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Friday, 3 April 2026

महिला दिवस

 

यह पोस्ट एक प्रकार से पुरुष दिवस पर लिखी मेरी पोस्ट का महिला दिवस का भाग है, इस लिंक पर क्लिक करके पुरुष दिवस की उपरोक्त पोस्ट पढ़ सकते हैं

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'घोड़ी पर बेटी का बनवारा निकाला, लड़का -लड़की समान होने का संदेश दिया।' 

हर दो-चार दिन बाद ऐसी एक खबर वाट्सअप ग्रुपों में आ ही जाती है। किंतु आश्चर्य है कि यह सामानता प्रदर्शित करने के लिए बेटे को सलवार पहना कर बनवारा निकालने की एक भी खबर आज तक नहीं आई! खेल हो या राजनीति, पढ़ाई हो या नौकरी लगी हो, बेटी ने अच्छा किया तो सम्मान समारोह में पगड़ी पहना दो! किंतु आज तक किसी भी बेटे का सम्मान चुनरी पहना कर हुआ हो, मैं ने नहीं सुना। समानता या तो लड़की को घोड़ी पर बिठा कर आती है, या फिर सर पर पगड़ी रख कर! नारी के इन अभिनंदनों में नारी कहां है? महिला का अभिवादन उसे पुरुष बना कर करना उसका सम्मान है या अपमान! 

तथाकथित 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' कुछ ही दिन पहले गया, कुछ महिलाओं ने मुझ से शुभकामनाएं 'छीनने' का असफल प्रयास किया। किन्तु पितृ सत्तात्मक, मनुवादी, पुरुष वर्चस्व वादी समाज में रहने वाले व्यक्ति से इस विषय में अपेक्षा ही क्या की जा सकती है! निश्चय ही हर जानने वाली महिला को महिला दिवस 'विश' करना 'कूल' होता होगा परन्तु अधिकतर 'एंपावर्ड' महिलाओं और 'कूल डूड्स' को नहीं पता कि पुरुषों के बराबर मज़दूरी और काम के घंटे कम करने की मांग करती अनेकों महिलाओं ने यूरोप के देशों में जानें गंवा कर 1915 के बाद ही महिला दिवस कमाया था। वैसे भी यूरोप ने महिलाओं को मतदान का अधिकार भी पहली बार लगभग उसी समय देना आरम्भ किया था और इस्लामी इलाके का तो कहना ही क्या! जबकि भारत में लोकतंत्र और इसमें महिलाओं की भागीदारी के प्रमाण ईसा से भी बहुत पहले के हैं। अब्राहमियों के अनुसार महिलाएं 'शैतान की बेटियां' और 'पुरुष की खेती' ही रही हैं जो उनकी धार्मिक किताबों में आज भी दर्ज़ है। रोमन साम्राज्य में गणित, खगोलीय ज्ञान और विज्ञान से चर्च के सिद्धांतों को चुनौती देने वाली महिला विद्वान हिपेशिया को यातनाएं दे कर मार दिया गया था जबकि भारत में उस से हजारों साल पहले अपाला, लोपामुद्रा, गार्गी, अरुंधती, घोषा जैसी विदुषी नारियां वेदों की ऋचाएं तक लिख रही थीं। आदि शंकराचार्य तथा मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ की न्यायधीश मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी भारती ने 42 दिन चले शास्त्रार्थ के बाद तटस्थ न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए आदि शंकराचार्य को विजेता घोषित किया था किंतु उन के मंडन मिश्र की अर्धांगिनी यानि स्वयं को भी हराने के बाद ही। अर्थात पत्नी की हार के बिना पति की हार भी अधूरी ही थी। यह घटना किसी नारी के विद्वती होने का प्रमाण ही नहीं अपितु भारत के सामाजिक मूल्यों और महिला की श्रेष्ठ स्थिति तथा उसकी न्याय प्रियता की झलक भी है। दाम्पत्य, विद्वता, संस्कार, न्याय और नारी शक्ति का ऐसा एक भी उदाहरण वहां नहीं मिलता जहां महिला दिवस गढ़ा गया।

वामपंथी का मूल हथियार है कि वह समाज के अंदर दो वर्ग पैदा करता है फिर उनमें दरार बनता है एक वर्ग को शोषक और दूसरे को शोषित प्रदर्शित करता है तथा उस दरार को बढ़ाता है। यह कहीं उद्योगपति तथा मजदूर, कहीं उच्च जाति निम्न जाति, कहीं अफसर कर्मचारी, कहीं महिला पुरुष, कहीं पति-पत्नी और यहां तक कि कहीं अभिभावक तथा संतान के रूप में कुछ भी हो सकता है।

महिला से भेदभाव और उसको समाप्त करने के महिला दिवस जैसे चोंचले दोनों ही भारत को मिली पाश्चात्य भेंट हैं और महिलाओं को पुरुष बना कर बराबरी का ढोंग करने वाले वामपंथ के मासूम औजार! 

Saturday, 29 November 2025

सामाजिक न्याय

 'सामाजिक न्याय के पुरोधा वीपी सिंह को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि', वगैरा-वगैरा......। परसों पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुण्यतिथि थी। पूरे दिन पिछड़ा विमर्श के तथाकथित पुरोधाओं की छातियों से इतना दूध टपका कि सोशल मीडिया पर घड़े के घड़े भर गए। किंतु एससी एसटी आरक्षण से लाभान्वित वर्ग अंबेडकर को जिस तरह सर पर उठाए रखता है ऐसा पिछड़ों ने वी पी सिंह के लिए कभी नहीं किया। इसका एक बहुत बड़ा कारण मुझे यह लगता है यह उनके सामंती अत्याचार के नॉरेटिव को कभी सूट नहीं किया, क्योंकि पिछड़े के नाम पर लाभान्वित वर्गों में अधिकतर वही लोग हैं जो अब तक सामंती नॉरेटिव का सिक्का चला कर अपना रोजगार चलाते आ रहे हैं और वीपी सिंह तो सचमुच के राजा थे। यह बात राजनीति के मामले में तो और सटीक लगती है। 1941 में मांडा की छोटी सी रियासत के राजा बने वीपी सिंह ने भारत का राज हाथ में आते ही एक दशक से ठंडे बस्ते में पड़ी मंडल कमीशन की रिपोर्ट को एक झटके में लागू कर दिया। कुछ अजीब सा संयोग था कि वी पी सिंह को याद करने की एक दो पोस्ट का नोटिफिकेशन मुझे दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में लगे एफडीडीआई के स्टाल में मिला। एफडीडीआई यानि 'फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट'। यह संस्था प्रशिक्षित फुटवियर डिजाइनर तैयार करती है। मुझे रमेश भाई की याद आई। रमेश भाई से मेरी मुलाकात प्रतिदिन प्रातः तालाब पर होती है। बाजार में उनकी दुकान है मुझे याद है बचपन में गोविंद टॉकीज में 'आजाद शू मेकर्स' के नाम से उनकी विज्ञापन स्लाइड चला करती थी। रमेश जी के पिता जूते के अच्छे कारीगर थे, वे स्वयं भी हैं और उनके दोनों पुत्र भी जूते के व्यवसाय में ही हैं। उनके पूर्वजों ने महाराजा पटियाला के नारनौल आगमन पर उन्हें एक तोले तथा 10 तोले के जूतियों के दो जोड़े उपहार स्वरूप दिए थे। एक तोला यानी 12 ग्राम! एक तोले की जूतियों की खासियत थी कि दोनों जूतियां मुट्ठी में आ जाती थी और दस तोले वाली जूती के अंदर कुछ छल्ले लगे थे, ऐसा रमेश भाई बताते हैं कि वह उतारने के बाद 5- 6 कदम दूर जाकर रुकती थीं। महाराजा पटियाला ने उन मोचियों को मुंह मांगा इनाम दिया तथा एक बड़ी इमारत, जिसे आज भी महल के नाम से जाना जाता है, उन्हें उपहार स्वरूप दी। रमेश भाई ने बताया कि पहले इस तरह की छल्ले वाली जूतियां और चर्र - मर्र की जूती फैशन में थी जो चलते समय चर्र- मर्र आवाज करती थीं।

इतिहास में कभी भी किसी राष्ट्र अथवा प्रदेश के स्वर्णिम काल का आधार उपजाऊ भूमि अथवा सरकारी नौकरियां नहीं रही, अपितु कलाकार, शिल्पकार, व्यापार आदि रहे हैं। अनेक गुरुकुलों का अध्ययन करने के बाद राजपाल जी ने लिखा है कि गुरुकुलों में शिक्षा प्राप्त करने वाले 80% छात्र इन्हीं श्रेणियों के थे जिन्हें आज पिछड़ा कहा जा रहा है। पहली सदी ईसा पूर्व से तीसरी सदी तक का समय भारत के इतिहास में व्यापार का युग माना जाता है। इस काल के अधिकतर दान के ताम्रपत्र शिल्पियों तथा व्यापारियों से संबंधित हैं। शिल्पी अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान गुरुकुलों में तराशते थे तभी तो भारत में बना रेशम और मलमल सोने के बराबर तुल कर पश्चिम के बाजारों में बिकता था। ब्राह्मण वैद्य, तो कुम्हार और नाई चिकित्सक और सर्जन होते थे। बढ़ई आर्किटेक्ट हुआ करते। कांटी गांव में मेरे पूर्वज ठाकुर साहब रामबख्श सिंह जी द्वारा बनाई गई धोली कोटडी का नक्शा एक बढ़ई द्वारा तैयार किया था जो कि वास्तु कला का अद्भुत नमूना है! गोखुर आकार के प्लाट पर बनी इस इमारत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अंदर का कोई भी भाग टेढ़ा नहीं है तथा सभी कक्ष आयताकार या वर्गाकार हैं।मैकाले शिक्षा पद्धति ने गुरुकुल शिक्षा को तहस-नहस कर दिया। शिल्पकार जो अपने पूर्वजों से तथा गुरुकुल में सीखते थे वही अब एफडीडीआई सिखा रहा है। एफडीडीआई के फेकल्टी शर्मा, वर्मा, त्रिपाठी, सक्सेना, यादव इत्यादि हैं। इनमें से कई नाम से पहले डॉक्टर और प्रोफ़ेसर भी लिखते हैं। जूतों का काम कर के न ये मोची बने और न जूते बनाने वाली एडिडास, नाइक, रीबॉक आदि कंपनियां! किंतु अपने पैतृक हुनर से व्यवसाय कर के डेढ़ करोड़ का मकान बनाने वाला मोची ही है। उसके मोहल्ले के कुछ बच्चे आरक्षण से नौकरी पा गए कुछ आठ दस हज़ार की अस्थाई नौकरियां करते हैं। बाकी रीबॉक के सेकंड कॉपी जूते पहन के छोटा मोटा काम करके शाम को दो पैग मार कर सो जाते हैं। एफडीडीआई ने इनके बुजुर्गों से कुछ नहीं सीखा और ना ही यह एफडीडीआई से कुछ सीख रहे। आरक्षण सब को नौकरी नहीं देता, बढ़ई, नाई, कुम्हार, लोहार इत्यादि अपना पैतृक काम छोड़ कर छोटी मोटी नौकरियां तलाशते घूमते हैं। इन के व्यवसायों पर मोहम्मदवादी काबिज़ होते जा रहे हैं। यह है पिछड़ों के मसीहा का सामाजिक न्याय और उनकी समाज को भेंट! 

सादर!

राकेश चौहान 

#RSC 

Wednesday, 26 November 2025

'नहीं है'

 एक रेल यात्रा में एक ने मेरे एक साथी से वही रोंगटे खड़े करने वाली ताली बजा कर कहा 'ला, दे रे!' साथी बोला 'नहीं है!' वो बोला/बोली 'तेरे पास भी नहीं है मेरे पास भी नहीं है, आजा मेरे साथ।' 

देश के अलग अलग स्थानों से कई मित्रों ने नारनौल के शोभापुर निवासी रिटायर्ड आईपीएस आर एस यादव का वायरल इंटरव्यू मेरे पास भेजा है जिस में वे कह रहे हैं कि अभय चौटाला ने उन्हें पुलिस चौकी में लिटा कर 39 जूते (आन मिलो सजना) मारे। मैं हैरान तो इस बात से हुआ कि ये वीडियो कितना वायरल हो गया, पर हरियाणा का वो जंगल राज भी याद आ गया। हालांकि वो बिहार जैसा नहीं था, किंतु था जंगल राज ही! चौटालाओं ने जो चाहा किया। क्या हुक्मरान और क्या कार्यकर्ता सब ने दोनों हाथों से माल समेटा। अफ़सर को अदना सा कार्यकर्ता ही कह देता था, 'यो काम कर दिए, ना तो अपने गूदड़ बांध लिए!' कोई- कोई 'कमाऊ पूत' तो डीएम (डीसी) तक को कह देता कि 'अजय (चौटाला) भाई साहब ने कहा है कि काम कर देगा वरना टखने तोड़ दूंगा।' कहते हैं नौकरशाही घोड़े की तरह है जो तुरन्त अपने सवार को पहचान जाती है। हरियाणा में आज सामान्य कार्यकर्ता तो क्या बीजेपी के पदाधिकारियों तक को अफसर कुछ नहीं समझते। किसी काम के लिए जाते हैं तो ऐसे जैसे बच्चा प्रिंसिपल ऑफ़िस में जा रहा हो। ये फर्क है इस सरकार में और उस में!

 मेरा वार्ड नारनौल का सबसे अधिक डेकोरेटेड वार्ड है। इस एक ही वार्ड में कुल चार पार्षद हैं। तीन- तीन नॉमिनेटेड, सुदर्शन बंसल, पासी वर्मा और संजय वाल्मीकि। चौथे पार्षद महोदय हैं अजय सिंघल जिन्हें हमने बाकायदा वोट के जरिए चुनकर नगर परिषद भेजा है। पांचवीं हैं श्रीमती मंजू बाला जो ग्रीवेंस कमेटी की सदस्य हैं। पहले ग्रीवेंस कमेटी का हिंदी में अर्थ होता था 'कष्ट निवारण समिति' आजकल क्या है मुझे नहीं पता! अनेक कष्टों में एक कष्ट यह है कि पुरानी कचहरी के पास बहुत समय से एक सीवर लीक है जिसका पानी अक्सर दूर तक इकट्ठा हो जाता है। इस मार्ग पर चलते हुए पदयात्रियों को कई परीक्षाओं में से गुजरना पड़ता है जिन में से एक है आते जाते वाहनों से लगने वाले गंदे पानी के छीटों से बचना और दूसरा कीचड़ से बचने के लिए उछल-उछल कर चलना! इसमें तुर्रा यह है कि सीवर की मरम्मत के लिए वहां लगे ट्रांसफार्मर को हटाया जाना है यानी मामला नगर परिषद और बिजली विभाग का है। दोनों सरकारी महकमे हैं लिहाजा दोनों के बीच फाइल - फाइल का खेल पिछले डेढ़ साल से चल रहा है। लगता है ऐसा कोई नेता, मंत्री या अधिकारी नहीं है जो इन दोनों महकमों को इस मामले के निस्तारण के लिए कह सके। 

नगर परिषद की जो हालत आज है वह पहले कभी न थी। पार्षदों की तो औकात है ही क्या ऐसा लगता है कि अधिकारी- कर्मचारी चेयरपर्सन की भी नहीं सुनते और अधिकारियों तथा कर्मचारियों की नहीं सुनते HKRN वाले! भ्रष्टाचार की नई सुरसा का नाम है HKRN जो सब कुछ निगलने को मुंह खोल कर खड़ी है। सभी महकमों में इसके माध्यम से लगे कर्मचारी हैं जो भाजपा के किसी न किसी प्रभावशाली नेता की सिफारिश से लगे हैं। ये भी शेर के पट्ठे अपने को उस नेता से कम नहीं समझते! छोटे-मोटे कर्मचारी की तो बात है क्या, किसी भी विभाग का बड़े से बड़ा अधिकारी भी इनसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं करता। अधिकतर महकमों में माल वाली जगह पर यह कच्चे कर्मचारी बैठे हैं और ऐसा भी सुनते हैं कि ये लोग माल अपने आका नेता तक पहुंचाते हैं। नगर परिषद में तो एक कर्मचारी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल तक जा आया और वापस आकर उसी कमाई वाली सीट पर बैठ गया। 

सरकार ने वैसे तो सीएम विंडो, ग्रीवेंस कमेटी, समाधान शिविर जैसे कई प्लेटफार्म बना रखे हैं पर यहां समाधान होता नहीं और कार्यालयों में कोई करता नहीं! रिमाइंडर डाल लो, उच्च अधिकारी के पास मामला ले जाओ होना कुछ नहीं है। हां सरकार ने कुछ महकमों में फीडबैक तंत्र विकसित किया है तो आपके पास फोन आता रहेगा जिसमें एक महिला पूछेगी कि आप कार्यवाही से संतुष्ट हैं या नहीं! ज़ाहिर है आपका काम नहीं हुआ तो आप नहीं ही कहेंगे। 'कुछ होगा - कुछ होगा' की आस में अगले हफ्ते नया फोन आ जाता है। ये फीडबैक किस अंधेरे कुएं में जाता है, पता नहीं! ऐसे में आर एस यादव का इंटरव्यू देखने के बाद वो सरकार याद आ गई। हालांकि इन महोदय के साथ हुए अमानवीय व्यवहार का मैं स्वाभाविक विरोधी हूं। असल में जो इक़बाल सरकार का होना चाहिए वो इस सरकार का नहीं है। अधिकारी ही शासन प्रशासन चला रहे हैं और लोकतंत्र में जो होना चाहिए वो न जनता के पास और सरकार के पास भी 'नहीं है!'

सादर

राकेश चौहान 

#RSC 

Sunday, 23 November 2025

दुर्गादास राठौड़

 डम- डम डम-डम ढोल बाजे, बाजे थाप नगाड़ां की।

आसे घर दुर्गाे ना होतो, सुन्नत होती सारां की।।

आज बात आसकरण के वीर पुत्र दुर्गादास राठौड़ की! दस ही दिन हुए होंगे जब उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे उस महापुरुष की छतरी पर मैं कृतज्ञ खड़ा था जिसने औरंगज़ेब से धर्म की रक्षा की, आज उसी की पुण्यतिथि है। जितना भाव विभोर और कृतज्ञ मैं महाकाल के सामने था उतना ही दुर्गादास की छतरी पर था!

मारवाड़ का राजा जसवंत सिंह औरंगजेब को पसंद नहीं करता था। अतः उसने ने उत्तराधिकार संघर्ष में दारा शिकोह और फिर शुजा का साथ दिया था। शिवाजी की शाइस्ता खान पर हमले में मदद की, औरंगजेब के पुत्र को उसके विरुद्ध बगावत को भड़काया। औरंगजेब ने भी कसर नहीं छोड़ी। पहले तो जसवंत सिंह के पुत्र पृथ्वी सिंह को शेर से निहत्था लड़ने के पुरस्कार स्वरूप ज़हर बुझी पोशाक भेंट की जिस से वह बीमार हो कर मर गया, फिर जसवंत सिंह को मारवाड़ से दूर काबुल भेज दिया और मारवाड़ में सारे मंदिर तुड़वाने का हुक्म दे दिया बदले में जसवंत सिंह ने ईरान तक की मस्जिदें तोड़ने का आदेश दे दिया। औरंगजेब को अपना फरमान वापस लेना पड़ा। इसी शह मात में जसवंत सिंह की काबुल में ही मृत्यु हो गई। उस समय जसवंत सिंह की दोनों रानियां गर्भवती थीं। दोनों ने एक एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन उनमें से एक शिशु की मृत्यु हो गई। 

जब दुर्गादास राठौड़ जसवंत सिंह के नवजात पुत्र तथा उसकी रानियों को काबुल से मारवाड़ ले कर आ रहा था तो औरंगज़ेब ने उन्हें नजरबंद कर लिया तथा मारवाड़ पर अधिकार कर लिया। तथा अजीत सिंह का धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाने लगा। 250 सैनिकों की टुकड़ी के साथ एक दिन दुर्गादास, ठाकुर मोकम सिंह बलुंदा और मुकुंद दास खींची चौहान बालक अजीत और उसकी माताओं को ले कर निकल गए। रास्ते में दस-दस की टुकड़ियों में राजपूत पीछा करते सैनिकों से लोहा लेकर बलिदान होते रहे! जिस से दुर्गादास और मुग़ल सेना के बीच अंतर बढ़ता गया। पूरे देश में एक ही सुरक्षित जगह थी मेवाड़। अजीत सिंह वहीं पला और उधर दुर्गादास राठौड़ 30 साल मुगलों से लड़ते रहे।  

"आठ पहर चौंसठ घड़ी, घुड़लै ऊपर वास।

सैल अणी हूँ सेकतो, बाटी दुर्गादास।।"

अर्थात दिन रात घोड़े की पीठ पर बैठा दुर्गादास बाटी भी भाले की नोक पर सेक कर खाता।

औरंगजेब से बगावत करके आए उसके पुत्र अकबर के पुत्र और पुत्री को दुर्गादास ने अपने पास रखा और उन्हें मौलवी नियुक्त करके इस्लामी शिक्षा प्रदान की। बाद में बड़े होने पर उन्हें उसने सकुशल औरंगजेब के पास पहुंचा दिया। जब औरंगजेब ने अपनी पोती से पूछा कि दुर्गादास अब कैसा दिखता है तो उसने कहा कि अब का तो पता नहीं मैंने उन्हें बचपन में ही देखा था । अब वह जब भी आते थे तो हमारे और उनके बीच में पर्दा रहता था। कहते हैं कि दुश्मन की बहू बेटियों को माल ए गनीमत समझने वाला भावुक हो गया था! क्योंकि वह तो अजीत सिंह को भी इस्लाम कबूल करवाना चाहता था। जसवंत सिंह के मरने के तुरंत बाद उसने पूरे देश में जजिया लगा दिया था। यही फर्क था दुर्गादास और औरंगजेब में और यही फर्क है हम में और उनमें। इतिहासकारों ने दुर्गादास राठौड़ को सही स्थान नहीं दिया लेकिन कवि ने सही ही कहा है

' आसे घर दुर्गाे ना होतो, सुन्नत होती सारां की।।' 

 अर्थात आसकरण के घर दुर्गादास ना होता तो सब की सुन्नत हो गई होती।

सादर

राकेश चौहान 

#RSC

Thursday, 20 November 2025

पुरुष दिवस

 मानव की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न मतों के विभिन्न विचार हैं। वेदों की दृष्टि में सृष्टि की उत्पत्ति वातावरण के बदलने से चार प्रकार के जीवन के जन्म से हुई। अंडज (अंडे से उत्पन्न), पिंडज (गर्भ से उत्पन्न), स्वेदज (पसीने से उत्पन्न), और उद्भिज (बीज से उत्पन्न)। अतः मनुष्य पिंडज श्रेणी में आता है। पुराणों के अनुसार आदिमनु और शतरूपा सृष्टि के पहले पुरुष और महिला थे। पुराणों में मानव जाति के आगे बढ़ने के कई वृतांत मिलते हैं। ईसाई मत के अनुसार ईश्वर ने पहले मिट्टी से पुरुष यानि एडम की रचना की और उसका अकेलेपन दूर करने के लिए, उसके मनोरंजन हेतु, मिट्टी से नहीं अपितु उसी की पसली की हड्डी से, महिला अर्थात् ईव को बनाया। ईसाइयों ने इस मत को यहूदियों से नकल किया, जिसे मोहम्मदियों ने एडम को आदम और ईव को हव्वा नाम देकर कुरान में शामिल कर लिया। 

जीव विज्ञानियों के अनुसार पुरुष के जीवन पर गर्भ में उत्पत्ति के साथ ही संकट प्रारंभ हो जाता है। पुरुष भ्रूण के जीवित रहने की दर कन्या भ्रूण से काफी कम है, जो कि उसके जन्म के पश्चात भी, मृत्यु पर्यंत, कम ही बनी रहती है। अर्थात उत्पत्ति से लेकर अंत तक महिला पुरुष से अधिक मजबूत है और पुरुष संकट में है। मानव शास्त्र के अनुसार भी काल क्रम में महिला ने स्वयं को अधिक विकसित किया है जो कि उसके व्यवहार में भी दिखाई देता है। महिला स्थिर एवं तृप्त है जबकि पुरुष अस्थिर और असंतुष्ट। महिला डटकर मुकाबला करती है जबकि पुरुष पलायन वादी है। पुरुष को तो उसके कर्त्तव्य का पालन कराने हेतु भी महिला को अपना सर तक काट कर भेंट करना पड़ता है। पुरुष वह बिगड़ैल बच्चा है जो वर्जनाओं को तोड़ना चाहता है परंपराओं को नष्ट करना चाहता है! नारी को परंपराओं का महत्व पता है, वह संयमित है, उनका पालन एवं संरक्षण करती है! या ये कहें कि उत्पत्ति के क्रम में प्रबंधन में महिला तथा क्रियान्वयन में पुरुष ने अपने आप को विकसित किया है। 

भारतीय मान्यताओं में महिला और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं तथा इब्राहमिक मान्यताओं में उत्पत्ति से ही महिला मनोरंजन का साधन है। जिसे ईश्वर ने सिर्फ इसलिए बनाया था ताकि आदम का मन लगा रहे। आर्थिक सामाजिक रूप से पूरा विश्व इब्राहमिक विचारधारा का गुलाम हो चुका है व सनातन संस्कृतियां या तो समाप्त हो गईं या फिर दम तोड़ रही हैं। आवश्यकतानुरूप इब्राहमिक मान्यता वाले विश्व में ही महिलावाद या महिला विमर्श पैदा हुआ और फैला। सनातन संस्कृतियों में इसकी आवश्यकता इतनी ही थी कि वह इब्राहमिक छाया से निकलकर सनातन विकास के प्रकाश में चली जाएं जहां वे पुरुष और स्त्री के अधिकार एवं कर्तव्य निर्धारित कर चुकी हैं। किन्तु ऐसा हो न सका और महिला पुरुष की 'बराबरी' करने निकल पड़ी। पर क्या ये संभव है? हर घर में एक - दो बच्चे। बेटी से मां घर का काम नहीं करवाएगी क्योंकि उसे तो पुरुष बनाना है न! बेटी तो महिला है घर से बाहर भी नहीं जाएगी तो फिर बेटा बाहर का काम करेगा, पुरुष है न! एकल परिवार, एक बेटा! बेटा यहां जा, बेटा वहां जा। बेटा पढ़ेगा या फिर बाहर भीतर के काम करेगा! बेटा पढ़ेगा तो बाप जाएगा! पुरुष है न! कार्यक्षेत्र में खतरे वाली जगह महिला नहीं जाएगी पुरुष जाएगा। महिला के लिए अलग से छुट्टियां, उसकी की सुरक्षा सुनिश्चित करते अनेकों कानून- कायदे। अब महिला को पुरुष बनाना है तो कुछ कीमत तो चुकानी होगी ना। अंततः महिला न पुरुष बनी ना महिला रही। दरकते घर, टूटते परिवार! कार्यक्षेत्र में संकट! बेटी को परिवार संभालना मां सिखा ही नहीं रही, बस उसे पुरुष बनना है। अदालतों में तलाक के मुकदमों के अंबार, बेटे जेलों में, पंचायतों में या अदालत में! पुरुष दवाब में महिला बदहवास! ये है महिला को पुरुष बनाने की कीमत! बेटी बचाओ बेटी - पढ़ाओ ठीक है, पर बेटा पढ़ाओ - बेटी सिखाओ भी चलना चाहिए। पुरुष खतरे में है तो पुरुष दिवस भी ठीक ही है। शेष महिला दिवस पर।

सादर!

राकेश चौहान 

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RSC 

Tuesday, 18 November 2025

तोर दुपट्टा से पोंछबो कट्टा

'तोर दुपट्टा से पोंछबो कट्टा।

जहिया अई तो RJD के सत्ता!!'

और

भैया के आवे दे सत्ता।

कट्टा सटाए के उठाय लेबो घरा से।।


कह रहे हैं कि इन गानों ने बिहार में जंगल राज की याद ताजा कर दी और आरजेडी का सफाया हो गया।


परसों एक मित्र ने फोन करके खिन्नता से कहा कि मुख्यमंत्री ने च्यवन ऋषि मेडिकल कॉलेज का नाम बदल कर राव तुलाराम के नाम पर रखने की, आज की रैली में, घोषणा कर दी है। मेरे मुंह से निकला 'नायबड़ो करगो के खेल!' वह बोला 'क्या?' मैंने कहा कि हरियाणा में जाट धरती में बिठा दिए, उत्तर प्रदेश और बिहार में अहीर टिका दिए और आज बीजेपी ने दक्षिणी हरियाणा में अहीर केंद्रित राजनीति को ठिकाने लगाने लगा दिया। खैर 'कुत्ता कान ले गया' की आवाज़ सुन कर, कुत्ते के पीछे ना भाग कर, मैं अपने कान पर हाथ लगा कर देखने वालों में से हूं, अतः मैने भाषण सुनने के लिए यू ट्यूब का रुख किया।


हफ़्ते भर पहले राष्ट्रवादी यू ट्यूबर बाबा रामदास (बाबा की खरी खोटी चैनल वाले) का सानिध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने मुझसे पूछा कि हरियाणा के अहीरों और यूपी बिहार के अहीरों में क्या फर्क है। मैंने कहा कि हरियाणा का अहीर यदमुल्ला नहीं है!  हरियाणा के किसी अहीर को ये कहते नहीं सुना कि वो हिन्दू नहीं अहीर है जबकि लोकसभा चुनाव के मौसम में बहुत सारे जाट और ठाकर भी गाते फिर रहे थे कि वो हिन्दू नहीं बल्कि जाट/राजपूत हैं, जैसे वो आसमान से टपके हों। और यूपी बिहार के अहीरों की तो बात ही छोड़ दीजिए। अहीर आज के दिन दक्षिणी हरियाणा में सब से अधिक प्रगतिशील जाति है, जिस का एक मात्र लक्ष्य तरक्की है और इसकी गूंज हर क्षेत्र में दिखती है। इलाके के सभी बड़े स्कूलों के संचालक अहीर हैं। हर व्यवसाय में, हर नौकरी में अहीरों का बोलबाला है। IAS, IPS, सेना में अधिकारी, आई आई टी, MBBS, हर क्षेत्र में अहीर! दक्षिणी हरियाणा का अहीर दुपट्टे से कट्टा पोंछने वाला भी नहीं है। बल्कि इलाका  आमतौर पर अपराध मुक्त है तो इसका कारण निःसंदेह अहीरों का अपराध में न के बराबर शामिल होना है। जो नए नए कुकुरमुत्ता गैंग उग रहे है वे भी गैर अहीर ही हैं। यदि कहा जाए कि अहीर इस क्षेत्र का ग्रोथ इंजन है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 


भाजपा की हिन्दू राजनीति से मुस्लिम तुष्टिकरण का किला ढहने के समानांतर जिस परिवर्तन पर लोगों का अधिक ध्यान नहीं वो ये है कि कहीं ओबीसी, कहीं सामंतवाद, कहीं ब्राह्मणवाद, कहीं किसान-कमेरे जैसे नारे लगाकर, 18-20% की आबादी के दम पर 30- 40 साल से राजनीति के पटल पर छाई विशेष जाति की राजनीति को हर जगह बाकी समाज ने झटक दिया। इस झटके की सबसे पहली शिकार 24 के लोकसभा चुनाव में भाजपा बनी। किंतु भाजपा की सब से बड़ी खूबी है कि ये पार्टी सीखती बहुत जल्दी है। इसने सीखा और जाट केंद्रित राजनीति को धता बता कर हरियाणा विधानसभा में ही बाजी पलट दी। दक्षिणी हरियाणा में राव इंद्रजीत की पुत्री के हारने से बाल - बाल बचने के बाद क्षेत्र की अहीर आधारित राजनीति के अंत की दस्तक तो सुनाई दी थी किन्तु इसकी पटकथा कोरियावास मेडिकल कॉलेज के नाम पर विवाद उठा कर कुछ मूर्खों ने स्वयं ही लिख दी। हालांकि च्यवन ऋषि के सामने राव तुलाराम को खड़ा करना किसी के गले नहीं उतरा और शेष समाज की बात तो छोड़िए, अधिकांश अहीरों ने ही इस विवाद को गलत बताया। किंतु वोट बैंक तो वोट बैंक है, नहीं माना! इस पृष्ठभूमि में जब मुझे मुख्यमंत्री की घोषणा का पता चला तो मेरे मुंह से उपरोक्त 'खेल कर गया' शब्द ही निकले। हालांकि जब मुख्यमंत्री का भाषण सुना तो समझ आया कि च्यवन ऋषि मेडिकल कॉलेज परिसर में बनने वाले अस्पताल का नाम राव तुलाराम के नाम पर होगा। यानि चम्मच में च्यवनप्राश! चाटते रहो! फिर भी यह अच्छा फैसला है। च्यवन ऋषि और तुलाराम दोनों ही क्षेत्र के महापुरुष हैं और च्यवन ऋषि तो तुलाराम के लिए भी महापुरुष रहे होंगे। परलोक में उनकी आत्मा स्वयं को च्यवन ऋषि की गोद में पा कर हर्षित ही होगी। लेकिन दो सवालों का जवाब नहीं मिल रहा। पहला, जिस गांव की ज़मीन पर यह मेडिकल कॉलेज बन रहा है उसके आसपास के लोगों को नौकरी तथा कॉलेज की सीटों में आरक्षण देने की मांग, जो निःसंदेह जायज थी! उसका क्या हुआ! क्या वो तुलाराम के नाम के अस्पताल के नीचे दब गई? फिर महीनों चले धरने का क्या औचित्य हुआ? वहां के लोगों को मिला क्या? अस्पताल के नाम का झुनझुना! खैर दूसरा सवाल कि क्या शेष उत्तर भारत की तरह दक्षिणी हरियाणा में भी 'अधिसंख्य जाति' केंद्रित राजनीति के दिन लद गए? जो भी हो पर पहले हरियाणा और अब बिहार के नतीजों का सबक तो सबके लिए है कि कोई भी जाति समाज को लंबे समय तक बंधक नहीं बना सकती, जब वो ठाड़ पर उतर आती है तो समाज उसको उसकी जगह दिखा ही देता है। इसके प्रमाण आने वाले समय में देखने को मिलते रहेंगे। वैसे यू ट्यूब पर दुपट्टे से कट्टा पोंछने वाला गाना ज़रूर देखिएगा! 

सादर 

राकेश चौहान 

#RSC

Thursday, 30 October 2025

आरक्षण

प्रातः भ्रमण के दौरान रास्ते के सभी कुत्तों से मित्रता ही हो गई है और उनके में से कई तो दूर से आता देख कर या आवाज सुन कर दौड़े चले आते हैं । उन में से कुछ पास आ कर घूम घूम के मेरी टांगों से कमर रगड़ने का लुत्फ़ भी उठाने लगते हैं। क्योंकि कपड़े मुझे नहीं धोने होते तो मैं घणी सी परवाह भी नहीं करता। कपड़े स्वयं न धोने की बात यहां लिखना मात्र संयोग नहीं अपितु मेरा दंभ है तथा इसे आप अपने तरीके से समझने के लिए स्वतंत्र हैं। बहरहाल इस प्रातः कालीन यात्रा में मैं रात की बची रोटियां अपने इन मित्रों के लिए लेकर जाता हूं। मार्ग में मिलने वाले कुत्तों के कई दलों में से एक में एक मादा हाल ही में ब्याई है। इस दल का दलपति एक तगड़ा शेरू सा कुत्ता है और खाना डालते ही वह सबसे पहले खाता है, बाकी कुत्ते उसके खाकर हटने तक दूर खड़े देखते रहते हैं। कल मैं ने जब रोटियां डाली तो अन्य कुत्तों के साथ शेरू भी दूर ही खड़ा रहा! मैं समझ नहीं पाया कि माजरा क्या है। तभी वह मादा दूर से दौड़ती आई और कुत्तों के बीच से निकलती रोटियों तक पहुंच कर मासूमियत और कृतज्ञता के भाव आंखों में लिए रोटी चबाने लगी। आश्चर्य! कुत्तों को भी यह समझ है कि किसको भोजन की अधिक आवश्यकता है! अर्थात त्याग और कृतज्ञता ईश्वर प्रदत्त नैसर्गिक गुण हैं। सबल का त्याग और निर्बल की कृतज्ञता परिवारों और समाज को जोड़ कर रखने की सनातन परंपरा है। कथा कहानियों के अलावा सार्वजनिक कुएं, अस्पताल, तालाब, धर्मशाला इत्यादि इसके अनेकों उदाहरण आज भी मौजूद हैं। 'एक कमाया करता दस खाया करते' की बात तो बुजुर्गों से सुनते ही हैं। उन 'दसों' का पेट भरने के लिए न जाने कितने 'एकाें' ने अपनी जिंदगियां होम कर दी होंगी! किंतु त्याग और कृतज्ञता के आधार पर सब स्वतः ही चलता रहा।

 आरक्षण भी वही त्याग और कृतज्ञता के ईश्वर प्रदत गुण से उपजी व्यवस्था है ! किन्तु मनुष्य कुत्तों जितना 'उत्कृष्ट ' जीव नहीं है। उसमें स्वार्थ है, आपाधापी है! वो तो कुत्तों को भी उनके स्कूल खोल-खोल कर अपने जैसा ही बनाना चाहता है। अनारक्षित के अनुसार आरक्षण आरक्षित को दी जानेवाली भीख है तो आरक्षित के लिए सदियों से रोक कर रखा गया उसका हक़। इसमें न कहीं त्याग ही है और न कृतज्ञता! जबकि न भीख भारतभूमि का शब्द और न हक़! 

वोट चटोरे राजनेताओं के अलावा भी बहुत से प्रज्ञावान लोगों से सुन चुका कि आरक्षण समय की यात्रा में पीछे छुटे बांधवों को साथ लेकर चलने का प्रयास है किंतु आज तक एक भी आरक्षित को सार्वजनिक मंच तो छोड़िए निजी तौर पर भी इस व्यवस्था के लिए समाज का धन्यवाद करते नहीं सुना! अम्बेडकर ने आरक्षण दिया यह चपरासी से ले कर सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश तक गाता फिर रहा है, किंतु समाज के लिए आभार के दो शब्द किसी के पास नहीं हैं। नवबौद्धों और क्रिप्टो क्रिश्चियनों के पास इन्हीं हिंदुओं के लिए प्रार्थनाओं और शपथों तक में कोसा काटी और गालियां तो हैं किंतु कृतज्ञता का दाना भी नहीं है। हैरानी है कि आज तक खुलकर यह कहने वाला कोई नहीं मिला कि पहले जो हुआ सो हुआ होगा किंतु आज हमारी पीड़ा समझ कर इसी समाज ने हमें अलग से अवसर उपलब्ध कराए। खेद है कि आरक्षण ऐसी व्यवस्था हो गई है जिसमें न त्याग बचा है और न कृतज्ञता! यदि मनुष्य अपने निकटतम मित्र कुत्तों से भी नहीं सीख सकता तो विनाश अधिक दूर नहीं।

शेष अगली बार!

सादर!

राकेश सिंह चौहान 

#RSC

Tuesday, 21 October 2025

गुला काका

उसका असली नाम याद नहीं किंतु सब उसको गुला काका ही बोलते थे। गुला काका श्रीनगर में हमारी वायुसेना मैस में वेटर था। बहुत सीधा और सच्चा इंसान! सभी वेटर और मेस बॉयज की तरह वह भी कश्मीरी मुसलमान था। बाकी लोग गुला काका को छेड़ते रहते। मज़ाक करते, उसकी चीजें छिपा देते। कभी - कभी वह बहुत परेशान हो जाता। उन दिनों मैं मेस का इंचार्ज था। 10-12 नौजवान मेस बॉयज थे! अच्छे लड़के थे, मजीद, मुख़्तार, एक दो नाम याद हैं। मुझ से बड़ा प्रेम रखते थे, मैं भी उनका ख्याल रखता। जब मैं वहां से तबादला हो कर जा रहा था तो उन्होंने मुझे विदाई पार्टी दी और उनमें से आधे उस दौरान रोने लगे! खैर, ऐसे ही एक दिन गुला काका छेड़छाड़ से परेशान, मेस के रेस्ट रूम में, चारपाई पर, दीवार के सर लगा कर अधलेटा था। मैं देखते ही सारा माजरा समझ गया। ढांढस देने के उद्देश्य से मैं उस से बात करने लगा। गुला काका झटके से बैठ गया, बोला कि इनको मेरा देवता सजा देगा! और फिर वैसे ही लेट गया। उसकी इस अदा पर अपनी हंसी दबाते हुए मैंने पूछा - कौन देवता? वो फिर वैसे ही उठा और अपनी बात कह के फिर लेट गया। मेरी हर जिज्ञासा का जवाब देने को वह वैसे ही बैठता और वापस अधलेटा हो जाता। जितना रोचक उसका लेट- बैठ था उतनी ही रोचक उसकी कहानी! उस ने बताया कि उसके घर के बगल में एक मंदिर है, क्योंकि क्षेत्र के हिंदू घाटी से पलायन कर चुके थे और घाटी के बचे- कुचे मंदिर केंद्रीय सुरक्षा बलों की देखरेख में थे और गुला काका रोजाना उस मंदिर में साफ- सफाई करता था। गुला काका बोला कि उसे कोई समस्या होती है तो वह मंदिर में जा कर देवता को कह देता है। मैंने उस से पूछा - क्या वो तुम्हारी सुनता है? मेरे इस जघन्य अपराध पर उसने मुझे घूर कर देखा जैसे और बोला, 'तो क्या आपका सुनेगा? हम वहां रहता है, सेवा करता है तो हमारा नहीं सुनेगा क्या?' उसकी सरलता से मेरा मन भर आया। मैं ने उस से पूछा कि हिंदू क्यों चले गए? 'आपको पता नहीं है यहां का हाल?' मैं निरुत्तर हो गया!

मुसलमानों का इस्लामीकरण एक धीमी किंतु सतत प्रतिक्रिया है। बारीकी से देखने पर समझ आता है मुसलमान और इस्लाम दीन के अलग-अलग पड़ाव हैं। मुसलमान होना त्वरित है किन्तु इस्लामी होना प्रक्रिया। आरम्भ में इस्लाम अपने नए शिकार को अधिक नहीं कुरेदता, इस्लाम का हरावल दस्ता सूफीवाद इस विधा का माहिर है। सूफियों की दरगाह पर लगे हिंदू चिह्न इस के प्रमाण हैं। यही चिह्न इस्लाम अपने नए मुसलमानों पर से भी नहीं हटाता। ऐसे ही जैसे मंदिरों के शिखर गिरा कर उन्हीं दीवारों पर गुंबद बना कर मस्जिद की शक्ल दे देना और कुछ समय बाद दीवारों पर लगे हिंदू चिह्न कुफ्र हो जाते हैं, जो कि रेगमाल से रगड़ कर मिटाए जाते हैं। फिर एक दिन कश्मीर में घूमती तबलीकें कह देंगी कि गुला काका कुफ्र कर रहा है और उसके सनातनी निशान रेगमाल से रगड़ रगड़ के हटा दिए जाएंगे। बहुत से मुसलमानों को अपनी जाति - गौत्र, सब पता है। कुछ तो अपनी कुलदेवी की पूजा तक करते हैं! उनकी महिलाएं हिन्दू महिलाओं की तरह साड़ी बांधती हैं, कुछ बिंदी भी लगाती हैं (राजपूत मुसलमानों के विषय में यह बात जानता हूं, इसके बारे में एक अलग पोस्ट होगी किसी दिन)। किंतु इस्लाम सब कुछ छीन कर इंसान के हर पहलू पर छा जाने का नाम है और निश्चय ही गुला काका भी करोड़ों लोगों की तरह उन के निशाने पर है। एक समय था जब मेवात में एक भी पर्दा नशीन दिखाई नहीं देती थी, आज दृश्य अलग है। तभी तो कहता हूं कि मुझे हर मुसलमान में मस्जिद दिखाई देती है जो मंदिर तोड़ कर बनाई गई है।

राकेश सिंह चौहान 

#RSC 

Saturday, 11 October 2025

आरएसएस

 सरस्वती स्कूल में पढ़ते थे तो शाखा में जाना स्वतः ही हो गया। विक्रम जी यादव, सुभाष जी सैनी, अशोक जी वर्मा, एक दो नाम भूल रहा हूंगा, यह लोग शाखा लगाते थे। यह वह समय था जब किसी भी राज्य में भाजपा की सरकार एक बार भी नहीं बनी थी। 30- 35 बच्चे, मेरी उम्र के, शाखा में आया करते। पूरा गणवेश तो पहने किसी को कभी देखा हो याद नहीं, हां विक्रम जी और सुभाष जी खाकी निक्कर और सफेद कमीज़ में ज़रूर आया करते। भगवा ध्वज के सामने प्रार्थना, जिसकी हमें शुरू की 3-4 पंक्तियां ही आतीं थीं 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे.... नमस्ते नमस्ते' तक। किसान और लोमड़ी, घोड़ा पटक, रुमाल झपट जैसे खेल खेलते और फिर बैठ कर किसी महापुरुष की कहानी! संसाधन नहीं थे पर जज़्बा था। आज समझ आता है कि आरएसएस को यहां तक लाने के लिए लाखों स्वयंसेवकों ने कितना संघर्ष किया होगा। आज आरएसएस को 100 साल पूरे हो गए। सही है परिवर्तन आने में सौ साल तो लगते ही हैं। नगर में पूरे गणवेश में पथ संचलन हुआ, अच्छी खासी तादात भी थी। लग रहा था कि शहर के सभी सेवक आज स्वयंसेवक हैं। वैसे भी राज भाजपा का है तो सब संघी ही हैं। किंतु संघ की ताकत पथ संचलन नहीं बल्कि शाखा है। जब आरएसएस कुछ नहीं थी तब भी एकमात्र शाखा में 30-35 बच्चे आते थे। मुझे नहीं लगता आज नगर में लगने वाली चार-पांच शाखाओं में कुल मिलाकर भी इतने बच्चे आते होंगे। 12 साल जैसा हुआ राज्य में हिंदू संस्कृति को पुनः जागृत करने का दावा करने वाली सरकार है किन्तु नारनौल के ज्ञात इतिहास के पहले बलिदानी राजा नूनकरण के जिस किले पर आरएसएस का कार्यक्रम हुआ वहां नूनकरण के नाम का एक पत्थर तक नहीं है।

कांटी एक ऐतिहासिक गाँव

 एक गधरसा छाप फेसबुक कमेंट में मुझ से बोला कि जब हिंदुओं को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया गया तो तेरे पूर्वज कैसे बच गए ? उसे यह इतिहास बताना पड़ा। 

बात तब की है जब मेरे पूर्वज कांटी गांव में नहीं आए थे बल्कि बरड़ोद में रहते थे।कुछ लोग मेरे पूर्वज, जो क्षेत्र के सामंत थे, के पास गए तथा फरियाद की कि मुसलमान जबरदस्ती एक ब्राह्मण कन्या का निकाह मुसलमान युवक से करना चाहते हैं। मेरे पूर्वज ने अपने एक पुत्र के साथ सैनिक टुकड़ी भेज दी तथा ब्राह्मण को विवाह की तारीख निश्चित करने का आदेश दे दिया। जब बारात आई तो वहां महिलाओं के वेश में सैनिक बैठे थे। लड़ाई हुई और सारे आतयातियों को मार कर समारोह स्थल में आग लगा दी। उसके बाद दोबारा हमले के डर से लोगों ने इस गांव में रहने से मना कर दिया तब मेरे बुजुर्ग ने राणा की उपाधि तथा क्षेत्र के गांव दे कर अपने पुत्र को स्थाई रूप से यहीं बसा दिया।

मुगल काल

 मुगल काल में भारत दुनिया का सबसे अमीर देश था! यह एक अलग सेकुलरी चूर्ण है! निसंदेह उस वक्त भारत दुनिया का सबसे अमीर देश था। किंतु मुगल काल में जीडीपी दर कम हुई थी। 1000 ईस्वी में जहां यह 28% के आसपास थी मुगल काल में यह 22 से 24 परसेंट रही। नेगेटिव जीडीपी ग्रोथ का सीधा-सीधा अर्थ यह हुआ कि सरकारी खजाने में बढ़ोतरी हो रही थी लेकिन आम लोग गरीब हो रहे थे। मुगल काल में लैंड रिवेन्यू सबसे ज्यादा था। अकबर के समय में यह हालांकि आधिकारिक स्तर पर 33% था लेकिन इसकी असल वसूली 50% से भी ऊपर थी। अर्थात किसान की उपज का आधे से अधिक भाग सरकार वसूल कर रही थी।

Without lies Islam dies

 बस यही फर्क है इस्लाम में और सनातन धर्म में। इस्लाम आपको कहता है कि आंख बंद करके मान लो और सनातन धर्म कहता है कि नहीं प्रमाण मांगो, शंका उठाओ, बहस करो। कुरान कहती है कि ये है खुदा का आखिरी कलाम और उसके बाद ढक्कन बंद! किंतु गीता कहती है कि युद्ध भूमि में खड़े होकर भी आपको स्वयं भगवान से अपनी शंका का समाधान करने का हक है! प्रश्न पूछ रे अर्जुन! नास्तिक दर्शन- आस्तिक दर्शन, वाम मार्ग-दक्षिण मार्ग, नानक पंथी, दादू पंथी, कबीर पंथी, सतनामी, पौराणिक, आर्यसमाजी ... कितनी धाराएं! कितना ज्ञान! कितने प्रश्न! कितने समाधान! कोई किसी के खून का प्यासा नहीं! कोई किसी को काफिर कह के नहीं मार रहा। मुसलमान की पढ़ाई भी कुरान की तर्ज पर हो रही है। कोई सवाल नहीं कोई भी विवेचना नहीं, बस मान लो! किंतु कम से कम भारत में तो इसका कारण शिक्षा व्यवस्था ही है कि सच्चाई जानबूझकर दबा दी गई। नई रिसर्च तो जहां-तहां, इस्लामी समकालीन लेखकों द्वारा इस्लामी किताबों में लिखे गए हिंदुओं पर अत्याचारों को भी पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया। क्योंकि उस वक्त मुस्लिम नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में था वह स्वयं को तुर्की और अरबी ही मानते थे। उन्होंने हिंदुओं को गंगा जमुनी तहजीब के नाम से भरमाया और मुसलमान को यह भरोसा दिला दिया कि आप अरबी और तुर्की ही हो! असल में तो इस्लामियों के सबसे अधिक अत्याचार मुसलमान पर ही हुए हैं लेकिन सिर्फ एक सोच ने कि 'बस मान लो' उन को दिमागी कुंद कर दिया! अपने भाई का सिर काट कर अपने बाप को भेजने वाला औरंगजेब उनका आदर्श है और रामनामी चादर ओढ कर घूमने वाला, वेद उपनिषदों का अनुवाद फारसी में करवाने वाला दारा शिकोह काफ़िर! दिक्कत ये है कि मुसलमान सवाल नहीं पूछता बस मान लेता है। उसे सवाल पूछने वाली व्यवस्था तक रास नहीं आती इसीलिए किसी इस्लामी देश में लोकतंत्र कामयाब नहीं होता। जिस दिन मुसलमान सवाल पूछने लगेगा चीजें अपने आप ठीक होने लगेंगी। क्योंकि -

Without lies Islam dies!

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दलित कार्ड

 वाकई दलित कार्ड हर बार ताश के खेल का हुकुम का इक्का साबित होता है। ये सामने आया नहीं कि बाकी 51 पत्ते ज़मीन पर लंबलेट! चला तो यह गया बी. आर. गवई पर जूता फेंकने के मामले में भी था, लेकिन जिसको इन्होंने हुकुम का इक्का समझ कर पटका मारा था वो तो चिड़ी  का गुलाम निकला और हुकुम का इक्का राकेश आनंद के हाथ से मुस्कुराता हुआ बाहर आया। राकेश आनंद की एक ही बात ने कि गवई कहां का दलित वो तो बौद्ध है, असली वाला दलित या SC तो मैं हूं, जैसे वामपंथी-मिशनरी गठबंधन की धोती का धागा ही खींच दिया। इस डर से कि अब दलित> नव बौद्ध> ईसाई रूट का भांडा फूटेगा कि कैसे घाल मेल करके SC में नवबौद्धों को शामिल किया गया, चुप्पी छा गई। जैसे ताश के खेल में हुकुम के इक्के को ब्रह्मास्त्र कहते हैं वैसे ही दलित कार्ड भी अचूक है। किंतु अफसोस है कि हर बार ये विघटनकारियों के हाथ में ही मिलता है जो हर चाल के बाद समाज या राष्ट्र का कुछ हिस्सा जरूर तोड़ता है। इस बार इसका राकेश आनंद के हाथ में मिलना एक सुखद संयोग ही कहिए।

क्या आपको सूनपेड याद है? अजी वही पलवल के पास एक गांव में दो दलित बच्चों को सोए हुए ही जला दिया था। दलित कार्ड चला गया और मासूम बच्चों को जिंदा जलाने के  इल्ज़ाम में 11 'ऊंची जाति के दबंग ठाकुर सामंत' जेल चले गए। पुलिस की शुरुआती जांच में ही सामने आ गया था कि केरोसिन बाहर से नहीं फेंका गया बल्कि घर के अंदर से ही कुछ हुआ है। किंतु फिर से 51 पत्ते हुकुम के इक्के के सामने पस्त हो गए। निर्दोष मनुवादी पड़ोसी गिरफ्तार हुए, रोला हुआ और अंत में जांच सीबीआई के पास आ गई। जाँच में सीबीआई ने 11 के 11 आरोपियों को निर्दोष पाया विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें दोष मुक्त भी कर दिया। फौजदारी मुकदमे पूरे के पूरे परिवारों को बर्बाद कर देते हैं! इन आरोपियों के परिवारों पर क्या बीती होगी यह तो वही जाने, किंतु फिर उन दो मासूम बच्चों की मौत का जिम्मेवार कौन था? दलिल कार्ड के नीचे असल अपराधी छिप गया। हो सकता है कि वो परिवार का सदस्य या उन बच्चों का पिता ही हो। जो भी हो एक अपराधी उसी समाज के बीच खुला घूम रहा होगा जिसकी रक्षा के लिए दलित कार्ड बना था। ये दलित समाज के लिए अच्छा हुआ या बुरा? उस समय हरियाणा में बीजेपी सरकार बने कुछ ही समय हुआ था जो दलित कार्ड के सामने घुटनों पर आ गई थी।

पिछले सप्ताह हरियाणा के ही पुलिस अधिकारी वाई पूर्ण कुमार ने आत्महत्या कर ली उन्होंने अपने सुसाइड नोट में जातीय प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं। राज्य में इस बार भी भाजपा सरकार है। राज्य कोई भी हो पर भाजपा सरकार दलित कार्ड से कायरता की हद तक भयभीत रहती है। आनन फानन में आला अधिकारियों पर गाज गिरी, डीजीपी तक को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया। इससे पहले मृत आईपीएस अधिकारी के गनमैन को एक शराब कारोबारी से रिश्वत मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गनमैन का कहना है कि वह वाई पूर्ण कुमार के कहने पर ही यह राशि मांग रहा था। जजों, आईएएस तथा आईपीएस अधिकारियों का बे हिसाब संपत्ति अर्जित करना अब जग जाहिर है। कहते हैं राज्य के लगभग 70% आईपीएस अधिकारियों के पास 500 करोड़ से ऊपर की संपत्ति है। बड़े बड़े अधिकारी शराब के कारोबार में हिस्सा डालते हैं, इनके होटल रिसोर्ट और शराब के अहाते चलते हैं, सरकारी ठेकों में इनका हिस्सा रहता है और ईमानदार सरकार इनके सामने उकड़ू बैठी नजर आती है। यह भी हो सकता है कि इस सारे मामले में रिश्वत और मंथली का मामला भी कहीं ना कहीं शामिल हो। लेकिन अफसोस अब हुकुम के इक्के के नीचे सब दब जाएगा।

राकेश चौहान 

#RSC

Wednesday, 24 September 2025

कुछ याद उन्हें भी कर लो

 आज 23 सितंबर है। आज ही के दिन राव तुलाराम की 1863 में मृत्यु हुई थी। अतः आज के दिन नसीबपुर - नारनौल के युद्ध में 16 नवंबर 1857 को अंग्रेजों से लड़ते शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों की याद में राजकीय अवकाश रखा जाता है। अब इस बात का जवाब मैं नहीं दे पाऊंगा कि जब युद्ध 16 नवंबर को हुआ तो शहीदी दिवस 23 सितंबर को क्यों मनाया जाता है। आज सुबह से नसीबपुर के शहीद स्मारक में नेताओं का तांता लगा हुआ है। मेडिकल कॉलेज नाम विवाद में इस बार का शहीदी दिवस कुछ खास ही हो गया है। किंतु इस युद्ध के जिन नायकों को भुला दिया गया बस मेरा यह लेख उनको समर्पित है! जो लड़े, मरे और गुमनाम रह गए।

1857 में झज्जर ढाई सौ गांवों के साथ हरियाणा की सबसे बड़ी रियासत था। नवाब अब्दुर्रहमान खान इसका शासक था। झज्जर का नवाब अंग्रेजों और बहादुर शाह जफर दोनों को खुश रखना चाहता था और असल में दोनों को ही मूर्ख बना रहा था। इसका सेनापति समद खान और सेना अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ना चाहते थे। इन परिस्थितियों में समद खान ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। उधर भट्टू का शहजादा मोहम्मद अजीम भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर बैठा। इधर रेवाड़ी परगना के लगभग 87 गांवों की इस्मतरारी जागीर (ऐसी जागीर जिसमें जागीरदार के पास केवल रिवेन्यू इकट्ठा करने का अधिकार रहता था) के जागीरदार राव तुलाराम ने भी अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने झज्जर और हिसार पर हमला बोलकर वहां के किलों पर अपना अधिकार कर लिया, झज्जर के नवाब को गिरफ्तार करके दिल्ली भेज दिया गया जहां अगले साल जनवरी में उसे फांसी की सजा दे दी गई। समद खान झज्जर की सेना लेकर कर निकल गया। भट्टू का शहजादा भी अपनी सेना के साथ निकल गया। इधर रेवाड़ी में अंग्रेजों के आने से पहले ही तुलाराम ने रेवाड़ी छोड़ दी। कुछ समय उपरांत इन तीनों राज्यों की सेना राजस्थान के सिंघाना में इकट्ठी हुई। सवाल यह था कि अब क्या किया जाए। उधर मारवाड़ के आऊवा के ठिकानेदार ठाकुर कुशाल सिंह ने अंग्रेजों और मारवाड़ के विरुद्ध विद्रोह कर दिया तथा अंग्रेज कमांडर का सर काट के किले के द्वार पर टांग दिया। कुशाल सिंह के साथ 6 और ठिकानेदार थे। कुशाल सिंह चाहता था कि मेवाड़ के ठिकानेदारों को साथ ले कर ही दिल्ली पर हमला किया जाए किन्तु उसके साथियों का कहना था कि तुरंत दिल्ली जाया जाए। आसोप के ठिकानेदार ठाकुर श्योनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह, आलनियावास के ठाकुर अजीत सिंह, बांजवास के ठाकुर जोध सिंह, सीनाली के ठाकुर चांद सिंह, सलूंबर के प्रतिनिधि के रूप में सुंगडा के ठाकुर सुखत सिंह तथा आऊवा के प्रतिनिधि ठाकुर पुहार सिंह के नेतृत्व में इन ठिकानों की सेना दिल्ली की ओर कूच कर गई। अंग्रेज सेना की जोधपुर लीजियन, एरिनपुरा और डीसा के विद्रोही पुरबिया सैनिक भी इन से आ मिले। जब यह लोग सिंघाना पहुंचे तब तक दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा हो चुका था। हरियाणा के उपरोक्त राज्यों की सेना के साथ ये सेनाएं भी मिल गईं। अंग्रेजों से लड़ने का फैसला हुआ और इन संयुक्त सेनाओं ने रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया किंतु रेवाड़ी को उपयुक्त स्थान न मानकर यह लोग वापस नारनौल आ गए क्योंकि नारनौल अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह थी जिसमें पहाड़ी पर एक किला था। चूंकि झज्जर सबसे बड़ी रियासत था अतः उसकी सेना सबसे बड़ी थी और युद्ध का नेतृत्व झज्जर का सेनापति समद खान ही कर रहा था। इस युद्ध में ठाकुर दलेल सिंह के नेतृत्व में कांटी से भी एक रिसाला शामिल हुआ था। क्योंकि कांटी भी झज्जर का ही भाग था अतः संभवत यह रिसाला झज्जर की सेवा में ही रहा होगा। रेवाड़ी के दल का नेतृत्व राव रामलाल तथा किशन गोपाल के हाथ में था। दोपहर के समय पहले झड़प नसीबपुर में हुई तथा बाद की लड़ाई नारनौल में हुई। आज की पुरानी कचहरी की छतों पर मोर्चे लगा कर पुरबिये अपनी बंदूकों के साथ बड़ी बहादुरी से लड़े। शाम होते होते अंग्रेजों की विजय हुई तथा क्रांतिकारी सेना तितर बितर हो गई। अंग्रेजी सेना के घुड़सवारों ने तीन मील तक पुरबिया 'पंडी' सैनिकों को दौड़ा-दौड़ा कर काट डाला। क्रांतिकारी सेना के लगभग 500 तथा अंग्रेजों के 80 सैनिक काम आए जिनमें अंग्रेज सेनापति जेरार्ड भी था। पूरा नारनौल शहर खाली हो गया गलियां लाशों से पट गईं। इसके बाद विद्रोहियों को ढूंढ ढूंढ कर पकड़ा गया तथा 33 लोगों को फांसी दे दी गई। मरने वालों और फांसी पाने वालों में स्वाभाविक रूप से मुसलमान अधिक थे। झज्जर और भट्टू का क्षेत्र अंग्रेजों की मदद करने वाले जींद, पटियाला तथा नाभा के बीच तीन भागों में बांट दिया गया। ऊपर का इलाका जींद को, दादरी, कानोड़ और नारनौल के क्षेत्र पटियाला तथा कांटी तथा बावल के परगने नाभा को मिले।

इस युद्ध के जिन योद्धाओं और बलिदानियों का नाम भुला दिया गया शहीदी दिवस पर उन्हें भी श्रद्धांजलि।


संदर्भ - 

के सी यादव -the revolt of 1857 in Haryana 

NA Chick - Annals of the Indian rebellion

खड़गावत Rajasthan's role in the struggle of 1857 


राकेश चौहान 

#RSC

Friday, 19 September 2025

श्राद्ध

 कहते हैं कि औरंगजेब के व्यवहार से दुःखी होकर शाहजहां ने कहा कि 'तुझ से अच्छे तो काफ़िर ही हैं जो अपने मरों का भी हर साल श्राद्ध करते हैं।' कुछ मुसलमानों से सुनता हूं कि उन से पिछली पीढ़ी तक उनके घरों में श्राद्ध होता रहा है। दीवाली पूजन और पंडित से पूछ कर बच्चे का नामकरण तो मेवात के मेव हाल ही तक करते रहे हैं। बेशक औरंगजेब की समझ से तो काफ़िरों की हत्या और मंदिरों के विध्वंस द्वारा हिंदुस्तान से कुफ्र ख़त्म करना सर्वोत्तम मार्ग था किंतु उसके वामपंथी वारिसों को पता है कि विध्वंस किसका करना है। उन्होंने इस्लाम के जबरन धर्मांतरण, मारकाट और मंदिर तोड़ने से लेकर जजिया, कर माफी, इनाम, नौकरी और सूफीवाद के पूरे पैटर्न को बारीखी से समझा है। उन्होंने गोवा इंक्विजिशन से ले कर चावल के बदले मजहब के ईसाइयत के व्यापार को भी करीब से देखा है। वामपंथियों को भली भांति पता है कि इन मजहबों के हथकंडों को अपने बौद्धिक हथियारों से कैसे 'ब्लैंड' करना है। यह विडम्बना नहीं अपितु होशियारी है कि वामपंथ पश्चिम में जहां ईसाईयत और इस्लाम का विरोधी है वहीं भारत में यह दोनों उसके औजार हैं। ऐसा कोई भी मौका आने पर मैं वामपंथियों की प्रशंसा किए बिना नहीं रहता। प्रशंसा क्या मेरा तो मन करता है कि किसी वामपंथी का सर फोड़ कर उसका भेजा चूम लूं! श्राद्ध पर  सुनिए उनके बोल! 'जिंदे मां-बाप की कदर करते नहीं और मरने के बाद श्राद्ध करते हैं!' जैसे श्राद्ध न हुआ मां-बाप की बेकद्री का फ़रमान हो गया। 'बामन को खीर जिमाने से क्या मेरे पूर्वजों के पेट में चला जाएगा?' अरे बामन तो अकेला ही जीमेगा बाकी तो तेरा कुनबा ही डकारेगा।

      मेरे परदादा की मृत्यु मेरे दादाजी के बचपन में ही हो गई थी। उन्हें अपने पिता का साथ बहुत कम मिला होगा। दादाजी अपने पिता का श्राद्ध सामान्य से बढ़कर करते थे। दादी बहुत स्वादिष्ट खीर बनाती थीं। उन्हीं की देखरेख में एक - डेढ़ मन दूध की खीर दो - तीन बार में बनती और ब्राह्मणों तथा परिवार के साथ- साथ लगभग सारा कुनबा ही जीमने आता। यह दृश्य दादाजी के चेहरे पर अपार संतोष ले आया करता। आज दादी का श्राद्ध है। परसों मां का पहला श्राद्ध था। रसोई से बाहर आती भोजन सुगंध के बीच बरामदे में पिताजी को कुर्सी पर खामोश बैठे देख कर मैंने एक अप्रत्याशित सवाल पूछ लिया। 'जी अम्माजी की याद आ रही है?' (दादी को हम अम्माजी ही बोलते थे) जवाब में पिता जी का गला भर आया और हम दोनों ही भावुक हो गए! कुछ चीज़ें समय पर ही ठीक से समझ आती हैं!

राकेश चौहान
#RSC

Wednesday, 17 September 2025

रंगा सियार

 मैं दृढ़ता से यह बात कहता आया हूं कि नव बौद्धवाद, ईसाईयत का लांचिंग पैड है। हिंदू से बौद्ध और बौद्ध से ईसाई। इस रूट को ठीक से समझ लीजिए। मुझे इस में भी लेशमात्र संशय नहीं कि नवबौद्धवाद को ईसाई मिशनरियां ही संचालित कर रही हैं। मजेदार तो यह है कि मेरी यह धारणा दिन प्रतिदिन दृढ़ इसलिए होती जा रही है क्योंकि इसको साबित करने के लिए कोई ना कोई आ खड़ा होता है। 

रंगा सियार कहानी शायद बचपन में सब ने सुनी होगी। यह पंचतंत्र में एक ऐसे सियार की कहानी है जो भूख से व्याकुल होकर शहर में पहुँचता है और कुत्तों से बचने के लिए एक धोबी के घर में रखे नील वाले पानी से भरी नांद में कूद जाता है। नीला हो कर वह जंगल लौटता है और दावा करता है कि उसे वन देवी ने राजा बनाकर भेजा है। परंतु, एक दिन जब अन्य सियार 'हुआं-हुआं' करते हैं, तो वह भी अनजाने में वैसा ही कर बैठता है, पहचान उजागर होने पर जानवर उसे मार देते हैं। 

नवबौद्धों के भावी ईसाई होने में अगर आपको शक है तो दोनों की भाषा मिलाइए। ईसाई विश्व में जहां भी जाते हैं, सब से पहले वहां के स्थानीय धर्म को पाप और देवी देवताओं को दुष्ट बताते हैं। यही हाल नवबौद्धों का है। इन्हें अपनी सुंदरता नहीं दिखानी दूसरे में बदसूरती पहले तो गढ़नी है और फिर जोर-शोर से उजागर करनी है। आम हिंदू को ईसाई बनाना आसान नहीं है लेकिन उसे बौद्ध बनाना ज्यादा कठिन नहीं। वह बौद्ध हुआ तो समझ लीजिए ईसाईयत का आधा काम हो गया। इस्लाम का भी सब से बड़ा शिकार बौद्ध ही थे। अफगानिस्तान, आज का पाकिस्तान, सिंध और पूरी गंगा यमुना पट्टी बौद्ध थी! जी वही जो आज मुसलमान है! जो डिगा है वो गया है! फिर भी आपको ईसाई - नव बौद्ध गठबंधन में संदेह है तो नवबौद्धों की शपथ आपने सुनी-पढ़ी नहीं। यदि अब भी संदेह बाकी है तो देश के मुख्य न्यायाधीश की भाषा सुन लीजिए न, इस में और ईसाई मिशनरियों की भाषा में कोई फर्क नहीं। इस व्यक्ति की टिप्पणी सुनकर मुझे तनिक भी आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ क्योंकि नव बौद्धों की इस भाषा का मैं आदी हूं, बस फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार रंगे सियार ने विक्रमादित्य के न्याय सिंहासन पर बैठ कर 'हुआं-हुआं' की है! इन रंगे सियारों की पोल खुलने पर समाज को क्या करना चाहिए? मुझे नहीं पता! 

अजीब इत्तेफाक है ना कि नवबौद्धों का रंग भी नीला ही है!

जै भीम, नमो बुद्धाय!


राकेश चौहान 

#RSC 

Saturday, 23 August 2025

जाति जंजाल

जाति जंजाल

वैदिक काल में वर्णों का वर्णन है जो कि कर्म के आधार पर वर्गीकृत हैं तथा जन्मजात नहीं हैं। मनुस्मृति में भी वर्ण कर्म आधारित हैं, जो कर्म बदलने पर बदल भी सकते हैं। जाति की उत्पत्ति संभवतः संक्रमण काल में तब हुई होगी जब संस्कृति को बचाने की चुनौती आ पड़ी। समाजशास्त्रियों तथा इतिहासकारों के एक वर्ग के अनुसार जाति शब्द ज्ञाति से बना है, यानि जिसे जिस विषय का ज्ञान अर्थात ज्याति (ज्ञाति) थी उसी की जिम्मेदारी उस ज्ञान को संजोने की दी गई यही बाद में रूढ़ हो कर जाति हो गया। यह बात एक ही गौत्र का अलग - अलग जातियों में पाए जाने का एक मजबूत तर्क हो सकती है। यदि ऐसा है तो इस घटना और आबू पर्वत पर हुए उस यज्ञ में बहुत अधिक समय का अंतर नहीं रहा होगा जिस से चार वीर पुरुषों की उत्पत्ति हुई तथा क्षत्रिय की जगह राजपूत शब्द अधिक प्रयोग होने लगा। जैसे- जैसे विदेशी आक्रमण और संक्रमण का उत्पात बढ़ने लगा, संस्कृति बचाने के नियम भी दृढ़ होते चले गए परिणाम स्वरूप जाति व्यवस्था भी कठोर होने लगी। पहले से चले आ रहे अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के नियम भी बदले। सब से बड़ी चुनौती तो इस्लामी संक्रमण की थी जो कि सनातनी व्यवस्था में घुलने को कतई तैयार नहीं था तथा पूरी काफिर दुनिया को मोमिन बनाने के उद्देश्य से जिहाद को प्रथम कर्तव्य माने बैठा था। लगता है जब तक वर्ण व्यवस्था थी तब तक तो ठीक था किंतु जैसे ही वर्ण व्यवस्था जन्मानुसार हुई और फिर जाति व्यवस्था स्थापित हुई तब अनेक समस्याएं आई होंगी। जिनमें से एक थी अलग जाति की कन्या और पुरुष का विवाह। अब सबसे बड़ा प्रश्न था कि अंतरजातीय प्रेम विवाहों से कैसे निपटा जाए। रोजाना होने वाले विदेशी आक्रमणों से रक्षा का भार क्योंकि क्षत्रियों पर था जिनके लिए क्षत्रिय के अलावा राजपूत शब्द लगभग छठी शताब्दी में रूढ हो चुका था। हालांकि यह शब्द राजपुत्र के रूप में सदा प्रयोग होता रहा था। बहरहाल लगातार विदेशी आक्रमणों ने राजपूतों का महत्व बढ़ा दिया तथा उनकी लड़ने की जिजीविषा को जीवित रखना समाज के सामने और बड़ी चुनौती हो गई। अस्तित्व बचाए रखने के लिए जिस प्रकार कठोर जाति व्यवस्था स्थापित हुई उसी तरह कठोर राजपूत धर्म भी स्थापित कर दिया गया। अब समाज के रक्त के साथ राजपूती रक्त को शुद्ध रखना और अधिक आवश्यक था। अंतर्जातीय प्रेम विवाह इस शुद्धता में सब से बड़ा रोड़ा थे जबकि सम्मान, शक्ति तथा अधिकारों से लैस राजपूतों के लिए ये विवाह सहज सुलभ ही थे। वो भी तब जब अनुलोमा तथा प्रतिलोमा विवाह की खिड़की मौजूद थी। अतः यह विवाह संबंध इस नियम के साथ स्वीकार किए गए लगते हैं कि यदि कोई राजपूत पुरूष किसी अन्य जाति की कन्या से विवाह कर लेता है तो उसकी संतान को राजपूती से हाथ धोना पड़ेगा तथा उसकी संतान को कन्या की जाति में स्थान दिया जाने लगा। हां इतना अवश्य था कि संपत्ति अथवा राज्य में उसको उसका भाग अवश्य दिया गया। अतः माता की जाति के अन्य गोत्रों से उसका सम्मान स्वतः ही अधिक हो गया। आज भी इस प्रकार के गोत्रों का अपनी-अपनी जातियों में एक सम्मानजनक स्थान है तथा इनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति तथा रहन सहन अपने सजातीय बंधुओं से इक्कीस है। अर्थात यह कोई अपमानजनक बात नहीं थी बल्कि एक सामाजिक समाधान था। यह निःसंदेह एक अभिनव प्रयोग था जिस ने एक ओर तो समर्थ के स्वेच्छाचार पर लगाम लगाई, महिलाओं को शोषण के विरुद्ध सुरक्षा दी तथा दूसरी ओर ऐसे दंपतियों के वंशजों का समाज में सम्माननीय स्थान निर्धारित कर के सामाजिक संकट का सुंदर समाधान कर दिया। उस दंपति के ऐसे वंशजों को गौत्र पिता के नाम (जैसे मांधाता से 'मान' जाट, केवल राव से केवल नाई), किसी स्थान (खोल से 'खोला' अहीर) या घटना (पुरुष पूर्वज द्वारा शेर का सर काटने पर 'मूंडड़ा' गूजर) या परम्परा (दो बार मुंडन करवाने से 'दोलट' जाट) आदि से दिया जाता! कभी कभी पिता के मूल वंश का नाम गौत्र के रूप में भी प्रयुक्त होता। जैसे 'भाटी'- गूजर, कुम्हार, मनियार! जैसे 'चौहान' - जाट, गूजर, खटीक, चमार, धोबी, माली। जबकि राजपूतों के गोत्र आज भी प्राचीन गोत्र ही हैं जैसे चौहानों और उनकी चौबीस शाखाओं का गौत्र वत्स, राठौड़ व शाखाएं - कश्यप, भाटी व शाखाएं- अत्री, सोलंकी व शाखाएं - भारद्वाज, आदि। ऐसा सिर्फ राजपूतों के साथ ही नहीं था बल्कि अनुलोमा विवाह से उत्पन्न संतान का कन्या की जाति में जाने का नियम अन्य जातियों में भी कहीं कहीं दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि उसे पूर्वज पिता ने अपनी जाति में शामिल करने का प्रयास नहीं किया। किंतु ऐसा प्रयास समाज के कठोर नियमों ने कहीं सफल नहीं होने दिया। ऐसे मौके भी आए जब राजा को देश छोड़कर भागना तक पड़ा।

ऐसे भी उदाहरण हैं कि किसी राजपूत ने युद्ध से इनकार कर दिया तथा अन्य जाति के कार्य अपना लिए और उस जाति में शामिल हो गया।

देखिए कैसे जातियों की स्थापना ने राष्ट्र की आत्मा को बचा कर रखा और क्यों वामपंथियों के लिए सबसे आवश्यक जाति खत्म करना है। एक समय था जब सारे पूर्वज महापुरुष सबके थे। गोगा जी, तेजाजी, रामदेव, देवनारायण, आदि सब! फिर वामियों ने जातिवाद घुसेड़ा और अब ये जातियों के हैं। यहां तक कि राम और कृष्ण की भी जाति है। लोग सोशल मीडिया पर लड़ रहे हैं, एक दूसरे को गालियां निकाल रहे हैं महापुरुषों को कलंकित कर रहे हैं। इस से भी बुरा समय तो अभी बाकी है। फिर भी कहूंगा, जब भी संशय हो जड़ों की ओर जाओ, समाधान मिलेगा!

(गोत्रों के उद्भव से संबंधित उपरोक्त सभी उदाहरण प्रमाणिक पुस्तकों से लिए गए हैं। सोर्स जानने के लिए कमेंट कर सकते हैं)


सादर 

राकेश चौहान

#RSC

Thursday, 19 June 2025

भाईचारा

 कोरिया वास में नवनिर्मित मेडिकल कॉलेज का नाम बदलने की कवायद में लगे वोट बैंक की मुहिम के बीच खबर है कि च्यवन ऋषि की जाति मिल गई है। पर च्यवन ऋषि का नाम तो वेदों की ऋचाओं में भी है! फिर तो यह राम जन्म से भी पहले की बात है। अर्थात जिस काल में उन्होंने ढोसी पर्वत तथा उसके आसपास के वनों में विचरण करते चवनप्राश का आविष्कार किया होगा तब जातियां अस्तित्व में भी नहीं आईं थीं। फिर भी इस आविष्कार के आविष्कारकों के लिए बधाई बनती है। च्यवन ऋषि महर्षि भृगु के पुत्र थे, तो इस हिसाब से वह भृगु या भार्गव हुए। किंतु भृगु और भार्गव गोत्र तो बहुत सारी जातियां में पाया जाता है। वैसे ही जैसे कश्यप, भारद्वाज, गौतम, गर्ग इत्यादि, स्वयं मेरा अर्थात चौहानों का गोत्र भी वत्स है। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों को जानकारी है कि विवाह के लिए 'मिल जाने' वाले गौत असल में गौत्र नहीं हैं। चलिए इस घालमेल का ठीकरा भी ब्राह्मणों के सर पर ही फोड़ कर पुनः च्यवनप्राश के आविष्कारक की जाति के आविष्कारकों को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं। 
मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर राव तुलाराम के नाम पर रखने के समर्थकों में नारनौल के तीसरी बार के विधायक नए-नए शामिल हुए हैं। इससे पहले स्थानीय सांसद और नांगल चौधरी की विधायक भी महाविद्यालय का नाम बदलकर राव तुलाराम के नाम पर रखने की वकालत कर चुके हैं। मेरा दावा है कि ये लोग नसीबपुर में लड़े गए युद्ध में शामिल सभी पक्षों का नाम तक नहीं बता सकते। वैसे राव तुलाराम के नाम पर किसी को आपत्ति क्यों होगी भला! च्यवन ऋषि की तरह राव तुलाराम भी तो सबके हैं! दिक्कत राव तुलाराम से नहीं वोट बैंक राजनीति की गुंडागर्दी से है। चिकित्सा क्षेत्र में योगदान देने वाले च्यवन ऋषि के आश्रम क्षेत्र में बनने वाले चिकित्सा संस्थान का नाम उनके नाम पर रखना बिल्कुल सार्थक तथा सम्यक है। दूसरी बात जब गजट नोटिफिकेशन द्वारा यह नाम रखना तय हो चुका था तब इस विषय में विवाद करना ही तर्कसंगत नहीं था। भविष्य में किसी और संस्था का नाम हम उन पर रख सकते हैं! इन सब बातों से सहमत कुछ लोग भाईचारा बचाने की दुहाई दे कर कन्नी काट गए। वैसे बचाना दुनिया के सब से दुष्कर कार्यों में से एक है। बचपन में आखिर में खाने के लिए अच्छे- अच्छे बेर बचाते थे तो कोई टपक पड़ता और उन्हें चट कर जाता। आज पैसा बचाने के लिए लाख जतन करते हैं पर बात बनती ही नहीं। भाईचारा बचाने के लिए तो केरल के एक राजा ने भारत की सबसे पहली मस्जिद बनाई थी और उसी केरल में आज अस्तित्व बचाने के लाले पड़ रहे हैं। वैसे भाईचारा बचाने का एक बम पिलाट आईडिया है मेरे पास! मेडिकल कॉलेज का नाम राव तुलाराम के नाम पर रख दिया जाए और नसीबपुर के शहीद स्मारक का नाम बदल कर 'शहीद' च्यवन ऋषि स्मारक रख दिया जाए।

अंत में हफ़ीज़ जालंधरी की चार पंक्तियां - 
जो भी है सूरत-ए-हालात कहो चुप न रहो।
रात अगर है तो उसे रात कहो चुप न रहो।।
घेर लाया है अँधेरों में हमें कौन 'हफ़ीज़'।
आओ कहने की है जो बात कहो चुप न रहो।।

जय हिंद 
राकेश चौहान
#RSC 

Wednesday, 28 May 2025

ये बाप मुझे देदे ठाकुर

 राजपूतों, 

आपका सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आपके पास एक गौरवशाली अतीत है तथा उस से भी बड़ा यह है कि आपके कंधे उस अतीत का बोझ नहीं उठा पा रहे। पूरे देश में जहां-जहां भी आप लोग हैं एक न एक नवधनाढ्य जाति आप के विरुद्ध है, उस जाति का नाम अलग हो सकता है लेकिन उसके तरीके हैं एक जैसे ही। उस के पास जमीन है, धन है, शिक्षा है, नौकरियां हैं, व्यापार है, संख्या है, मक्कारी है, आरक्षण है, सरकारी योजनाएं हैं, राजनीति में दखल है और राज में हिस्सेदारी है। है नहीं तो आपके जैसा अतीत और अब इस जाति की नजर आपके अतीत पर है। जहां वे घपला कर सकते हैं वे कर रहे हैं, जहां नहीं कर सकते वहां आप के बुजुर्गों को लांछित कर रहे। आपके महापुरुषों पर अधिकार करने की उनकी तैयारी देखी है आपने! उन्होंने इतिहास गढ़ कर बाकायदा एक श्रृंखला तैयार की और मिहिर भोज से शुरू होकर, पृथ्वीराज चौहान, अनंगपाल तोमर, सुहेलदेव बैंस, महाराणा प्रताप और दुर्गादास राठौड़ तक पहुंच गए! अब आप अपना हाल देखिए! वे मूर्ति लगवाते हैं और नाम लिखते हैं "गूजर" सम्राट मिहिर भोज! और आप "क्षत्रिय" सम्राट मिहिर भोज पर फैसला कर लेते हैं! वे कहते हैं कि अगर पृथ्वीराज चौहान को राजपूत दिखाया तो वह फिल्म नहीं चलने देंगे और बेचारा डायरेक्टर डर के मारे पूरी फिल्म में "राजपूत योद्धा" की जगह "हिंदू" शब्द प्रयोग कर के फिल्म फ्लॉप करवा लेता है! जो लोग लड़ाई में युद्ध घोष का महत्व समझते हैं वे इस डायलूशन से हुई हानि आसानी से समझ जाएंगे।

आप के हिस्से के हर प्रकार के विरोध का जिम्मा शायद करणी सेना ने उठा लिया है! किन्तु उनकी युवा शक्ति इतिहास के सामान्य ज्ञानाभाव में नाली में बह जाती है। जैसा कि हाल ही में राणा सांगा के विरुद्ध टिप्पणी में हुआ! आप लोग समाज की बौद्धिक भूख शांत नहीं कर पाए कि आप का पक्ष क्या है और करणी सेना का सारा विरोध लंगूरों की उछल कूद बनकर रह गया। याद रखिए किसी भी विवाद में दो पक्ष तो होते ही हैं किंतु विवाद के बाहर एक तीसरा पक्ष भी होता है जो यह निर्णय करता है कि क्या सही है तथा क्या गलत! उस तीसरे पक्ष का नाम समाज है और उसे संतुष्ट करना सबसे अधिक आवश्यक होता है। देख रहे हैं ना कि सरकार किस तरह विदेशों में युद्ध से संबंधित पक्ष रखने के लिए प्रतिनिधिमंडल भेज रही है।

जरा गौर करिए कि कैसे एक घाघ खिलाड़ी की तरह हनुमान बेनीवाल ने अपनी राजनीति की डगमगाती नैया 15 शब्दों में किनारे लगा ली। उसे पता है कि उसे कहां बांस गाढ़ना है कि कुछ कलाबाजियां खाते लंगूर उसमें अपना पृष्ठभाग फंसा कर जाटों को उसके पीछे लामबंद कर देंगे। अब वह नर्म पड़ गया किंतु ये भी उसकी स्ट्रैटजी का हिस्सा है। इस विवाद से उपजी फ़सल वह काट कर अपने स्थान पर वापस आ चुका। समझिए कि ये राजनीति की बार बालाएं हैं जिनका उद्देश्य सिर्फ उत्तेजना पैदा करना है। इनका शिकार मत बनिए। इससे पहले राष्ट्रीय कुश्ती संघ पर कब्जे के लिए कुछ लोगों ने बृजभूषण पर इल्जाम लगाकर मामले को सफलता पूर्वक जाट बनाम राजपूत कर दिया था। जबकि संपूर्ण कुश्ती जगत पहले दिन से ही यह बात जानता था कि यह इल्जाम झूठे हैं, जो कि सिद्ध भी हो रहा है। बृजभूषण बरी भी हो जाएंगे पर आपने जो खोया उसका क्या? आप क्यों नहीं स्वयं को इस मामले से पहले दिन ही अलग कर पाए? हजारों साल हुए पर राजनीति की कुटिल चालों के चक्रव्यूह में आप आज भी अभिमन्यु ही हैं। 

करणी सेना के प्रवक्ताओं पर गौर करिए, वे टीवी की डिबेट में भी तर्क व साक्ष्य प्रस्तुत करने की बजाय मरने - मारने की बात करते हैं। इतिहास पर उनकी कोई उल्लेखनीय पकड़ नहीं होती। हिस्टोरिओग्राफ़ी पर उनका ज्ञान शून्य है। उनके प्रतिद्वंद्वी राजपूतों के मुगलों से वैवाहिक रिश्ते बनाने की बात उछालते हैं तो वे लंगड़े लूले तर्क देते हैं। करणी सेना का एक भी प्रवक्ता यह कहते नहीं सुनाई देता कि जिस काल में राजा की बेटी भी सुरक्षित नहीं थी उस काल में आम बेटियों का क्या हाल रहा होगा। हनुमान बेनीवाल जैसों के सवालों के जवाब में कोई भी राजपूत, जाट कन्याओं के मुगलों/मुस्लिमों से विवाह का हवाला नहीं देता जबकि ऐतिहासिक दस्तावेजों में ऐसी घटनाएं भरी पड़ीं हैं। किन्तु समस्या यह है कि कोई अध्ययन नहीं करता। करणी सेना के नेता स्वयं तो चमकना चाहते हैं किन्तु बौद्धिक क्षत्रित्व का उनके पास न तो सामान है और न ही योजना। आज जरूरत तो बौद्धिक क्षत्रियों की है।

एक बात समझ लीजिए कि आप आसमान से नहीं टपके हैं। एक समय पर तो जाति अस्तित्व में ही नहीं थीं और वर्ण भी कर्मानुसार थे। जाति व्यवस्था के आने और उसके दृढ़ होने का जो भी कारण रहा हो, लेकिन अनेकों जातियों की एक पूर्वज से उत्पत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। इतना अवश्य है कि राजपूत काल से हाल ही तक राजपूत पुरुष से अन्य जाति की कन्या का विवाह होने पर उस दंपत्ति की संतान को राजपूत जाति में प्रवेश नहीं था तथा वह कन्या की जाति में ही जाती थी। उसके कम से कम दो विशिष्ट कारण थे, कि एक तो इस्लामिक हमलों से बचने के लिए रक्त शुद्धता के जो मापदंड समाज ने बनाए थे उन पर खरा रहना। दूसरा सत्ता और अधिकार में अंधा होकर कोई भी समर्थ व्यक्ति, आम महिलाओं पर अतिचार न करे। अतः जिस स्त्री से उसे प्रेम था उससे उसे विवाह करने की अनुमति तो थी किंतु इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न संतान को पिता की राजपूती ग्रहण करने का अधिकार नहीं था तथा उसे पिता के गौत्र या किसी नए गौत्र के साथ कन्या की जाति में प्रवेश दिया जाता था। एक ओर तो यह एक सामान्य महिला की शोषण के विरुद्ध सुरक्षा थी दूसरी ओर यह सामाजिक संकट से बचने का सम्मानजनक उपचार था। ऐसी संतान का ओहदा राजपूत पिता की जाति से थोड़ा कम किंतु माता की जाति से ऊंचा रहता था। अनेक जातियों के सैंकड़ों ऐसे वंशों के साहित्यिक रिकॉर्ड के साथ - साथ, वंशावलियों, जनश्रुतियों, लोकगीतों में प्रमाण मौजूद हैं। तथा आज भी इन संतानों का ओहदा अपनी जाति में सामान्य से ऊंचा ही है। इन गौत्रों का सदा ही पितृ राजपूत वंश से भाईचारा रहा है। उस भाई चारे को कायम रखिए, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए लांछित मत करिए।

जब एक राजनीतिक दल ने हिंदुओं को अपने पीछे लाम बंद कर दिया है तो दूसरे निश्चय ही हिंदुओं को जातियों में बांट कर अपने साथ लाने का प्रयास करेंगे। आने वाले समय में यह प्रयास और भी शिद्दत से होंगे। अच्छे से समझ लीजिए इस तरह के हमले और अधिक होंगे तथा कड़वाहट और बढ़ेगी। आप लोगों को अपना होमवर्क सही से करना है। जो- जो लांछन ये आपके ऊपर लगाते हैं वे स्वतः ही उनके ऊपर लग जाते हैं क्योंकि भारतीय समाज ने एक जैसे ही कष्ट समरूप सहन किए हैं। बौद्धिक क्षत्रिय बनिए अपना ज्ञान बढ़ाइए। लगभग सभी प्रमाणिक ऐतिहासिक पुस्तकें इंटरनेट पर मौजूद हैं। अध्ययन करिए समझ लीजिए जो जितना बुरा आपके लिए कह रहा है उससे कई गुना बुरा उसके लिए लिखा है। यह ज्ञान किसी को अपमानित करने के लिए नहीं अर्जित करना बल्कि यह ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर परोसे गए झूठ को सच से अलग करेगा। आपके पुरखों ने जो भी अर्जित किया वह अपने शौर्य से अर्जित किया था। उसके लिए उन्होंने आरक्षण नहीं मांगा चुनाव नहीं लड़े। और शौर्य आत्म बल से पैदा होता है, आत्म बल मजबूत करिए। करणी सेना जैसे संगठन व्यर्थ के सर्कस बंद कर के गांव - गांव में शारीरिक और आत्म बल बढ़ाने के केंद्र स्थापित करें। पुस्तकाल खुलवाएं, बालकों को शिक्षा, खेल, राजनीति और रोजगार में भागीदारी के लिए तैयार करें। शारीरिक, आत्मिक तथा बौद्धिक क्षत्रिय बनाएं वरना आपका सब कुछ हड़पने के बाद गिद्धों की नज़र आप के बाप पर है!

जय माता जी की

राकेश चौहान

#RSC 

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Friday, 23 May 2025

इतिहास से व्यभिचार

रामजीलाल सुमन और हनुमान बेनीवाल! 

कैसी विडम्बना है कि एक के नाम में राम है और दूसरे के में हनुमान! 

ऐसे में काका हाथरसी की एक कविता याद आ उठती है। 

"नाम रूप के भेद पर कभी किया है ग़ौर।

नाम मिला कुछ और तो शक्ल - अक्ल कुछ और।।"

चलिए रामजीलाल को राम के हवाले कर के आज हनुमान बेनीवाल की बात करते हैं। 

कहते हैं कि भारमल ने अपनी असली पुत्री का विवाह अकबर से नहीं किया। जिस हरका बाई का विवाह उस ने अकबर के साथ किया वह उसकी अपनी पुत्री थी या नहीं, इस बहस में नहीं जायेंगे। अगर उसने कोई चाल चलकर दासी पुत्री का भी विवाह अकबर के साथ कर दिया होगा तो भी इस विवाह के कारण ही अनेक छोटे राज्यों और उनकी प्रजा का अस्तित्व संकट में आ गया। मुगल जिसके मर्जी आए उस के यहां डोला भेज देते थे। या तो बेटी दो या फिर युद्ध करो! इतनी ताकतवर सेना के सामने युद्ध मतलब हार, हजारों सैनिकों का बलिदान, सामान्य प्रजा में मारकाट, घरों में आगजनी और प्रजा की हजारों महिलाओं का शील हरण। बेचारा राजा प्रजा की हजारों बेटियों का शील बचाने के लिए एक बेटी का बलिदान कर देता था।

मुसलमानों से वैवाहिक संबंध किसी भी काल में अच्छी नजर से नहीं देखे गए। अगर ऐसा ना होता तो जिंदा महिलाएं जौहर की आग में ना प्रवेश करतीं! वीरांगनाएं अपने सिर थाली में सजा कर भेंट में न देतीं! युद्ध से मुंह मोड़ कर आए पतियों के लिए घर के दरवाजे बंद न होते! जौहर न होते, साके न होते! जौहर तो भारत के इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय है! जीवित जलना संभवतः सब से कष्टदाई मृत्यु है! सबसे पहले त्वचा जलती है, कोशिकाएं फूलती हैं, नसें फटती हैं और मृत्यु आने में तो 7- 8 मिनट लगते हैं, सिर कटने में तो एक पल ही लगता है। कितनी कठिन मृत्यु! सिर्फ इसलिए कि जौहर की उन चिताओं की राख का चंदन समाज के माथे पे सज कर धर्म रक्षा की राह दिखाता रहे कि धर्म रक्षकों हमारे बलिदान की लाज रखना! ऐसे बचा है सनातन धर्म! वरना ईराक, ईरान, सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगाल, कश्मीर... सब कुछ तो निगल गए दुष्ट! पूर्वजों ने न जाने कैसे - कैसे धर्म को बचाया है ! 

निश्चित ही मुगलों को बेटी ब्याहना कभी गौरव का प्रश्न नहीं था। इस बात को "किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमति - राणा राज सिंह" तथा "कल्ला राय मलोत" के किस्सों से समझा जा सकता है। यदि गर्व की बात होती तो फर्रूखसियर को अपदस्थ कर के अजीत सिंह अपनी पुत्री को साथ ले जा कर उसकी शुद्धि करके सनातन धर्म में वापसी न करवाता। यदि यह गौरव का विषय होता तो वे पूर्वज मुगल और मुस्लिम कन्याओं से विवाह भी करते। जो कि नहीं हुआ! यदि कभी हुआ भी तो उस कन्या से उत्पन्न संतान न तो राजपूतों में अपनाई गई और न ही हिंदू धर्म में, बल्कि उन्हें मुस्लिम ही बनना पड़ा! 

हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर कुछ अपवाद भी हुए होंगे, जो स्वाभाविक हैं। कुछ लोगों ने लालच में आ कर धर्म परिवर्तन भी किया है और कन्याओं के विवाह भी विधर्मियों के साथ किए हैं। ऐसे व्यक्तिगत उदाहरण राजपूत या किसी एक जाति में न हो कर पूरे हिंदू समाज में हैं। यहां बात हनुमान बेनीवाल की हो रही है तो  

कई जाटों ने अपनी बेटियों को नज़राने के तौर पर देकर मुगलों से ज़मींदारी भी हासिल की। इस तरह के जाटों को अकबरी, जहाँगीरी, शाहजहाँनी और औरंगज़ेबी जाटों के नाम से जाना जाता है, जो उसी मुगल बादशाह के नाम से संबंधित हैं, जिनके शासनकाल में इन परिवारों ने इस तरह के रिश्ते किए थे। यह तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब राजपूतों के पास तो मुस्लिम आक्रमण के पहले से ही राज था किंतु मुगलों के सबसे बड़े लाभार्थी जाट थे जिन को मुगलों ने सबसे ज्यादा चौधराहटें बांटी थीं। असल में चौधरी पद ही मुगलों का बनाया हुआ है। निश्चय ही जाटों के लिए तो यह रिश्ते सीधे - सीधे लाभ प्राप्ति के थे। यह इसलिए अधिक प्रकाश में नहीं है क्योंकि एक तो आमतौर पर यह रिश्ते मुगल घराने में न होकर मुगलों के छोटे सरदारों के साथ हुआ करते, दूसरे, यह नैरेटिव वामपंथी व्यभिचार को रास नहीं आता। लेकिन निश्चित मानिए कि पहले ब्राह्मण और अब राजपूतों को हाशिए पर पहुंचाने के बाद अगला निशाना जाट ही हैं। बारी सब की आएगी क्योंकि आप हजारों सालों से अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं और वामपंथ को यह गवारा नहीं!

इतिहास के कुछ पन्ने सुनहरे हैं तो कुछ स्याह हैं! इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ा जाना आवश्यक है। चाहे कोई भी जाति हो उस समय की परिस्थिति के अनुसार एक समाज के रूप मे उन्होंने अपना सर्वोत्तम किया! तभी तो आज भी हम 100 करोड़ हैं! कहीं- कहीं किसी के निजी स्वार्थ हो सकते हैं किन्तु एक समाज के रूप मे क्या हुआ ये देखना आवश्यक है ! 

जातिवाद के जिस घोड़े पर सवार हो कर हनुमान बेनीवाल को राजनीतिक लाभ मिला था अब उसका बुलबुला फूट चुका। इतिहास के साथ व्यभिचार कर के वह फिर जातिवाद की राजनीति गर्माना चाह रहा है। इस में सब से आवश्यक है कि तथ्यों से अवगत रहें। 

क्रमशः

राकेश चौहान 

#RSC