तथा च्यवनप्राश का आविष्कार किया था। इन सब परिस्थितियों में सरकार ने उन्हें यह कॉलेज का समर्पित कर दिया। किंतु वोट बैंक ने यह मुद्दा गरमा कर महापुरुषों को एक दूसरे के सामने ला खड़ा किया। च्यवन ऋषि के नाम के बोर्ड तोड़े जाने के बाद समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई तथा विभिन्न संस्थाओं ने मेडिकल कॉलेज का नाम च्यवन ऋषि के नाम पर ही रहने देने के लिए आवाजें उठाईं और यह लगभग तय हो गया कि कॉलेज का नाम च्यवन ऋषि के नाम पर ही रहेगा। ऐसी उम्मीद थी कि इस बारे में आरती राव या उनके पिता वोट बैंक को समझा कर राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए मामला समाप्त कर देंगे। किंतु इस विवाद में एक नया अध्याय दो दिन पहले तब जुड़ गया जब भिवानी महेंद्रगढ़ के सांसद चौधरी धर्मवीर ने मुख्यमंत्री की महेंद्रगढ़ रैली में कॉलेज का नाम राव तुलाराम के नाम पर रखने की मांग मंच से उठा दी। प्रश्न इस मांग की मंशा को ले कर है। क्या यह मांग धर्मवीर की निजी सोच है या फिर इसके पीछे इंद्रजीत का भी हाथ है? यदि यह धर्मवीर की निजी सोच है तो वे इंद्रजीत के मित्र हैं या शत्रु? अगर वे सचमुच उनके शुभचिंतक हैं तो मुझे लगता है कि राव इंद्रजीत को वातानुकूलित कमरे में बैठकर पंचतंत्र की 'मित्र भेद' खंड की कहानियाँ पढ़नी चाहिएं! यदि इस मांग के पीछे उनका किसी भी प्रकार का हाथ है तो उन्हें  घेर रखने वाली 'जय जय राव - जय जय राव' वाली भजन मंडली से बाहर निकलकर जनता का मन टटोलना चाहिए! उनकी पुत्री ने अटेली में हाल ही में बड़ी कठिन जीत पाई है कहीं ऐसा न हो कि उनके पास सिर्फ वोट बैंक ही रह जाए और हरियाणा चुनाव की तरह साढ़े पैंतीस बिरादरी कहीं और खिसक लें। यदि धर्मवीर उनके शत्रु हैं तो उन्हें तुरंत वोट बैंक को इस विवाद का पटाक्षेप करने का निर्देश देना चाहिए। और भी एक एंगल है कि धुर दक्षिण के उनके घोर विरोधी इस सब के पीछे तो नहीं? वैसे इनके अलावा भी कई प्रश्न हैं! प्रश्नों में प्रश्न हैं! उन प्रश्नों के उत्तरों में भी प्रश्न हैं! सचमुच फ़ौज बड़ी अच्छी जगह थी, सरल और सुंदर....! 

जय हिंद 

राकेश चौहान 

#RSC

Friday, 25 April 2025

तू ही काफिर, तू ही काफिर

 पाकिस्तान के एक मशहूर कवि की एक कविता ‘मैं भी काफ़िर, तू भी काफ़िर' जब-तब वायरल होने लगती है। पहलगाम में काफिरों के नरसंहार का सोचते-सोचते बरबस याद आ उठी। 

'पाकिस्तान को सबक सिखाओ' का शोर हर ओर है, प्रधानमंत्री का भी कहना है कि वह दुश्मन को सात पाताल में भी ढूंढ कर सजा देंगे। जो लोग सातवें आसमान पर जा कर हूरों से मिलने की तमन्ना लिए निर्दोषों के बीच जा कर फट जाते हों, वे पता नहीं  पाताल की ओर मिलेंगे भी या नहीं। इस हिसाब से तो मोदी जी की दिशा एकदम विपरीत हो जाएगी। वैसे भी विपरीत दिशा में चलने की सद्गुण विकृति तो हमारे डीएनए में ही है। (यहां बात उस डीएनए की नहीं हो रही जो सबका एक है।) 

मुंह में घास का तिनका दबा कुरान की कसम खा कर दया की भीख मांगने वाले मोहम्मद गौरी ने अगले साल फिर से चढ़ाई कर दी थी। फिर क्षमा, शांति वार्ता और वापसी के दिखावे की आड़ में, रात के अंधेरे में छुपकर, धोखे से, सोते सैनिकों को काट डाला। उस वक्त मोदी की जगह पृथ्वीराज थे। पृथ्वीराज की दिशा भी विपरीत ही निकली। उसके बाद कभी कश्मीर में, कभी चित्तौड़ में, कभी जैसलमेर में, कभी रणथंभौर में, कभी शरणागत बन कर, कभी धर्म पुत्र बन कर, कभी संत बन कर मानवता का दुश्मन छलता रहा, नौजवान लड़ते मरते रहे, जौहर होते रहे, महिलाएं भोग दासी बनती रहीं और उस काल के शासक भी सातवें आसमान की ओर उड़ान भरने वालों को सात पातालों में खोजते रहे। 

वैसे भी हमें तो विश्वास जीतना है। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास! हां यह विश्वास जीतने का शौक भी नया नहीं है। इस शौक का सबसे पहला शिकार केरल का राजा चेरमन पेरुमल था जिसने देश की सबसे पहली मस्जिद अरब से आने वाले व्यापारियों के लिए बना कर दी थी। उसके बाद तो लाखों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले देश में, शायद स्थानाभाव में!!! हजारों मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनीं! मूर्तियां तोड़कर उनकी सीढ़ियों में लगाई  गईं! जबरन धर्मांतरण हुए! और केरल तो आज आतंकवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट का गढ़ है! फ़िर भी विश्वास जीतने के प्रयास अब तक जारी हैं। 

ईराक के यजीदी, इजरायल के यहूदी, बांग्लादेश, मुर्शिदाबाद और अब कश्मीर के हिंदुओं पर, या विश्व में कहीं भी हुए इस्लामी हमले में जो बात कॉमन है वो है काफ़िर। इस्लाम की सब से बड़ी किताब में काफ़िर के खिलाफ लिखे आदेश मुसलमान को काफ़िर से अहसान फ़रमोशी के अपराध बोध से पल भर में मुक्त कर देते हैं। इस बात को हमारा नेतृत्व डेढ़ हजार साल जाने - अनजाने नकारता रहा है। पहलगाम के दरिंदों को ढूंढ कर मार भी दोगे। पाकिस्तान को भी खत्म कर दोगे। उससे क्या होगा! उस विचारधारा का क्या जो पूरी दुनिया में काफिरों पर होने वाले हमलों के लिए जिम्मेदार है। वो तो आप बच्चों को बता तक नहीं रहे! चलिए अब तक का दोष तो नेहरू के सर मंढ देते हैं। पर आपने इस विषय में क्या किया? इस्लामियों की किताबें भरी पड़ी हैं कि कौन सा मंदिर तोड़कर कहां मस्जिद बनाई! किस जगह कितने काफिरों को मुसलमान बनाया! वो साफ-साफ लिख कर गए! उन्होंने दीवारें तक नहीं बदलीं! 11 साल हुए किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने की हिम्मत हुई आपकी?  संभवतः ये उसी 'गुडी- गुडी' व्यवहार का परिणाम है जिसको पंडित दीनदयाल उपाध्याय और वीर सावरकर ने सद्गुण विकृति कहा है! इनको सर पर ढोने वाले संगठन यदि इन्हें नहीं पढ़ सकते तो सच वाला, साहिल, समीर, ज़फ़र हेरिटिक और सलीम वास्तिक जैसे एक्स मुस्लिमों को ही सुन लें। समस्या तो यही है कि काफ़िर  असली दुश्मन को नहीं पहचानता यदि पहचानता है तो बताने में हिचकिचाता है। वो जिस के पूर्वजों को जबरन धर्मांतरित किया गया था वही मुसलमान काफिरों के खून का प्यासा हो कर इस्लाम का सब से विश्वस्त सिपाही है। उसे पुरखों पर हुए अत्याचार का बोध कराने को अलग विषय तो जाने दीजिए, पाठ्य पुस्तक भी छोड़िए, अध्याय क्या पैरा भी रहने दीजिए, एक पंक्ति भी किसी पाठ्य पुस्तक में है क्या? आतंकियों, पाकिस्तानियों को मिट्टी में मिलाने से काम हो जाएगा? अगर चोट करनी है तो विचारधारा पर करिए। स्कूलों - मदरसों के पाठ्यक्रम में बताईए कि कैसे-कैसे जबरन धर्मांतरण हुए, उनके संदर्भ इस्लामी पुस्तकों में ही मिल जाएंगे, वहीं से उठाइए। जब नई पीढ़ी का सच से सामना होगा तभी इस कट्टरता से लड़ पाएंगे। अपने मंदिर ही नहीं अपने लोगों को रिक्लेम करिए। याद रखिए हर मुसलमान एक मस्जिद है जो मंदिर तोड़कर बनाई गई है। सलमान हैदर की उपरोक्त कविता 'मैं भी काफिर, तू भी काफिर' असल में 'तू ही काफिर, तू ही काफिर' है!