poems

Monday, 10 March 2025

Hare Ka Sahara (Loser's Support)

 It is a soft pink morning of Falgun month! Pedestrians carrying yellow, blue, white, red and saffron flags are passing through Narnaul on the footpath along the railway line. This scene is seen every year but this time it seems like an extension of Kumbh Mela. Perhaps because the scenes of Kumbh are still preserved in the mind. On the Ekadashi of Falgun Shukla Paksha, the head of Khatu Shyam appeared and the then king of Khatu built a temple there. Since then till today, devotees gather there on this day to have darshan of Shyam Ji's head. Throughout the Shukla Paksha, groups of padayatris keep passing through these areas. Lord Krishna needed Barbarik's head to protect religion, this son of Ghatotkach and grandson of Bhima got an opportunity to attain godhood and he did not let it go. To protect Dharma, many great men have attained godhood by giving their heads over time. In every village and hamlet, the shrines of Jujhars (warriors who sacrificed their lives in war) worshipped are proof of this. Certainly, the purpose of worship in Dharma is to attain godliness, that is why sentences and mahavakyas like 'Chidanandrupam Shivoham Shivoham' and 'Aham Brahmaasmi' were invented. Perhaps the purpose of attaining godliness is the root of the theory of incarnation in Sanatan Dharma. Seeing the divine qualities in Barbarik, God himself must have blessed him to be worshipped as his incarnation! That is why Barbarik, who took the pledge to fight on behalf of the losing side, is still the 'support of the loser' in the form of Krishna! In Sanatan Dharma, there are opportunities for everyone from the prince brought up in palaces to the forest dweller child to become God! Ordinary human get opportunities to attain godliness every day, but it turns it’s back on these opportunities. Carrying saffron, a symbol of sacrifice, on his shoulders, he is running on the rough and paved roads of Khatu to seek support. The losers sitting on the seats of trains are fighting for space with the co-passengers standing next to them. The feeling of seeking support is strong, the duty of performing Dharma is secondary! The decline of morality has contributed the most to the downfall of Dharma. The purpose of worshipping gods and becoming like them has been reduced to flattery and pleading. Moksha by taking a dip in Prayagraj! Moksha, which is not attainable even in many births has been made so easy! Undoubtedly, the effort to become like God by immersing oneself in God can be the path to salvation. Just like in becoming Shyam Ji from Barbarik, the real message is not to seek support after losing but to become the support of the loser. Let us go to Khatu from now on to get the power to become a support, not to seek support.

हारे का सहारा

 फाल्गुन माह की नर्म-गुलाबी सुबह है! पीले, नीले, सफेद, लाल और केसरिया ध्वज लिए पदयात्री रेलवे लाइन के साथ वाली पगडंडी पर नारनौल से गुज़र रहे हैं। यह दृश्य हर साल का है लेकिन इस बार यह न जाने क्यों कुंभ मेले का विस्तार लग रहा है। शायद इसलिए कि मस्तिष्क में कुंभ के दृश्य अब भी ज्यों के त्यों सुरक्षित हैं। फागुन शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन खाटू श्याम का शीश प्रकट हुआ और खाटू के तत्कालीन राजा ने वहां एक मंदिर का निर्माण करवाया था। तब से लेकर आज तक इस दिन वहां श्याम जी के शीश के दर्शन करने भक्त इकट्ठा होते हैं। पूरे शुक्ल पक्ष पद-यात्रियों की टोलियां इन क्षेत्रों से गुजर रही होती हैं। धर्म की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण को बर्बरीक का शीश चाहिए था, घटोत्कच के पुत्र और भीम के इस पौत्र के पास ईश्वरत्व प्राप्त करने का एक मौका आया और उसने उसे हाथ से नहीं जाने दिया। इसी धर्म की रक्षा के लिए कालांतर में अनेकों महापुरुष अपने शीश दे कर ईश्वरत्व प्राप्त करते आए हैं। गांव-गांव और ढाणी-ढाणी जुझारों (युद्ध में बलिदान हुए वीर) की पुजती मढ़ियां इस की साक्षी हैं। निश्चय ही धर्म में उपासना का उद्देश्य ईश्वरत्व प्राप्त करना ही है तभी तो 'चिदानन्दरूपं शिवोहम् शिवोहम्' तथा 'अहं ब्रह्माऽस्मि' जैसे वाक्यों और महावाक्यों का आविष्कार हुआ। कदाचित ईश्वरत्व को प्राप्त करने का उद्देश्य ही सनातन धर्म में अवतारवाद के सिद्धांत का मूल है। बर्बरीक में ईश्वरत्व के गुण देख कर ही तो स्वयं भगवान ने उसे उन्हीं के अवतार की तरह पूजे जाने का वरदान दिया होगा! तभी तो हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ने का संकल्प लेने वाला बर्बरीक आज भी कृष्ण रूप में 'हारे का सहारा' बना हुआ है! सनातन धर्म में महलों में पलने वाले राजकुमार से ले कर वनवासी बालक तक के लिए ईश्वर बनने के अवसर हैं! सामान्य मानव को प्रतिदिन ईश्वरत्व प्राप्त करने के अवसर मिलते हैं किंतु वह इन अवसरों की तरफ पीठ किए रहता है। वो तो कंधे पर त्याग का प्रतीक केसरिया लादे 'हारा' बन 'सहारा' लेने खाटू के कच्चे पक्के मार्गों पर दौड़ा चला जा रहा है। रेल गाड़ियों की सीटों पर फैल कर बैठे 'हारे' बगल में खड़े सहयात्रियों से स्थान के लिए झगड़ रहे हैं। सहारा लेने की भावना प्रबल, धर्म निबाहने का कर्तव्य गौण! धर्म के पतन में नैतिकता के ह्रास का योगदान सर्वाधिक है। महापुरुषों को पूज कर उन जैसा बनने का उद्देश उनकी चापलूसी-चिरौरी पर आ कर सिमट चुका। प्रयागराज में एक डुबकी लगा कर मुक्ति! जन्म जन्मांतर में भी न मिलने वाला मोक्ष कितना सहज बना लिया! निःसंदेह ईश्वर में डूब ईश्वर जैसा बनने का प्रयास ही मोक्ष का रास्ता हो सकता है। ऐसे ही जैसे बर्बरीक से श्याम जी बनने में असल संदेश हार कर सहारा खोजने का नहीं 'हारे का सहारा' बनने का है। चलो अब से सहारा लेने नहीं सहारा बनने की शक्ति लेने खाटू चलें।

Monday, 3 March 2025

छाप तिलक सब छीनी री मो से नैना....

 कुछ बात तो है सूफीवाद में कि गोल टोपी पहनने से इनकार करने वाला प्रधानमंत्री जश्न ए खुसरो कार्यक्रम में तालियां बजाता नजर आता है। सच भी है संगीत बला ही ऐसी है। मैं अक्सर अपने संगीतकार और गायक मित्रों को मजाक में कहता हूं कि तुम लोग कोमल हृदई कलाकारों की आड़ में सुरताल के इंजीनियर हो! क्यों कि संगीत तुम्हारे लिए सुरों के उतार-चढ़ाव और वाद्यों की ताल के अलावा कुछ नहीं है किंतु साधारण प्राणी के लिए यह मदहोश करने से लेकर पागलपन और मौत तक है। मनुष्य तो क्या जंगली जानवर तक संगीत में मस्त होकर शिकारी के तीरों का कालान्तर से ही निशाना बनते आए हैं। संगीत, शिकार और शिकारी की जुगलबंदी का सटीक उदाहरण है अमीर खुसरो की लिखी कव्वाली, 'छाप तिलक सब छीनी री मो से नैना मिलाय के।' वही अमीर खुसरो जिसकी याद में फिल्मकार मुजफ्फर अली की रूमी फाउंडेशन नाम की संस्था पिछले पच्चीस साल से 'जश्न ए खुसरो' कार्यक्रम आयोजित करती आ रही है और उसी कार्यक्रम में देश का प्रधानमंत्री आज अतिथि है। मध्यकाल से आज तक यह कव्वाली न जाने कितने प्रसिद्ध और गुमनाम गायकों ने गाई होगी। लता और आशा की जोड़ी से ले कर नुसरत फतह तक ने इसे क्या खूब गाया है! निःसंदेह खुसरो ने सल्तनत काल में अनेकों उत्कृष्ट सूफी रचनाएं की हैं, किंतु भारत में सूफीवाद का उद्देश्य कभी भी प्रेम और श्रृंगार नहीं अपितु धर्मांतरण रहा है और इसी उद्देश्य की पूर्ति करती ये रचना छाप और तिलक छीन कर इस्लाम से नैन मिलाने को प्रेरित करती रही। खिलजी के आक्रमण में जौहर के मार्मिक पलों में भी धधकती ज्वाला में कूदती वीरांगनाओं की देह की सुन्दरता को अपनी रचनाओं में टटोलता नीच खुसरो शताब्दियों से अपने सूफी काव्य से दुनिया को भरमाता आ रहा है। हिंसा, लालच और जजिया के अलावा सूफीवाद भी इस्लामी आक्रमण का प्रमुख हथियार है। कालान्तर में इस्लामी जिहाद सूफियों के दर्शन और कव्वालियों की आड़ में लाखों-करोड़ों छाप-तिलक छीनता आ रहा है। अफगानिस्तान, कश्मीर, दक्कन, दक्षिण और हिंदू राजाओं के वे क्षेत्र जहां इस्लामियों का सीधा दखल प्रभावी नहीं रहा वहां सूफियों ने छाप तिलक छीनने का दायित्व बख़ूभी निभाया। अनेक सूफ़ी संतों ने इस्लामी आक्रांताओं को भारत पर आक्रमण करने को उकसाया और इसके नियम-संस्कारों, राजाओं तथा उनकी सेनाओं के बारे में गुप्त सूचनाएं दी। बहुत सारे सूफियों ने तो तलवार उठा कर इन आक्रमणकारियों का, काफिरों को घुटनों पर लाने हेतु, साथ तक दिया। धर्मांतरण में इनके योगदान, दर्शन और मानसिकता की झलक पाने के लिए अजमेर में ख़्वाजा की दरगाह के आसपास की गलियों में बिकते साहित्य पर आप सरसरी नज़र डाल सकते हैं। चाहे ईरान और उस के उत्तर के क्षेत्रों में सूफियों ने अध्यात्म की गहराई में प्रवेश करते हुए अनलहक़ (मुझ में खुदा है) का दावा करने का इल्ज़ाम खा कर मौत की सजाओं को गले से लगाया हो किंतु भारत में सूफी इतने 'सूफी' नहीं रहे। बुल्ले शाह जैसे एक आध अपवाद हो सकते हैं वरना असंख्य काफिरों को धर्मांतरित कर के सूफियों ने स्वयं को 'अनलहक़' के इल्ज़ाम से बखूबी बचा कर रखा। भारतीयों के धार्मिक प्रतीकों, रंगों और परम्पराओं का दुरुपयोग सूफियों ने धर्मांतरण में बड़ी कुशलता से किया। सूफीवाद को इस्लाम का हरावल दस्ता कहने में मुझे तनिक संकोच नहीं। जिसका शिकार आम भारतीय तो क्या अंतिम हिन्दू सम्राट दिल्ली अधिपति पृथ्वीराज चौहान से ले हिन्दू हृदय सम्राट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सब बन जाते हैं। ऐसे में छाप तिलक की रक्षा कैसे होगी!

राकेश चौहान 

#RSC 

Thursday, 23 March 2023

राम!

 अब से तेरह होली पहले मेरे गांव की होली पर मैंने एक ब्लॉग पोस्ट लिखा था आप इस लिंक पर जाकर वह पढ़ सकते हैं। http://navparivartan.blogspot.com/2010/03/holi-tradition-and-fun.html?m=0

इस होली पर भी सदा की भांति गांव की अन्य दो टोलियां, धमाल गाती, हमारी तरफ के छोर पर पहुंच रही हैं और हमारी टोली उनकी अगुवाई को आगे बढ़ रही है। हवा में उड़ता अबीर - गुलाल! सबके चेहरे, बाल, पैर, वस्त्र रंगों में खिले! लाल, गुलाबी, हरा, नीला, संतरी, केसरिया, पीला.... गुलाल कितने रंगों में आने लगा है! ढप की थाप पर धमाल गाते रंग- रंगीले चेहरे! आंखे बंद, भाव विभोर! अदभुत! गीत गाती टोलियां आपस में समा गईं, हवा में और अबीर उड़ा, सब गले मिले! मिलन की बेला में राम-भरत मिलन से बड़ा भारतीय संस्कृति में क्या हो सकता है भला! तीनों टोलियां बारी - बारी से गा रहीं हैं -
'उठ मिल ले भरत भैया हरि आए, उठ मिल ले।'
प्रसंग वनवास की समाप्ति के बाद राम के अयोध्या लौटने का है और शत्रुघ्न भरत को राम के आगमन की सूचना दे रहे हैं। गीत के बोल पर प्रकाश डालिए शत्रुघ्न कह रहे हैं कि भरत उठो भगवान आए हैं। वे भरत को भैया पुकारते हैं किंतु राम को हरि कहते हैं। ये सोच कर रोमांच हो उठता है कि जनमानस में राम जितने महान हैं उतने ही सुलभ! कोई मिला तो 'रामराम', कोई थका तो 'राम निकल गया', कोई दुष्ट है तो 'उसका तो राम मर गया', अच्छा-बुरा हो तो 'राम देख रहा है ' कोई मर गया तो 'राम नाम सत्य!' बर्बर इस्लामी हमलों के बीच अगर देश की आत्मा को कोई बचा पाया तो वे थे राम। जिस दौर में मंदिर तोड़े जा रहे थे, मूर्तियां खंडित की जा रही थीं उस दौर में तुलसीदास जी ने राम के गिर्द राम चरित मानस रची। उन्होंने भांप लिया कि अंधेरे से यदि सनातन धर्म को कोई उबार सकता है तो वे राम ही हैं। कदाचित जनमानस में राम के प्रति अनुराग को पहचान कर अपने ग्रंथ का नाम रामचरित 'मानस' रखा और 'जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' कह कर उन्होंने इसे और स्पष्ट कर दिया।  संभवतया कुमार विश्वास का 'अपने अपने राम' कार्यक्रम भी इसी भावना से प्रेरित है। बहुत से विद्वान कुमार विश्वास को कवि के स्थान पर सिर्फ एक मंच संचालक मानते हैं लेकिन उनका यह कार्यक्रम 'अपने-अपने राम' सचमुच अद्भुत है। कुमार अपने श्रोताओं के साथ राम में समाते चले जाते हैं और सारा वातावरण राममय हो जाता है। उधर स्वामी प्रसाद मौर्य के राम ही नहीं बल्कि तुलसीदास भी अपने हैं। वे चाहते हैं कि सारा साहित्य मिटा कर उनके हिसाब से लिख दिया जाए। स्वामी प्रसाद के चार चेले सवा सौ रुपए की रामचरित मानस की प्रतियां जला कर खुश हो रहे हैं और वहीं कुछ दूरी पर सड़कों के किनारे खड़े लाखों लोग नेपाल से अयोध्या जाती उन भाग्यशाली शिलाओं को निहार रहे हैं जो राम बनेंगी। इधर मेरे गांव में धमाल की टोलियां भावविभोर होकर रामगुण गा रही हैं!  राम का नाम जितना सहज-सुलभ है राम बनना उतना ही कठिन कि पत्थर से अहिल्या बनने में तो एक युग लगा होगा किंतु पत्थर से राम बनने के लिए साढ़े छह करोड़ साल इंतज़ार करना पड़ता है। #RSC
राकेश चौहान

Sunday, 19 February 2023

बोलो प्यार न होगा कैसे

 जीवन पथ पर चलते - चलते, 
मिल जाएं राही इक जैसे,
बोलो प्यार न होगा कैसे।
इस के मन की चंचल बातें,
आएं जब उसके होठों पर,
दोनों का दिल धक-धक धक-धक,
एक ताल में धड़के ऐसे,
बोलो प्यार ना होगा कैसे।
तुम छू लो जब मेरे मन के,
सभी अनछुए कोने कोने,
छूना चाहूं किसी बात ,
पांव तुम्हारे बढ़ कर ऐसे,
बोलो प्यार न होगा कैसे।
सदियों पहले बिछड़ा कोई,
साथी आ कर गले मिला हो,
मन के सूने आंगन में कोई,
सुंदर फूल खिला हो जैसे,
बोलो प्यार न होगा कैसे।
लो कह  दूं मैं प्रेम है तुमसे,
ज्यों मां को अपने बालक से,
मछली को ज्यों सागर से और,
गाय को जैसे बछड़े से,
बोलो प्यार ना होगा कैसे।
बोलो प्यार ना होगा कैसे।।

Thursday, 16 February 2023

एवोल्यूशन/Evolution

 कुछ दिन पूर्व एक जूलोजिस्ट मित्र ने बताया कि पक्षी मनुष्य से अधिक evolve हो चुका और यदि नर पक्षी का अंडकोष निकाल दिया जाए तो वो अंडे भी देने लगेगा। इतना बड़ा  evolution मेरे लिए एक ख़बर ही थी। अब तक तो मैं पक्षियों के  उड़ सकने की योग्यता ही से ईर्ष्या करता ही आया हूं। Evolve होते हुए मनुष्य ने उड़ने के लिए विमान बना लिए पर उससे पहले कितने लोग हाथों में पंख बांधकर ऊंचाइयों से कूद कर मर गए। Evolve होने की ज़िद ने ही इंसान को आज के मुकाम पर पहुंचाया है। इवोल्यूशन सतत एवं सनातन प्रक्रिया है। इसी कड़ी में सनातन धर्म को 'इवोल्यूशन धर्म' कहने का लाभ उठा रहा हूं। इवॉल्व होने की सुंदरता ही पत्थर में ईश्वर को तलाशने वाले मनुष्य को आध्यात्म की ओर खींचती है और वह सगुण और निर्गुण की व्याख्या करता है, मीमांसाएं लिखता है, द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, स्याद आदि दर्शनों की स्थापना करता है। इवोल्यूशन धर्म की यह सनातन सुंदरता अति आकर्षक है। ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं यह मैं ठीक- ठीक नहीं कह सकता और हर व्यवहार को कुछ नाम देने वाले मुझे 'अग्नोस्टिक' कह सकते हैं किंतु मैं वह भी नहीं हूं और इतना स्पेस मुझे इवोल्यूशन धर्म देता है। किंतु मैं ऐसे अनेक लोगों से मिल चुका हूं जो ईश्वर से साक्षात्कार का दावा करते हैं, ऐसे जो ईश्वर से बातचीत करते हैं और ऐसे जिन्हें ईश्वर संदेश देता है तथा ऐसे भी जिन्हें ईश्वर कदम-कदम पर राह दिखाता है। और यह लोग लगभग हर संप्रदाय से थे। यानि ईश्वर से साक्षात्कार किसी मजहब का गुलाम नहीं है। ईश्वर में आस्था का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह आपको मानसिक रूप से मजबूती प्रदान करता है और आप विश्वास करने लगते हैं कि कोई शक्ति आपकी मदद कर रही है। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक evolution है जो कदाचित स्वयं में ईश्वर को खोजने की प्रक्रिया का प्रारम्भ है। इस प्रक्रिया के चरम को इवोल्यूशन धर्म 'अहम् ब्रह्मास्मि' कहने की अनुमति प्रदान करता है। अब्राह्मिक संप्रदायों में इवोल्यूशन की यह प्रक्रिया अनुपस्थित है वे अपने faith को थोपना चाहते हैं। वे मनुष्य की पत्थर में ईश्वर तलाशने से 'अहम् ब्रह्मास्मि' का दावा करने की evolve होने की राह के बीच में कहीं खड़े होकर उसका अपहरण कर लेते हैं, उसके एवोल्यूशन को बाधित करते हैं। कालांतर में ईसाई और इस्लामिक विचारधाराओं ने विश्व की अनेक एवोल्यूशन संस्कृतियों को निगला है। इन विचारधाराओं में आदम और हव्वा के पाप का प्रायश्चित मनुष्य को करना है और उनके स्वयं के पापों का निपटारा आखिरत के वक्त होगा। आखिरत कब होगी यह पता नहीं। यहां तक कि एवोल्यूशन के रूप में आया इस्लाम भी 'फरदर एवोल्यूशन' का मार्ग बंद कर देता है। लेकिन मनुष्य को तो इवॉल्व होना है। भारत के आदिवासियों को ईसाई बनाने वाला अंग्रेज इवॉल्व होकर हिंदू हो जाता है। किंतु एवोल्यूशन सरल भी तो नहीं! भारत में 50%  और अफ्रीका में 80% ईसाई धर्मांतरण करने वाला मिशनरी बाइबल के खोखलेपन को जानते बूझते इवॉल्व होने से इंकार कर देता है, वहीं उसका साथी इवॉल्व होता है और धर्मांतरण का कार्य और ईसाइयत दोनों को छोड़ कर 'फेयरवेल टू गॉड' जैसी कालजयी पुस्तक लिखता है। बाइबल की अटपटी बातों को गले से उतारने के लिए ईसाइयत के ठेकेदारों ने अपॉलिजेटिक्स नाम की एक नई विधा का आविष्कार किया लेकिन इसी अपॉलिजेटिक्स को पढ़ने के लिए अमरीका गई, वस्त्र भी जीसस से पूछ कर पहनने वाली, एस्थर नाम की एक ईसाई युवती  ईसाइयत वहीं छोड़कर इवॉल्व हो जाती है। यूट्यूब पर उसके अनेकों इंटरव्यू हैं। अरब की मस्जिदों में इमामत करने वाला शख्स इवॉल्व होकर 'सचवाला' के नाम से इस्लाम की चूलें हिला रहा है। अनेकों आकलनों के अनुसार एक तिहाई यूरोप क्रिस्टियानिटी छोड़ चुका और यदि 'सर तन से जुदा' वाला डर समाप्त हो जाए तो आधे मुसलमान इस्लाम छोड़ देंगे। 'गॉस्पेल ट्रुथ' (Gospel truth) मनुष्य के आध्यात्मिक एवोल्यूशन की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है वह जीसस को एक मात्र सत्य और शेष सब बकवास बताता है, सहअस्तित्व को नकारता है। ईसाई और इस्लामिक वैचारिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद मनुष्य के evolution का रास्ता रोके खड़े थे, हैं और रहेंगे। ईसाइयों ने यूरोप, अफ्रीका से लेकर गोवा तक इवोल्यूशनिस्टों पर बर्बर अत्याचार किए हैं। धरती सूर्य के गिर्द चक्कर लगा रही है, इस प्रकार की खोज करने वालों को बाइबल विरुद्ध बातें कहने के अपराध में यातना से लेकर मृत्युदंड तक दिए गए, पुस्तकालयों को जलाया गया, विद्वानों को मार डाला गया। बाद में यही काम इस्लामियों ने किया। इनके अनुयाई जरा सा सवाल करने पर उत्तेजित हो जाते हैं, नाराज होते हैं। सवाल नहीं पूछना बस faith करना है। परंतु इवोल्यूशन की बुनियाद faith नहीं है अपितु सवाल है। पृथ्वी के सभी इवॉल्विंग धर्मों की सभ्यताओं में आश्चर्यजनक वैज्ञानिक और गणितीय गणनाओं के प्रमाण मिलते हैं और उनके खंडहर मात्र के आगे भी अब्राह्मिक विचारधारा कहीं नहीं ठहरती। अब्राहमइकों की किताब में लिखे पर भी आप प्रश्न नहीं कर सकते जबकि इवोल्यूशनिस्ट धर्मों में  ईश्वर के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाने की आजादी है। वेद, उपनिषद, गीता, पुराण सभी तो प्रश्नों पर आधारित हैं। तभी तो इवॉल्यूशन स्वाभाविक, सतत, सनातन प्रक्रिया है। मैं अक्सर उत्पात मचाते बंदरों को 'ताड़ते' समय कहता हूं अरे बंदरों इंसान बन जाओ देखो हम बन गए। चलिए फैसला करें कि बंदर बने रहना है या इंसान बनना है।

Friday, 6 January 2023

गुरु पर्व

 कैसी विडंबना है कि हजारों सालों की गुरु शिष्य परंपरा में से शिष्य के अपभ्रंश 'सिक्ख' शब्द को लेकर एक अलग संप्रदाय बन जाए जबकि भक्ति आंदोलन के उस दौर में अनेक पंथों के संत अपने शिष्यों को निर्गुण और सगुन का ज्ञान दे रहे थे। गुरु नानक देव जी से प्रारंभ हुए नानक पंथ में ही गुरु गोविंद सिंह ने खालसे बनाए पर ये भी कहा - 

"तुम खालसे हो हिंदू धरम।

पंथ नानक को छत्री करम।।"

अर्थात खालसा न तो हिंदू धर्म से अलग और न नानक पंथ से।

 गुरु तो गुरु पर शिष्यों का समर्पण ऐसा कि पंजाब के सनातनी हिन्दू समाज ने गुरु के चरणों में अपने बड़े पुत्र अर्पित किए जो अगले तीन सौ सालों तक अनवरत चलता रहा। किसी पिता के लिए अपने बड़े पुत्र से प्रिय कुछ नहीं हो सकता। गुरु दक्षिणा में भी इससे बड़ा हो क्या सकता था! इसी दक्षिणा से गुरुजी ने खालसे बनाए, पर कभी अलग संप्रदाय तो नहीं बनाया।  धर्म की जब भी बात आई तो स्वयं को हिंदू ही बताया, खालसा को तो पंथ ही कहा।

सकल जगत महीं खालसा पंथ गाजै।

जगै धर्म हिन्दू तुरक दुंद भाजै।।

बड़ा पुत्र केश रखकर खालसे में शामिल हो गया तो छोटे पुत्र बिना केश या सहजधारी ही रहे। पर दोनों शिष्य (सिक्ख) भी रहे, नानक पंथी भी और हिंदू भी।

स्वधर्म हेतु पूरे परिवार का बलिदान करने वाले गुरु गोविंद सिंह के आने वाले शिष्यों (सिखों पढ़ें) ने अंग्रेजों का ऐसा पाठ पढ़ा कि स्वयं को हिंदू धर्म से अलग और मसीही मजहबों के नजदीक बताने लगे। सहजधारियों को शिष्य (सिक्ख) मानने से इनकार कर दिया। फिर आया अलगाव का ऐसा दौर कि पंजाब में निर्दोषों को बसों से उतार कर गोलियों से भूना गया। देश की राजधानी की सड़कों ने बेकुसुरों को जिंदा जलाने के मंज़र देखे। दैवकृपा से स्थिति सुधरी पर विदेशों में षड्यंत्र चलते रहे। लाल किले पर राष्ट्रध्वज का अपमान हुआ और राष्ट्रवादी पार्टी की सरकार धृतराष्ट्रवादी निकली। भगवे के नाम पर इसी सरकार की पीठ पर बरसों सवारी करने वाली पार्टी की सांसद ने संसद में तिलक और जनेऊ बचाने का एहसान जताया। पर यह तिलक और जनेऊ थे किसके? क्या ये गुरु के शिष्यों (सिक्खों) के स्वयं के नहीं थे? बल्कि पंजाब में हिंदू धर्म (सिख पंथ इसमें ही शामिल है) को बचाने के लिए शेष भारत के हिंदुओं ने योगदान दिया। गुरुओं ने मदद के लिए अधिकतर पत्र उत्तर प्रदेश और बिहार में लिखे। छठे गुरु के साथ ग्वालियर में कैद रहे 52 राजाओं ने उन्हें सेना तैयार करके दी। पहला सिख राज्य खड़ा करने वाला बंदा सिंह बहादुर दिया। भाई सती दास, भाई मती दास, भाई दयाला, पंडित कृपा दत्त दिए। गुरु तेग बहादुर का मस्तक बचाने के लिए अपना शीश देने वाला कुशल सिंह दिया। पवित्र सरोवर और दरबार साहब की पवित्रता बहाल करने वाले मराठे दिए। पहले पांच खालसा 'पंज प्यारों' में से चार पंजाब प्रांत से इतर स्थानों के ही नहीं थे क्या? अरे हरसिमरत, ओए योगराज देख किसने किसकी रक्षा की। कभी राजा जय सिंह ने और कभी राम सिंह ने कभी गुरु की आन बचाई और कभी जान बचाई। क्योंकि गुरु हिंदू थे और हिंदू गुरु के थे। वैसे भी ये तिलक जनेऊ बचाने का 'एहसान' पंजाब तक ही सीमित है। उसी औरंगज़ेब के दौर में, उसी दिल्ली से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर नारनौल में जब सतनामी अपना तिलक और जनेऊ बचाने के लिए लड़ रहे थे तो उनके साथ एक भी "शिष्य" नहीं था। वो अलग बात है कि सतनामियों को इतिहास में स्थान नहीं मिला। हजारों सतनामी मारे गए, शेष वर्तमान छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि तक पलायन कर गए। क्षेत्र में एक भी सतनामी न बचा। ऐसा पलायन तो कश्मीर से भी नहीं हुआ। राजपुताने में, मध्य भारत में, दक्कन में, असम में जहां भी हिंदू तिलक जनेऊ बचाने को लड़ा उसके साथ एक भी 'शिष्य' न था। ये सब लिखने का उद्देश्य किसी बलिदानी के बलिदान को कम आंकना नहीं है अपितु इस और ध्यानाकर्षण करवाना है कि अलग- अलग क्षेत्रों में हिंदू चाहे किसी पहचान के साथ लड़ा हो पर लड़ा अपने धर्म के लिए ही। किसी ने किसी 'दूसरे' की रक्षा नहीं की बल्कि स्वयं की रक्षा की। और पंजाब का सहजधारी तो आज भी गुरुओं का अहसान सम्मान से सर पे रख रहा है। जबकि तिलक जनेऊ के तथाकथित 'रखवालों' ने इन्हे शिष्यी (सिक्खी) से बाहर करवा दिया। कानून बनवा कर उन्हें गुरुद्वारों में वोट डालने से रुकवा दिया। 

गुरु गोविंद सिंह जी ने भी कभी अलग मजहब नहीं बनाया उन्होंने पंजाब को हर जगह 'मद्रदेश' लिखा, सागर को 'सिंधु' लिखा। स्वयं को बार-बार 'देवी का दास' लिखा।  उन्होंने 'हर' लिखा 'हरि' लिखा, 'रामावतार' 'कृष्णावतार' लिखा, देवी की स्तुति लिखी। खालसा बनाने से पहले देवी की तपस्या की। स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि पुराणों, रामायण, महाभारत और वेदों तक थी। राजस्थान के राजपूतों से शस्त्र तो कश्मीर के ब्राह्मणों से शास्त्र विद्या ली। उन जैसा कौन हो सकता था! यही होता है कोई महापुरूष समाज में चेतना लाने को अपना जीवन न्यौछावर कर देता है पर उस के अनुयाई अलग मजहब बना के बैठ जाते हैं। कितने मज़हब, कितने संप्रदाय, कितने फिरके! रे मानुष विचित्र!

गुरु गोविंद सिंह जी के जन्मदिवस का उपलक्ष्य है। प्रभात फेरियां भी निकल रहीं हैं। अवसर है कि फेरियों में यह भी प्रसारित किया जाए कि सिख पंथ भी एक सनातनी परंपरा है न कि अलग मजहब। सभी को गुरुजी के प्रकाशोत्सव पर शुभकामनाएं। #RSC